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पितरों को क्या चढ़ाने से अधिक तृप्ति होती है?

पितरों को मुनियों के योग्य पवित्र हविष्यान्न अर्थात् सात्त्विक अन्न, दूध, घी, कंद-मूल चढ़ाने से अलौकिक प्रसन्नता और तृप्ति प्राप्त होती है।

संक्षिप्त उत्तर

पितरों को मुनियों के योग्य पवित्र हविष्यान्न अर्थात् सात्त्विक अन्न, दूध, घी, कंद-मूल चढ़ाने से अलौकिक प्रसन्नता और तृप्ति प्राप्त होती है। यह पशुबलि या किसी जीव की हत्या से प्राप्त अन्न से कभी नहीं हो सकती। पितरों को तिल, कुशा, गाय का दूध, शहद, जौ और सफेद फूल भी अत्यंत प्रिय हैं।

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विस्तृत उत्तर

पितरों को सात्त्विक हविष्यान्न चढ़ाने से ही अधिक तृप्ति होती है। शास्त्रीय आधार के अनुसार पितरों को मुनियों के योग्य पवित्र हविष्यान्न अर्थात् सात्त्विक अन्न, दूध, घी, कंद-मूल से जो अलौकिक प्रसन्नता और तृप्ति प्राप्त होती है, वह पशुबलि या किसी जीव की हत्या से प्राप्त अन्न से कभी नहीं हो सकती।

हविष्यान्न का अर्थ देखें तो हविष्य का अर्थ है यज्ञ-योग्य पवित्र भोजन, और अन्न का अर्थ है खाद्य पदार्थ। अर्थात् हविष्यान्न वह पवित्र, सात्त्विक भोजन है जो यज्ञ में अर्पित किया जा सके। यह मुनियों के योग्य भी होता है, अर्थात् ऐसा भोजन जो ऋषि-मुनि भी ग्रहण कर सकें।

पितरों को प्रिय हविष्यान्न में मुख्य रूप से चार चीज़ें शामिल हैं। पहली चीज़ है सात्त्विक अन्न, जैसे चावल, गेहूँ, जौ आदि। दूसरी चीज़ है दूध, विशेष रूप से गाय का दूध। तीसरी चीज़ है घी, जो शुद्ध और पवित्र होता है। चौथी चीज़ है कंद-मूल, जैसे आलू, शकरकंद, अदरक आदि। ये सब सात्त्विक और अहिंसक भोजन हैं।

इन चीज़ों से पितरों को अलौकिक प्रसन्नता और तृप्ति प्राप्त होती है। अलौकिक का अर्थ है इस लोक से परे, अर्थात् दिव्य और परलौकिक। साधारण भोजन से पितरों को साधारण तृप्ति नहीं मिलती, बल्कि सात्त्विक हविष्यान्न से उन्हें दिव्य तृप्ति मिलती है। यह तृप्ति पशुबलि या किसी जीव की हत्या से प्राप्त अन्न से कभी नहीं मिल सकती।

इसके विपरीत मांस और हिंसक भोजन से पितर प्रसन्न नहीं होते। श्रीमद्भागवत महापुराण में देवर्षि नारद का स्पष्ट उपदेश है कि भागवत पुराण श्राद्ध में पशु-हिंसा और मांसाहार का पूर्णतः निषेध करता है। देवर्षि नारद स्पष्ट करते हैं कि धर्म का वास्तविक मर्म जानने वाला पुरुष श्राद्ध में भूलकर भी मांस का अर्पण न करे।

पितरों को प्रिय अन्य चीज़ें भी विशेष हैं। विष्णु पुराण और मत्स्य पुराण के अनुसार पितरों को तिल, कुशा, गाय का दूध, शहद, जौ और सफेद फूल अत्यंत प्रिय हैं। ये सब सात्त्विक और पवित्र हैं। तिल और कुशा साक्षात् भगवान वराह के दिव्य शरीर से उत्पन्न हुए हैं, इसलिए ये पितरों को अत्यंत प्रिय हैं।

पिण्ड बनाने में भी सात्त्विक सामग्रियों का प्रयोग होता है। पके हुए चावल, गाय का दूध, घी, शहद, जौ और काले तिल को मिलाकर गोलाकार पिण्ड निर्मित किए जाते हैं। इन सभी सामग्रियों से बने पिण्ड पितरों को अत्यंत प्रिय होते हैं, और उन्हें असीम तृप्ति देते हैं।

इसके विपरीत कुछ चीज़ें श्राद्ध में सर्वथा वर्जित हैं। मसूर की दाल, काला चना, धतूरा, कदम का फूल और बकरे का दूध श्राद्ध में सर्वथा वर्जित है। ये चीज़ें पितरों को प्रिय नहीं हैं, और इनसे तृप्ति नहीं मिलती।

श्राद्ध में आडंबर भी पितरों को प्रिय नहीं है। भागवत यह भी उपदेश देता है कि श्राद्ध में धन का अहंकार नहीं होना चाहिए, और अत्यधिक विस्तार या आडंबर करने से श्रद्धा, पात्र और देश-काल का संतुलन बिगड़ जाता है। पितर सच्ची श्रद्धा और सात्त्विक भोजन से ही प्रसन्न होते हैं। शास्त्रीय आधार के रूप में श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः पितरों को मुनियों के योग्य पवित्र हविष्यान्न अर्थात् सात्त्विक अन्न, दूध, घी, कंद-मूल चढ़ाने से अलौकिक प्रसन्नता और तृप्ति प्राप्त होती है। यह पशुबलि या किसी जीव की हत्या से प्राप्त अन्न से कभी नहीं हो सकती।

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