विस्तृत उत्तर
हाँ, गाय को चारा खिलाकर भी श्राद्ध किया जा सकता है। शास्त्रीय आधार के अनुसार विष्णु पुराण कहता है कि यदि वह इतना भी करने में असमर्थ हो, तो वह कहीं से एक दिन का चारा लाकर श्रद्धापूर्वक गाय को खिला दे।
यह विधि विशेष रूप से उन निर्धन व्यक्तियों के लिए है जिनके पास तिल और जल जितनी सामग्री भी नहीं है। विष्णु पुराण ने निर्धन व्यक्तियों के लिए तीन क्रमिक विकल्प दिए हैं, और गाय को चारा खिलाना दूसरा विकल्प है।
इस विधि की सरलता विशेष ध्यान देने योग्य है। केवल एक दिन का चारा लाना है। चारा कहीं से भी ला सकते हैं, अर्थात् अपने खेत से, या किसी से माँगकर, या जंगल से। मुख्य बात यह है कि चारा गाय को श्रद्धापूर्वक खिलाया जाए। श्रद्धापूर्वक शब्द बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि बिना श्रद्धा के यह कार्य भी निष्फल हो सकता है।
गाय का विशेष महत्व सनातन धर्म में है। गाय पवित्रता और देवत्व का प्रतीक है। पंचबलि में भी गौ बलि सबसे पहले होती है, अर्थात् गाय के लिए अंश सबसे पहले निकाला जाता है। गाय में सभी देवता निवास करते हैं, यह सनातन धर्म की मान्यता है। इसलिए गाय को चारा खिलाना श्राद्ध की पूर्ति कर सकता है।
विष्णु पुराण के तीन विकल्पों का क्रम इस प्रकार है। पहला विकल्प है थोड़ा सा कच्चा धान या एक मुट्ठी तिल अंजलि में जल के साथ ब्राह्मण को दान। दूसरा विकल्प है यदि यह भी संभव न हो, तो गाय को एक दिन का चारा खिलाना। तीसरा विकल्प है यदि यह भी संभव न हो, तो एकांत वन में जाकर आकाश की ओर भुजाएं उठाकर पितरों से प्रार्थना करना।
ये विकल्प इस बात को दर्शाते हैं कि सनातन धर्म में हर व्यक्ति को अपने पितरों के लिए कुछ न कुछ करने की संभावना दी गई है। चाहे वह कितना भी गरीब क्यों न हो, वह अपने पितरों को तृप्ति दे सकता है।
गाय को चारा खिलाने का दर्शन यह है कि गाय के माध्यम से श्राद्ध का अंश पितरों तक पहुँचता है। पंचबलि में गाय का अंश पवित्रता और देवत्व का प्रतीक है। गौ बलि अर्थात् गाय के लिए अंश, जो पवित्रता और देवत्व का प्रतीक है। इसी प्रकार जब निर्धन व्यक्ति गाय को चारा खिलाता है, तो वह कार्य पवित्र होता है, और श्राद्ध की पूर्ति करता है।
श्रद्धापूर्वक शब्द का विशेष महत्व है। केवल चारा खिलाने से बात नहीं बनती, बल्कि श्रद्धा भी आवश्यक है। श्राद्ध शब्द का मूल अर्थ ही है श्रद्धया दीयते यस्मात् तत् श्राद्धम्, अर्थात् पितरों के निमित्त जो भी पूर्ण श्रद्धा और आस्तिकता के साथ अर्पित किया जाता है, वह श्राद्ध कहलाता है। इसलिए चारा देते समय भी पितरों को याद करना और उनके लिए श्रद्धा रखना आवश्यक है।
इसके विपरीत यदि कोई धनवान व्यक्ति आडंबर से बड़ा श्राद्ध करता है, परंतु बेईमानी के धन से, तो वह श्राद्ध निष्फल हो जाता है। मार्कण्डेय और विष्णु पुराण के अनुसार, अन्याय, छल-कपट या भ्रष्टाचार से अर्जित धन से किया गया श्राद्ध पितरों को स्वर्ग नहीं पहुँचाता। इसलिए निर्धन व्यक्ति का गाय को चारा खिलाना, धनवान के बेईमानी के श्राद्ध से कहीं अधिक श्रेष्ठ है।
विष्णु पुराण का यह उद्घोष सिद्ध करता है कि सनातन धर्म में भौतिक सामग्री से अधिक श्रद्धा और आंतरिक भावना का मूल्य है। गाय को चारा खिलाना एक छोटा कार्य है, परंतु सच्ची श्रद्धा से किया जाए तो श्राद्ध की पूर्ति करता है। शास्त्रीय आधार के रूप में विष्णु पुराण इस सिद्धांत का प्रमुख प्रामाणिक स्रोत है। निष्कर्षतः हाँ, गाय को चारा खिलाकर भी श्राद्ध किया जा सकता है। यदि किसी के पास तिल और जल जितनी भी सामग्री न हो, तो वह कहीं से एक दिन का चारा लाकर श्रद्धापूर्वक गाय को खिला दे, और इससे श्राद्ध की पूर्ति हो जाती है।
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