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पुरश्चरण📜 मंत्रमहार्णव (पुरश्चरण संख्या-प्रकरण), कुलार्णव तंत्र (15.70), शारदातिलक तंत्र, अग्निपुराण, रुद्रयामल तंत्र2 मिनट पठन

पुरश्चरण के लिए कितने जप करने पड़ते हैं?

संक्षिप्त उत्तर

मंत्रमहार्णव: पुरश्चरण = अक्षर-संख्या × 1 लाख। उदाहरण: गायत्री (24 अक्षर) = 24 लाख, नमः शिवाय = 5 लाख, महामृत्युंजय = 33 लाख। नित्य 2 घंटा जप ≈ 1 वर्ष में 8 लाख पूर्ण। कुलार्णव: निर्धारित से कम न जपें। कुल: जप + हवन (N/10) + तर्पण (N/100) + मार्जन (N/1000)। संख्या से अधिक भाव-शुद्धि।

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विस्तृत उत्तर

पुरश्चरण की जप-संख्या का शास्त्रोक्त विधान — विस्तृत और प्रामाणिक:

मंत्रमहार्णव — मूल नियम

मंत्राक्षरसहस्रेण लक्षं जपेत् पुरश्चरे।

— पुरश्चरण में मंत्र के प्रत्येक अक्षर के लिए एक लाख जप करना पड़ता है।

प्रमुख मंत्रों की पुरश्चरण-संख्या

| मंत्र | अक्षर-संख्या | पुरश्चरण-जप |

|---|---|---|

| ॐ (प्रणव) | 1 | 1,00,000 |

| गं (गणपति) | 1 | 1,00,000 |

| हूँ हनुमते नमः | 5 | 5,00,000 |

| नमः शिवाय | 5 | 5,00,000 |

| ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः | 8 | 8,00,000 |

| ॐ नमो नारायणाय | 8 | 8,00,000 |

| ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे | 9 | 9,00,000 |

| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय | 12 | 12,00,000 |

| गायत्री मंत्र | 24 | 24,00,000 |

| महामृत्युंजय | 33 | 33,00,000 |

*नोट: अक्षर-गणना परंपरा-भेद से भिन्न हो सकती है — गुरु से सुनिश्चित करें।*

व्यावहारिक गणना — प्रतिदिन कितना जप

यदि 1 माला (108 जप) = 5 मिनट, तो:

  • नित्य 1 घंटा जप = 12 माला = 1,296 जप
  • 8 लाख पुरश्चरण = 8,00,000 ÷ 1,296 ≈ 617 दिन (लगभग 2 वर्ष)
  • नित्य 2 घंटा = 300 दिन (लगभग 1 वर्ष)

इसीलिए खंड-पुरश्चरण में प्रतिदिन अधिक जप — कम समय में पूर्ण करने के लिए।

कुलार्णव — न्यूनतम संख्या

कुलार्णव (15.70): 'न्यूनसंख्यं न कुर्वीत।' — निर्धारित संख्या से कम न जपें। यदि किसी दिन संख्या कम हो जाए — अगले दिन अधिक जपकर पूरा करें।

सम्पूर्ण पुरश्चरण की संख्या

मंत्रमहार्णव:

  • मुख्य जप: 'N' (निर्धारित)
  • हवन: N ÷ 10
  • तर्पण: N ÷ 100
  • मार्जन: N ÷ 1,000
  • ब्राह्मण भोजन: N ÷ 10,000

शारदातिलक का सत्य

संख्यापूर्तिर्न पर्याप्ता भावशुद्धिस्तु मुख्यतः।

— संख्या की पूर्ति पर्याप्त नहीं — भाव-शुद्धि मुख्य है।

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शास्त्रीय स्रोत
मंत्रमहार्णव (पुरश्चरण संख्या-प्रकरण), कुलार्णव तंत्र (15.70), शारदातिलक तंत्र, अग्निपुराण, रुद्रयामल तंत्र
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