विस्तृत उत्तर
श्राद्ध में हव्य-कव्य विशेष व्यक्तियों को ही देना चाहिए। शास्त्रीय आधार के अनुसार श्राद्ध में हव्य-कव्य का दान भगवान के भक्तों, ज्ञाननिष्ठ ब्राह्मणों या योगियों को ही देना चाहिए।
हव्य-कव्य का अर्थ देखें तो हव्य का अर्थ है देवताओं को अर्पित किया जाने वाला पवित्र पदार्थ, और कव्य का अर्थ है पितरों को अर्पित किया जाने वाला पवित्र पदार्थ। अर्थात् श्राद्ध में देवताओं और पितरों को अर्पित होने वाला सम्पूर्ण पवित्र दान हव्य-कव्य कहलाता है।
हव्य-कव्य देने योग्य तीन विशेष कोटियों के व्यक्ति हैं। पहली कोटि है भगवान के भक्त। दूसरी कोटि है ज्ञाननिष्ठ ब्राह्मण, अर्थात् ज्ञान में निष्ठा रखने वाले विद्वान ब्राह्मण। तीसरी कोटि है योगी, अर्थात् आध्यात्मिक साधना में लीन व्यक्ति।
यह विशेष चयन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि साधारण व्यक्तियों को हव्य-कव्य देना उचित नहीं है। श्राद्ध जैसे पवित्र अनुष्ठान में दान केवल उन्हीं को मिलना चाहिए जो वास्तव में आध्यात्मिक रूप से सक्षम हों। साधारण लोग जो धर्म-कर्म से दूर हैं, वे श्राद्ध के दान को ग्रहण करने के योग्य नहीं हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण इस सिद्धांत का प्रमुख स्रोत है। श्रीमद्भागवत महापुराण के सप्तम स्कन्ध के 14वें और 15वें अध्याय में देवर्षि नारद महाराज युधिष्ठिर को गृहस्थ धर्म और मोक्ष धर्म का उपदेश देते हुए श्राद्ध के गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन करते हैं। इन्हीं अध्यायों में हव्य-कव्य के पात्र के बारे में स्पष्ट निर्देश है।
हर कोटि का अपना विशेष महत्व है। भगवान के भक्त वे होते हैं जो भगवान की भक्ति में लीन रहते हैं, और जिनका जीवन धर्म के अनुसार होता है। उनका दान का ग्रहण पितरों तक सीधा पहुँचता है। ज्ञाननिष्ठ ब्राह्मण वे होते हैं जो वेद, शास्त्र, उपनिषद आदि के ज्ञानी होते हैं, और ज्ञान में निष्ठा रखते हैं। ऐसे ब्राह्मण श्राद्ध के दान को सच्चे अर्थ में ग्रहण करने के योग्य होते हैं। योगी वे होते हैं जो योग साधना में लीन रहते हैं, और सांसारिक मोह-माया से दूर होते हैं। उनका जीवन तपस्यापूर्ण होता है, इसलिए उन्हें भी हव्य-कव्य देना श्रेष्ठ माना जाता है।
इन तीनों कोटियों के व्यक्तियों को दान देने का कारण यह है कि वे श्राद्ध के अंश को सच्चे श्रद्धा से ग्रहण करते हैं, और उनके माध्यम से ही पितरों तक श्राद्ध का अंश पहुँचता है। साधारण लोगों को दान देने से श्राद्ध फलहीन हो सकता है।
श्राद्ध में आडंबर भी वर्जित है। भागवत यह भी उपदेश देता है कि श्राद्ध में धन का अहंकार नहीं होना चाहिए, अत्यधिक विस्तार या आडंबर करने से श्रद्धा, पात्र और देश-काल का संतुलन बिगड़ जाता है। यहाँ पात्र का अर्थ है उचित प्राप्तकर्ता। पात्र का सही चयन ही श्राद्ध की सफलता है।
ब्राह्मणों के व्यवहार में भी सावधानी आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति क्रोध करता है, मार्ग गमन करता है, या अनुचित आचरण करता है, तो पितर निराश होकर लौट जाते हैं। इसलिए हव्य-कव्य देने से पहले ब्राह्मणों के आचरण और गुणों की पुष्टि करनी चाहिए।
याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार श्राद्धकर्ता को भी पवित्र आचरण वाला, पत्नी के प्रति निष्ठावान और क्रोध-रहित होना चाहिए। यह सिद्ध करता है कि श्राद्ध में देने वाले और लेने वाले दोनों की पवित्रता आवश्यक है। शास्त्रीय आधार के रूप में श्रीमद्भागवत महापुराण, याज्ञवल्क्य स्मृति इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः श्राद्ध में हव्य-कव्य का दान भगवान के भक्तों, ज्ञाननिष्ठ ब्राह्मणों या योगियों को ही देना चाहिए। साधारण लोगों को नहीं, बल्कि वास्तव में आध्यात्मिक रूप से सक्षम व्यक्तियों को ही श्राद्ध का दान मिलना चाहिए।
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