विस्तृत उत्तर
हाँ, तिल और जल से भी श्राद्ध हो सकता है। शास्त्रीय आधार के अनुसार विष्णु पुराण कहता है कि यदि किसी श्राद्धकर्ता के पास पिण्डदान करने या ब्राह्मणों को भोजन कराने के लिए धन और सामग्री का सर्वथा अभाव हो, तो उसे विचलित नहीं होना चाहिए। वह केवल थोड़ा सा कच्चा धान या एक मुट्ठी तिल अंजलि में जल के साथ लेकर किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान कर दे।
इस सरल विधि में मुख्य तीन बातें हैं। पहली बात है थोड़ा सा कच्चा धान, अर्थात् बहुत कम मात्रा में बिना पका हुआ धान। दूसरी बात है एक मुट्ठी तिल, अर्थात् हाथ में जितने तिल आ सकें। तीसरी बात है इन्हें अंजलि में जल के साथ लेना। अंजलि अर्थात् दोनों हाथों को जोड़कर बनाया गया कुंड। इन तीनों सामग्रियों को साथ लेकर किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान कर दिया जाता है।
यह विधि निर्धन व्यक्तियों के लिए विशेष रूप से प्रदान की गई है। विष्णु पुराण में निर्धन व्यक्तियों के लिए एक अत्यंत करुणापूर्ण और दार्शनिक विकल्प प्रस्तुत किया गया है। यह विधि उन लोगों के लिए है जिनके पास पिण्डदान या ब्राह्मण भोजन के लिए पर्याप्त धन और सामग्री नहीं है। ऐसे लोग विचलित न हों, बल्कि इस सरल विधि से श्राद्ध संपन्न करें।
यहाँ श्रेष्ठ ब्राह्मण शब्द विशेष महत्वपूर्ण है। दान साधारण ब्राह्मण को नहीं, बल्कि श्रेष्ठ ब्राह्मण को देना चाहिए। श्रेष्ठ अर्थात् ज्ञानी, सद्गुणी और धार्मिक ब्राह्मण। श्राद्ध में हव्य-कव्य का दान भगवान के भक्तों, ज्ञाननिष्ठ ब्राह्मणों या योगियों को ही देना चाहिए। यह सरल विधि भी इसी सिद्धांत के अनुसार होनी चाहिए।
इस सरल विधि के पीछे का दर्शन यह है कि श्राद्ध मात्रा से नहीं, श्रद्धा से होता है। थोड़ी सी सामग्री भी, यदि सच्ची श्रद्धा से अर्पित की जाए, तो पितरों को तृप्ति देती है। इसके विपरीत बहुत सी सामग्री, यदि बिना श्रद्धा या आडंबर से अर्पित की जाए, तो निष्फल हो जाती है।
यदि कोई इतना भी करने में असमर्थ हो, तो विष्णु पुराण ने और भी सरल विकल्प दिए हैं। यदि वह इतना भी करने में असमर्थ हो, तो वह कहीं से एक दिन का चारा लाकर श्रद्धापूर्वक गाय को खिला दे। अर्थात् तिल-जल भी न हो, तो गाय को चारा खिलाना भी श्राद्ध की पूर्ति करता है।
और यदि वह इसके लिए भी अक्षम हो, तो विष्णु पुराण कहता है कि वह एकांत वन में जाकर, अपनी दोनों भुजाएं आकाश की ओर उठाकर दिक्पालों और सूर्य देव की ओर देखते हुए ऊंचे स्वर में कहे, हे पितृगण, मेरे पास श्राद्ध कर्म के योग्य न कोई धन है, न सामग्री। मैं केवल आपको नमस्कार करता हूँ, आप मेरी इस भक्ति और अश्रुपूर्ण श्रद्धा से ही तृप्ति लाभ करें।
इन सब विकल्पों का सम्मिलित संदेश यह है कि सनातन धर्म में कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी गरीब हो, अपने पितरों के लिए श्राद्ध कर सकता है। श्राद्ध करना हर व्यक्ति का अधिकार और कर्तव्य है, और शास्त्रों ने इसके लिए हर परिस्थिति में विकल्प दिए हैं।
विष्णु पुराण का यह उद्घोष सिद्ध करता है कि सनातन धर्म में भौतिक सामग्री से अधिक श्रद्धा और आंतरिक भावना का मूल्य है। तिल और जल जैसी छोटी सी सामग्री से भी, सच्ची श्रद्धा के साथ श्राद्ध संपन्न हो सकता है। तिल का विशेष महत्व इसलिए भी है क्योंकि तिल साक्षात् भगवान वराह के पसीने की बूंदों से उत्पन्न हुए हैं, और पितरों को अत्यंत प्रिय हैं। शास्त्रीय आधार के रूप में विष्णु पुराण इस सिद्धांत का प्रमुख प्रामाणिक स्रोत है। निष्कर्षतः हाँ, तिल और जल से श्राद्ध हो सकता है। थोड़ा सा कच्चा धान या एक मुट्ठी तिल अंजलि में जल के साथ लेकर किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान करने से ही श्राद्ध की पूर्ति हो जाती है, यदि व्यक्ति निर्धन हो।
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