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महोच्छुष्मा

महोच्छुष्मा मंत्र: ब्रह्मयामल तंत्र और चतुर्-गुह्यका स्थापना रहस्य !

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महोच्छुष्मा मंत्र एवं चतुर्-गुह्यका स्थापना विधि | Mahochushma Mantra & Sadhana

महोच्छुष्मा : मंत्र

1.1 मूल मंत्र (साधना हेतु)

महोच्छुष्मा का पूर्ण 'पूजा मंत्र' या 'जप मंत्र' निम्नलिखित है। यह मंत्र ब्रह्मयामल की विधि के अनुसार 'प्रणव' (ॐ) और 'नमः/स्वाहा' से सम्पुटित है।

शुद्ध संस्कृत पाठ:

ॐ पं महोच्छुष्मायै नमः

मंत्र का अर्थ:

"मैं उस महाशक्ति (महोच्छुष्मा) को नमन करता हूँ, जिनका स्वरूप 'पं' बीज में निहित है और जो प्रचंड ताप और तेज की स्वामिनी हैं।"

वैकल्पिक कापालिक मंत्र (हवन हेतु):

यदि साधक दीक्षित है और हवन (अग्नि कार्य) कर रहा है, तो 'स्वाहा' अंत वाला मंत्र प्रयोग किया जाता है:

ॐ ह्रीं पं महोच्छुष्मा-गुह्यका-देव्यै स्वाहा

1.1 चतुर्-गुह्यका स्थापना मंत्र

महोच्छुष्मा की साधना कभी भी एकाकी में नहीं की जाती। ब्रह्मयामल के विधान के अनुसार, साधक को अपने चारों दिशाओं में चार गुह्यकाओं की मानसिक स्थापना (न्यास) करनी होती है। इसके बिना महोच्छुष्मा का आवाहन अपूर्ण माना जाता है।

विनियोग (दिशाओं के अनुसार):

दिशा देवी बीज मंत्र पूर्ण मंत्र
पूर्व रक्ता चं ॐ चं रक्तायै नमः
दक्षिण कराला डे ॐ डे करालायै नमः
पश्चिम चण्डाक्षी ॐ क चण्डाक्ष्यै नमः
उत्तर महोच्छुष्मा ॐ प महोच्छुष्मायै नमः

तात्पर्य: यह स्पष्ट करता है कि महोच्छुष्मा 'उत्तर' दिशा (कुबेर की दिशा) की स्वामिनी होने के साथ-साथ भैरव मंडल का एक अभिन्न अंग हैं।

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