विस्तृत उत्तर
विष्णु पुराण में निर्धनों के लिए अंतिम उपाय एकांत वन में जाकर आकाश की ओर भुजाएं उठाकर पितरों से प्रार्थना करना है। शास्त्रीय आधार के अनुसार और यदि वह इसके लिए भी अक्षम हो, तो विष्णु पुराण कहता है कि वह एकांत वन में जाकर, अपनी दोनों भुजाएं आकाश की ओर उठाकर दिक्पालों और सूर्य देव की ओर देखते हुए ऊंचे स्वर में कहे, हे पितृगण, मेरे पास श्राद्ध कर्म के योग्य न कोई धन है, न सामग्री। मैं केवल आपको नमस्कार करता हूँ, आप मेरी इस भक्ति और अश्रुपूर्ण श्रद्धा से ही तृप्ति लाभ करें।
यह अंतिम उपाय कब अपनाया जाता है। यह तब अपनाया जाता है जब व्यक्ति इसके लिए भी अक्षम हो, अर्थात् न तो वह तिल-जल का दान कर सकता है, न ही गाय को चारा खिला सकता है। ऐसी स्थिति में यह अंतिम विकल्प है, जिसे करना सबसे आसान भी है और सबसे कठिन भी, क्योंकि इसमें सच्ची श्रद्धा की पराकाष्ठा होती है।
इस उपाय के मुख्य अंग इस प्रकार हैं। पहला अंग है एकांत वन में जाना। एकांत अर्थात् जहाँ कोई न हो, और वन अर्थात् जंगल या निर्जन स्थान। यह स्थान इसलिए चुना गया क्योंकि वहाँ ध्यान केंद्रित होता है, और कोई बाधा नहीं होती। दूसरा अंग है दोनों भुजाएं आकाश की ओर उठाना। आकाश की ओर भुजाएं उठाना शरणागति और पुकार का प्रतीक है। तीसरा अंग है दिक्पालों और सूर्य देव की ओर देखना। दिक्पाल अर्थात् दिशाओं के देवता। सूर्य देव अर्थात् सूर्य भगवान। इन्हें साक्षी बनाकर पुकारा जाता है। चौथा अंग है ऊंचे स्वर में पुकारना। मन में नहीं, बल्कि ऊंचे स्वर में, ताकि पितरों तक आवाज पहुँचे।
इस प्रार्थना का सम्पूर्ण रूप इस प्रकार है। हे पितृगण, मेरे पास श्राद्ध कर्म के योग्य न कोई धन है, न सामग्री। मैं केवल आपको नमस्कार करता हूँ, आप मेरी इस भक्ति और अश्रुपूर्ण श्रद्धा से ही तृप्ति लाभ करें। इस प्रार्थना में निर्धन व्यक्ति अपनी असमर्थता स्वीकार करता है, परंतु अपनी भक्ति और अश्रुपूर्ण श्रद्धा अर्पित करता है।
अश्रुपूर्ण श्रद्धा शब्द विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। अश्रुपूर्ण अर्थात् आँसुओं से भरी हुई। यह सच्ची श्रद्धा का प्रत्यक्ष प्रमाण है। जब व्यक्ति अपने पितरों के लिए कुछ न कर पाने के दुख में रोता है, और सच्चे मन से प्रार्थना करता है, तो उसकी अश्रुपूर्ण श्रद्धा से ही पितर तृप्त हो जाते हैं।
इस उपाय का दर्शन सनातन धर्म की पूर्णता को दर्शाता है। विष्णु पुराण का यह उद्घोष सिद्ध करता है कि सनातन धर्म में भौतिक सामग्री से अधिक श्रद्धा और आंतरिक भावना का मूल्य है। यह सिद्ध करता है कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी निर्धन हो, अपने पितरों के लिए श्राद्ध कर सकता है। उसे विचलित होने की आवश्यकता नहीं है।
यह करुणामय विधान सनातन धर्म की महानता को दर्शाता है। अन्य धर्मों या परम्पराओं में जहाँ अनुष्ठानों के लिए धन और सामग्री आवश्यक मानी जाती है, वहीं सनातन धर्म ने सच्ची श्रद्धा को सर्वोच्च माना है। निर्धन व्यक्ति की अश्रुपूर्ण श्रद्धा, धनवान व्यक्ति के बड़े आडंबर से कहीं अधिक श्रेष्ठ है।
विष्णु पुराण के तीन विकल्पों के क्रम में यह अंतिम है। पहला विकल्प है तिल-जल का दान। दूसरा विकल्प है गाय को चारा खिलाना। तीसरा और अंतिम विकल्प है एकांत वन में आकाश की ओर भुजाएं उठाकर प्रार्थना करना। ये तीनों विकल्प मिलकर यह सिद्ध करते हैं कि सनातन धर्म में हर परिस्थिति के लिए विकल्प है।
इसके विपरीत बेईमानी के धन से किया गया श्राद्ध सर्वथा वर्जित है। मार्कण्डेय और विष्णु पुराण के अनुसार, अन्याय, छल-कपट या भ्रष्टाचार से अर्जित धन से किया गया श्राद्ध पितरों को स्वर्ग नहीं पहुँचाता, बल्कि वह नीच योनियों में पड़े जीवों को प्राप्त होता है, और पितर क्षुधा से पीड़ित रहते हैं। इसलिए निर्धन व्यक्ति की सच्ची प्रार्थना, बेईमानी के धनवान के श्राद्ध से कहीं अधिक श्रेष्ठ है।
श्राद्ध की मूल भावना श्रद्धा है, जिसकी पुष्टि यह अंतिम उपाय करता है। श्राद्ध शब्द का अर्थ ही है श्रद्धया दीयते यस्मात् तत् श्राद्धम्, अर्थात् पितरों के निमित्त जो भी पूर्ण श्रद्धा और आस्तिकता के साथ अर्पित किया जाता है, वह श्राद्ध कहलाता है। शास्त्रीय आधार के रूप में विष्णु पुराण इस सिद्धांत का प्रमुख प्रामाणिक स्रोत है। निष्कर्षतः विष्णु पुराण में निर्धनों के लिए अंतिम उपाय यह है कि वह एकांत वन में जाकर, अपनी दोनों भुजाएं आकाश की ओर उठाकर, दिक्पालों और सूर्य देव की ओर देखते हुए ऊंचे स्वर में पितरों से प्रार्थना करे कि उसकी अश्रुपूर्ण श्रद्धा से ही पितर तृप्ति लाभ करें।
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