विस्तृत उत्तर
विष्णु पुराण के अत्यन्त सूक्ष्म ब्रह्माण्डीय सिद्धान्त के अनुसार महर्लोक का स्वरूप कृतकाकृतक है। शास्त्र स्पष्ट करते हैं कि नीचे के प्रथम तीन लोकों (त्रैलोक्य) को कृतक कहा जाता है — अर्थात ये पूर्णतः भौतिक, सकाम कर्मों के फलों से आबद्ध और विनाशशील हैं। इसके विपरीत सबसे ऊपर के तीन लोकों (जनलोक, तपोलोक, सत्यलोक) को पूर्णतः अविनाशी और नित्य माना गया है जिन्हें अकृतक कहा जाता है। महर्लोक इन दोनों सर्वथा भिन्न प्रकृतियों के मध्य स्थित एक महान संक्रमण क्षेत्र है इसीलिए इसे कृतकाकृतक कहा जाता है। इस गूढ़ सिद्धान्त का तात्पर्य यह है कि ब्रह्मा के दिन की समाप्ति पर होने वाले नैमित्तिक प्रलय के समय यद्यपि यह लोक अग्नि से पूरी तरह नष्ट या भस्म नहीं होता (यह इसका अकृतक गुण है) परन्तु अत्यधिक संताप के कारण यहाँ रहने वाले ऋषियों और मुनियों को यह लोक खाली करना पड़ता है जिससे यह पूर्णतः निर्जन हो जाता है (यह इसका कृतक गुण है)। इसीलिए विष्णु पुराण (२.७.१३) इसे पारिभाषिक रूप से कृतकाकृतक — Mixed or Partially Destructible — कहता है।
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