महोच्छुष्मा : मंत्र
1.1 मूल मंत्र (साधना हेतु)
महोच्छुष्मा का पूर्ण 'पूजा मंत्र' या 'जप मंत्र' निम्नलिखित है। यह मंत्र ब्रह्मयामल की विधि के अनुसार 'प्रणव' (ॐ) और 'नमः/स्वाहा' से सम्पुटित है।
शुद्ध संस्कृत पाठ:
मंत्र का अर्थ:
वैकल्पिक कापालिक मंत्र (हवन हेतु):
यदि साधक दीक्षित है और हवन (अग्नि कार्य) कर रहा है, तो 'स्वाहा' अंत वाला मंत्र प्रयोग किया जाता है:
1.1 चतुर्-गुह्यका स्थापना मंत्र
महोच्छुष्मा की साधना कभी भी एकाकी में नहीं की जाती। ब्रह्मयामल के विधान के अनुसार, साधक को अपने चारों दिशाओं में चार गुह्यकाओं की मानसिक स्थापना (न्यास) करनी होती है। इसके बिना महोच्छुष्मा का आवाहन अपूर्ण माना जाता है।
विनियोग (दिशाओं के अनुसार):
| दिशा | देवी | बीज मंत्र | पूर्ण मंत्र |
|---|---|---|---|
| पूर्व | रक्ता | चं | ॐ चं रक्तायै नमः |
| दक्षिण | कराला | डे | ॐ डे करालायै नमः |
| पश्चिम | चण्डाक्षी | क | ॐ क चण्डाक्ष्यै नमः |
| उत्तर | महोच्छुष्मा | प | ॐ प महोच्छुष्मायै नमः |