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पढ़िए: अरण्यकाण्ड का तृतीय संस्कारण-अत्रि मुनि द्वारा प्रभु श्रीराम की वो स्तुति, जिसे पढ़ते ही सारे पाप जल जाते हैं!
श्रीराम

पढ़िए: अरण्यकाण्ड का तृतीय संस्कारण-अत्रि मुनि द्वारा प्रभु श्रीराम की वो स्तुति, जिसे पढ़ते ही सारे पाप जल जाते हैं!

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अत्रि मुनि द्वारा भगवान श्रीराम की स्तुति

अत्रि मुनि द्वारा भगवान श्रीराम की स्तुति

भगवान राम को अपने आसन पर विराजमान कर महर्षि अत्रि कुछ देर निहारते रहे। प्रभु की दिव्य छवि को नेत्रों में भरकर फिर उन्होंने हाथ जोड़कर श्रीराम की महिमा का स्तवन प्रारंभ किया:

अब हम महर्षि अत्रि द्वारा गाए गए उन स्तुति के छंद (श्लोक रूप) को मूल सहित समझते हैं:

स्तुति छंद 1

नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं॥
भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं॥

अर्थ: अत्रि मुनि कहते हैं – हे भक्तवत्सल प्रभु! हे कृपालु और कोमल स्वभाव वाले राम! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आप निष्काम (कोई इच्छा न रखने वाले) भक्तों को अपना परमधाम प्रदान करने वाले हैं, ऐसे आपके चरणकमलों का मैं भजन करता हूँ।

इस छंद में भगवान के भक्तवत्सल (भक्तों पर पुत्रवत स्नेह करने वाले) और कृपालु स्वभाव की महिमा बताई गई है। राम दयालु हैं, शील (सदाचार) में कोमल हैं, और जो भक्त बिना किसी कामना के उनकी शरण आते हैं, उन्हें अपना परमधाम (मोक्ष) देते हैं।

स्तुति छंद 2

निकाम श्याम सुंदरं। भवांबु नाथ मंदरं॥
प्रफुल्ल कंज लोचनं। मदादि दोष मोचनं॥

अर्थ: अत्रि आगे कहते हैं – आप निष्काम (अति अद्भुत) और श्यामवर्ण सुंदर हैं। संसार रूपी भवसागर को मथने के लिए आप मंदराचल पर्वत के समान (अर्थात संसार रूपी समुद्र से भक्तों को पार उतारने वाले) हैं। आपके नेत्र पूर्ण खिले कमल के समान सुंदर हैं। आप मद आदि सभी दोषों का नाश करने वाले हैं।

यह छंद प्रभु के रूप और कार्य की महिमा करता है: श्रीराम श्यामल, अत्यंत सुंदर हैं; वे जीवन-सागर से पार उतारने के लिए स्थिर आधार हैं, जैसे मंदार पर्वत ने समुद्र मंथन किया था; उनके नेत्र कमल की तरह खिले हैं; उनके स्मरण से अहंकार, क्रोध, लोभ जैसे दोष दूर हो जाते हैं।

स्तुति छंद 3

प्रलंब बाहु विक्रमं। प्रभो अप्रमेय वैभवं॥
निषंग चाप सायकं। धरं त्रिलोक नायकं॥

अर्थ: हे प्रभो! आपकी लंबी भुजाओं का पराक्रम महान है और आपका ऐश्वर्य अपरिमेय (बुद्धि से परे) है। आप तरकस, धनुष और बाण धारण करने वाले त्रिलोक के नायक हैं।

इस छंद में भगवान राम के वीर रूप और ऐश्वर्य का वर्णन है: उनकी भुजाएँ बलशाली और लंबी हैं, जिनसे उन्होंने शिव का धनुष तोड़ा और राक्षसों का संहार किया; उनका वैभव अनंत है जिसे कोई पूरी तरह नहीं जान सकता; सशस्त्र राम तीनों लोकों के स्वामी हैं।

स्तुति छंद 4

दिनेश वंश मंडनं। महेश चाप खंडनं॥
मुनींद्र संत रंजनं। सुरारि वृंद भंजनं॥

अर्थ: आप सूर्यवंश के भूषण हैं (दिनेश = सूर्य; श्रीराम सूर्यवंशी राजकुल को शोभित करने वाले हैं)। आपने महादेवजी का धनुष तोड़कर पराक्रम दिखाया है। आप मुनीन्द्रों (श्रेष्ठ मुनियों) और संतों को आनंद प्रदान करने वाले हैं। तथा देवताओं के शत्रु असुरों के समूह का नाश करने वाले हैं।

इस छंद में राम के अवतार का उद्देश्य झलकता है – वे इक्ष्वाकु सूर्यवंश की कीर्ति हैं, उन्होंने जनकपुर में शिवधनुष तोड़ा, वे सज्जन संतो को सुख देने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम हैं और राक्षसों का विनाश कर धर्म की रक्षा करने वाले हैं।

स्तुति छंद 5

मनोज वैरि वंदितं। अजादि देव सेवितं॥
विशुद्ध बोध विग्रहं। समस्त दूषणापहं॥

अर्थ: आप (श्रीराम) कामदेव के वैरी (महादेव शिव) द्वारा वंदित हैं, ब्रह्मा आदि देवताओं द्वारा सेवित हैं। आप विशुद्ध ज्ञानमय स्वरूप हैं तथा समस्त दोषों को दूर करने वाले हैं।

इस छंद में भगवान की आराध्यता प्रकट है – स्वयं शंकरजी (कामदेव को भस्म करने वाले) राम के परम भक्त हैं, ब्रह्मा-विष्णु-इंद्र सब देव उनकी सेवा करते हैं। राम सच्चिदानंद स्वरूप हैं (ज्ञान और आनंद के पुंज) और उनकी भक्ति से भक्तों के सभी पाप-दोष नष्ट हो जाते हैं।

स्तुति छंद 6

नमामि इंदिरा पतिं। सुखाकरं सतां गतिं॥
भजे सशक्ति सानुजं। शची पति प्रियानुजं॥

अर्थ: हे इंदिरा (लक्ष्मी) के पति विष्णुरूप श्रीराम! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आप सुखों के स्रोत हैं और संतजन जिसकी शरण पाकर परम गति पाते हैं, ऐसे आप ही हैं। मैं आपकी – आपकी शक्ति स्वरूपा श्री सीता सहित और छोटे भाई लक्ष्मण सहित – भक्तिभाव से वंदना करता हूँ। आप इंद्र के प्रिय अनुज वामन रूप भी हैं।

यहाँ अत्रि मुनि ने राम को सीधे विष्णु स्वरूप में संबोधित किया – इंदिरापति (लक्ष्मीपति) कहते हुए उनकी वंदना की और बताया कि राम सत्पुरुषों के लिए परमकल्याणकारी हैं। साथ ही, राम अपनी शक्ति (सीता) और अनंत शक्ति के सेवक स्वरूप (लक्ष्मण) सहित पूज्य हैं। इंद्र के प्रिय अनुज का संदर्भ वामन अवतार को इंगित करता है जिसमें विष्णु, इंद्र के छोटे भाई के रूप में प्रकट हुए थे।

स्तुति छंद 7

त्वदंघ्रि मूल ये नराः। भजंति हीन मत्सराः॥
पतंति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले॥

अर्थ: जो मनुष्य ईर्ष्या से रहित होकर आपके चरणकमलों की शरण में रहते हैं और भजन करते हैं, वे संदेह रूपी तरंगों से भरे इस संसार-सागर में नहीं गिरते।

अर्थात जो निष्कपट भाव से राम के चरणों का आश्रय लेते हैं वे पुनर्जन्म रूपी भवसागर में नहीं डूबते। इस छंद में राम-भक्ति की महिमा है – ईर्ष्या-द्वेष छोड़कर जो भक्तिभाव से राम को भजते हैं, उनका आवागमन से छुटकारा सुनिश्चित है (वे मोक्ष पाते हैं)। संसार रूपी समुद्र में वितर्क (अनर्गल तर्क, संशय) की लहरें उठती रहती हैं जो विश्वास को डगमगाती हैं, किन्तु रामचरन का आश्रय लेकर भक्त सुरक्षित पार हो जाते हैं।

स्तुति छंद 8

विविक्त वासिनः सदा। भजंति मुक्तये मुदा॥
निरस्य इंद्रियादिकं। प्रयांति ते गतिं स्वकं॥

अर्थ: जो पुरुष एकांत में वास करते हुए सदा हर्षपूर्वक आपको मुक्ति के लिए भजते हैं और इंद्रिय आदि विकारों को हटा देते हैं, वे अपनी परम गति को प्राप्त हो जाते हैं।

यहाँ ऋषि अत्रि सन्यासियों/वैरागियों की बात कर रहे हैं – जो संसार से दूर एकांत में रहकर परमात्मा की आराधना करते हैं, इंद्रियों को वश में रखते हैं, वे अपने स्वधाम (परम पद) को प्राप्त करते हैं। यह राम-नाम की मुक्ति-दायिनी शक्ति को रेखांकित करता है।

स्तुति छंद 9

तमेकमद्भुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुं॥
जगद्गुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलं॥

अर्थ: मैं उन राम को भजता हूँ जो अद्वितीय हैं, अद्भुत हैं, सबके प्रभु हैं; जिन्हें कोई सांसारिक इच्छा नहीं है (निरीह); जो ईश्वर हैं (सबके स्वामी) और विभु (सर्वव्यापी) हैं; जो जगद्गुरु हैं, शाश्वत हैं, तथा जो तुरीय (तीनों गुणों से परे, चतुर्थ अवस्था) और केवल अपने आप में स्थित परब्रह्म हैं।

इस छंद में भगवत्तर की दार्शनिक महिमा बयान की गई – राम सगुण होते हुए भी निर्गुण ब्रह्म हैं। वे अद्वितीय हैं (उनके समकक्ष कोई नहीं), निरीह हैं यानी उन्हें कोई व्यक्तिगत इच्छा-पक्षपात नहीं, जगद्गुरु हैं यानी समस्त संसार को धर्म का मार्ग दिखाने वाले गुरु हैं, शाश्वत (सनातन) हैं और साक्षात परब्रह्म हैं जो सत्-चित्-आनंद से परे तुरीय अवस्था में स्थित हैं। तुलसीदासजी राम को सगुण भगवान के साथ-साथ निर्गुण ब्रह्म के रूप में भी स्वीकारते हैं, जो इस स्तुति से स्पष्ट है।

स्तुति छंद 10

भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभं॥
स्वभक्त कल्प पादपं। समं सुसेव्यमन्वहं॥

अर्थ: मैं उन राम को निरंतर भजता हूँ जो भाव के ही प्रिय हैं (श्रद्धा-प्रेम से प्राप्त होते हैं); जो कुयोगियों (विषयी जनों) को अत्यंत दुर्लभ हैं; जो अपने भक्तों के लिए कल्पवृक्ष के समान हैं (उनकी सभी कामनाएँ पूर्ण करते हैं); जो सम (सबके प्रति समान दृष्टि वाले, निष्पक्ष) हैं और सदा सुखपूर्वक सेवन (आराधना) करने योग्य हैं।

यहाँ भगवान राम की कृपालु-निष्पक्ष प्रकृति एवं भक्तों के प्रति उदारता का बखान है – वे केवल भाव (प्रेम) के भूखे हैं, तप-योग के बल से नहीं बल्कि प्रेम-भक्ति से ही मिलते हैं। भौतिक आसक्त लोगों के लिए उनका मिलना बहुत कठिन है, मगर अपने प्रेमी भक्तों के लिए वे कल्पवृक्ष हैं जो मनचाहे वर देते हैं। राम अपने सभी भक्तों को बराबर स्नेह देते हैं (उच्च-नीच भेद नहीं) और उनका सेवन (स्मरण-पूजन) करना परम सुखदायक है।

स्तुति छंद 11

अनूप रूप भूपतिं। नतोऽहमुर्विजा पतिं॥
प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे॥

अर्थ: हे अनुपम रूप वाले राजाधिराज! हे उर्विजा (सीता) के स्वामी! मैं आपको नमन करता हूँ। मुझ पर प्रसन्न होइए – आपकी शरण आया हूँ। मुझे अपने चरणकमलों की भक्ति प्रदान करें।

इस छंद में अत्रि मुनि रामचंद्र को राजाओं के भी अधिपति (अयोध्या के भावी सम्राट) रूप में वंदन कर रहे हैं और माँ सीता के पति रूप में जानकीनाथ कहकर प्रणाम करते हैं। अंत में वे वर मांगते हैं कि हे प्रभु, मुझ पर प्रसन्न हों और मुझे अपने चरणों में अटूट भक्ति दीजिए। एक महान ऋषि की यह विनम्र याचना दर्शाती है कि भगवद्भक्ति ही सबसे बड़ा वरदान है।

स्तुति छंद 12 (फलश्रुति)

पठंति ये स्तवं इदं। नरादरेण ते पदं॥
व्रजंति नात्र संशयं। त्वदीय भक्ति संयुताः॥

अर्थ: मुनि कहते हैं – जो पुरुष इस स्तुति (प्रशंसा) को आदरपूर्वक पढ़ते हैं, वे आपकी भक्ति से युक्त होकर आपके परमपद को प्राप्त होते हैं – इसमें संदेह नहीं है।

यह छंद फलश्रुति है अर्थात इस स्तुति के फल का वर्णन। स्वयं अत्रि मुनि कहते हैं कि जो भी श्रद्धापूर्वक राम की इस स्तुति का पाठ करेगा, वह रामभक्ति पाकर अंततः राम के धाम (मोक्ष) को प्राप्त होगा। तुलसीदासजी प्रायः प्रत्येक प्रसंग में ऐसी फलश्रुति जोड़ते हैं ताकि पाठकों को भक्ति के मार्ग पर बढ़ने की प्रेरणा मिले।

महर्षि अत्रि की अंतिम प्रार्थना

प्रत्येक प्रसंग में ऐसी फलश्रुति जोड़ते हैं ताकि पाठकों को भक्ति के मार्ग पर बढ़ने की प्रेरणा मिले। महर्षि अत्रि की इस भावपूर्ण स्तुति के पश्चात् वे अपने मन की एक विनम्र प्रार्थना भगवान के समक्ष रखते हैं:

दोहा: “बिनती करि मुनि नाइ सिरु कह कर जोरि बहोरि।
चरण सरोरुह नाथ जनि कबहुँ तजै मति मोरि॥”

व्याख्या: स्तुति समाप्त करके और पुनः सिर झुकाकर हाथ जोड़कर मुनि अत्रि प्रार्थना करते हैं – हे नाथ! कृपा करके ऐसी कृपा करना कि मेरी बुद्धि आपके चरण कमलों को कभी भी न छोड़े।

दूसरे शब्दों में, मेरी भक्ति कभी कम न हो, मैं सदा आपके चरणों में स्थिर रहूँ – ऋषि का यही वरदान-स्वरूप निवेदन है। भगवान के प्रति अनन्य भक्ति बनी रहे, यही एक परम साधु की कामना होती है। अत्रि मुनि के इन वचनों पर भगवान श्रीराम ने प्रसन्न होकर उन्हें आश्वासन दिया होगा।

अगले भाग में हम माता अनसूया और माता सीता जी के भावपूर्ण मिलन के बारे में पढ़ेंगे। साथ ही जानेंगे कि माता अनसूया ने सीता जी को पतिव्रत धर्म का कौन-सा आदर्श पाठ पढ़ाया।

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