विस्तृत उत्तर
बेईमानी के पैसे से श्राद्ध करना सर्वथा वर्जित है। शास्त्रीय आधार के अनुसार मार्कण्डेय और विष्णु पुराण के अनुसार, अन्याय, छल-कपट या भ्रष्टाचार से अर्जित धन से किया गया श्राद्ध पितरों को स्वर्ग नहीं पहुँचाता, बल्कि वह नीच योनियों में पड़े जीवों को प्राप्त होता है, और पितर क्षुधा से पीड़ित रहते हैं।
स्पष्ट उत्तर यह है कि नहीं, बेईमानी के पैसे से श्राद्ध नहीं कर सकते। इसका कारण यह है कि बेईमानी अर्थात् धोखा, छल, चोरी आदि से कमाया गया धन अशुद्ध है, और अशुद्ध धन से किया गया श्राद्ध पितरों को कोई लाभ नहीं देता।
विष्णु पुराण इस सिद्धांत का प्रमुख स्रोत है। विष्णु पुराण इस बात पर सर्वाधिक बल देता है कि श्राद्ध सदैव न्याय और ईमानदारी से कमाए गए धन से ही किया जाना चाहिए। यह सर्वाधिक बल अर्थात् सबसे अधिक जोर देकर कहा गया है, क्योंकि यह श्राद्ध की मूल आत्मा है।
बेईमानी के अंतर्गत आने वाले तीन प्रकार के धन वर्जित हैं। पहला है अन्याय से अर्जित धन। अर्थात् किसी पर अत्याचार करके या उसका हक छीनकर कमाया गया धन। दूसरा है छल-कपट से अर्जित धन। अर्थात् धोखा देकर, ठगी करके, झूठ बोलकर कमाया गया धन। तीसरा है भ्रष्टाचार से अर्जित धन। अर्थात् रिश्वत, कमीशन, गबन आदि अनुचित तरीकों से कमाया गया धन।
इन तीनों प्रकार के धन से किए गए श्राद्ध के दुष्परिणाम भी स्पष्ट हैं। पहला परिणाम यह है कि ऐसा श्राद्ध पितरों को स्वर्ग नहीं पहुँचाता। अर्थात् पितरों की मुक्ति और सद्गति नहीं होती। दूसरा परिणाम यह है कि वह नीच योनियों में पड़े जीवों को प्राप्त होता है। नीच योनियाँ अर्थात् निकृष्ट और हीन योनियाँ। तीसरा और सबसे दुखद परिणाम यह है कि पितर क्षुधा से पीड़ित रहते हैं। क्षुधा अर्थात् भूख। अर्थात् पितर श्राद्ध के बावजूद भूख से तड़पते रहते हैं।
इस सिद्धांत के पीछे का दर्शन यह है कि जिस धन में किसी का दुख, अन्याय या आँसू मिले हों, वह कभी पवित्र नहीं हो सकता। श्राद्ध एक पवित्र अनुष्ठान है, और इसमें केवल पवित्र साधनों का प्रयोग होना चाहिए। बेईमानी का धन अपवित्र है, इसलिए इससे किया गया कोई भी अनुष्ठान निष्फल हो जाता है।
धन की शुद्धता के साथ कर्ता के आचरण की भी शुद्धता आवश्यक है। याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार श्राद्धकर्ता को पवित्र आचरण वाला, पत्नी के प्रति निष्ठावान और क्रोध-रहित होना चाहिए। अर्थात् केवल धन ही नहीं, कर्ता का जीवन भी पवित्र होना चाहिए।
इसके विपरीत निर्धन व्यक्तियों के लिए विष्णु पुराण ने करुणामय विकल्प दिए हैं। यदि किसी श्राद्धकर्ता के पास पिण्डदान करने या ब्राह्मणों को भोजन कराने के लिए धन और सामग्री का सर्वथा अभाव हो, तो उसे विचलित नहीं होना चाहिए। वह केवल थोड़ा सा कच्चा धान या एक मुट्ठी तिल अंजलि में जल के साथ लेकर किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान कर दे। यदि वह इतना भी करने में असमर्थ हो, तो वह कहीं से एक दिन का चारा लाकर श्रद्धापूर्वक गाय को खिला दे।
यदि वह इसके लिए भी अक्षम हो, तो वह एकांत वन में जाकर, अपनी दोनों भुजाएं आकाश की ओर उठाकर दिक्पालों और सूर्य देव की ओर देखते हुए ऊंचे स्वर में पितरों से प्रार्थना करे। यह सिद्ध करता है कि सच्ची श्रद्धा से किया गया छोटा सा कार्य भी, बेईमानी के बड़े आडंबर से कहीं अधिक श्रेष्ठ है।
यह उद्घोष सिद्ध करता है कि सनातन धर्म में भौतिक सामग्री से अधिक श्रद्धा और आंतरिक भावना का मूल्य है। निर्धन व्यक्ति भी अपनी सच्ची श्रद्धा से श्राद्ध कर सकता है, परंतु धनवान व्यक्ति बेईमानी के धन से कभी नहीं कर सकता। शास्त्रीय आधार के रूप में विष्णु पुराण और मार्कण्डेय पुराण इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः नहीं, बेईमानी के पैसे से श्राद्ध नहीं कर सकते। अन्याय, छल-कपट या भ्रष्टाचार से अर्जित धन से किया गया श्राद्ध पितरों को स्वर्ग नहीं पहुँचाता, बल्कि वह नीच योनियों में पड़े जीवों को प्राप्त होता है, और पितर क्षुधा से पीड़ित रहते हैं।
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