विस्तृत उत्तर
श्राद्ध न्याय और ईमानदारी से कमाए गए धन से ही करना चाहिए। शास्त्रीय आधार के अनुसार विष्णु पुराण इस बात पर सर्वाधिक बल देता है कि श्राद्ध सदैव न्याय और ईमानदारी से कमाए गए धन से ही किया जाना चाहिए।
विष्णु पुराण इस सिद्धांत का प्रमुख स्रोत है। विष्णु पुराण के तृतीय अंश के 14वें से 16वें अध्याय में महर्षि और्व श्राद्ध की विस्तृत महिमा का वर्णन करते हैं। इन्हीं अध्यायों में धन की शुद्धता पर विशेष बल दिया गया है।
धन की शुद्धता का महत्व इसलिए है क्योंकि अशुद्ध धन से किया गया श्राद्ध फलहीन या उल्टा फल देने वाला होता है। मार्कण्डेय और विष्णु पुराण के अनुसार, अन्याय, छल-कपट या भ्रष्टाचार से अर्जित धन से किया गया श्राद्ध पितरों को स्वर्ग नहीं पहुँचाता, बल्कि वह नीच योनियों में पड़े जीवों को प्राप्त होता है, और पितर क्षुधा से पीड़ित रहते हैं।
यहाँ तीन प्रकार के अशुद्ध धन का वर्णन है। पहला है अन्याय से अर्जित धन, अर्थात् किसी के साथ अन्याय करके कमाया गया धन। दूसरा है छल-कपट से अर्जित धन, अर्थात् धोखा देकर या ठगी करके कमाया गया धन। तीसरा है भ्रष्टाचार से अर्जित धन, अर्थात् रिश्वत, कमीशन आदि अनुचित तरीकों से कमाया गया धन। ये तीनों प्रकार के धन श्राद्ध में पूर्णतः वर्जित हैं।
अशुद्ध धन से किए गए श्राद्ध के दुष्परिणाम भी विशेष हैं। ऐसे धन से किया गया श्राद्ध पितरों को स्वर्ग नहीं पहुँचाता। अर्थात् पितरों की मुक्ति और तृप्ति नहीं होती। इसके बजाय वह नीच योनियों में पड़े जीवों को प्राप्त होता है। नीच योनियाँ अर्थात् चाण्डाल आदि के समान निकृष्ट योनियाँ। इसका अर्थ है कि अशुद्ध धन से अर्पित अंश पितरों तक नहीं, बल्कि नीच जीवों तक पहुँचता है।
इसका सबसे दुखद परिणाम यह है कि पितर क्षुधा से पीड़ित रहते हैं। क्षुधा का अर्थ है भूख। अर्थात् पितर भूख से तड़पते रहते हैं, क्योंकि उन्हें श्राद्ध का अंश नहीं मिल पाता। यह कर्ता के लिए सबसे बड़ी हानि है, क्योंकि उसका उद्देश्य पितरों को तृप्ति देना था, परंतु वे और अधिक पीड़ित हो जाते हैं।
इसलिए श्राद्ध में धन की शुद्धता सर्वोपरि है। न्याय का अर्थ है उचित मार्ग से कमाया गया धन। ईमानदारी का अर्थ है बिना धोखे या छल के कमाया गया धन। ऐसा धन ही श्राद्ध के योग्य होता है, क्योंकि उससे किया गया श्राद्ध पितरों तक सच्चे रूप में पहुँचता है।
भागवत भी इस सिद्धांत की पुष्टि करता है। भागवत यह भी उपदेश देता है कि श्राद्ध में धन का अहंकार नहीं होना चाहिए। अर्थात् केवल शुद्ध धन ही नहीं, बल्कि उस धन पर अहंकार भी नहीं होना चाहिए। श्राद्ध सरलता और श्रद्धा से होना चाहिए, धन से नहीं।
निर्धन व्यक्तियों के लिए विष्णु पुराण का करुणामय विकल्प भी इस सिद्धांत को मजबूत करता है। यदि किसी श्राद्धकर्ता के पास पिण्डदान करने या ब्राह्मणों को भोजन कराने के लिए धन और सामग्री का सर्वथा अभाव हो, तो वह केवल थोड़ा सा कच्चा धान या एक मुट्ठी तिल अंजलि में जल के साथ लेकर किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान कर दे, या गाय को चारा खिला दे, या आकाश की ओर भुजाएं उठाकर श्रद्धा से प्रार्थना करे। इससे भी श्राद्ध की पूर्ति हो जाती है।
यह सिद्ध करता है कि सनातन धर्म में भौतिक सामग्री से अधिक श्रद्धा और आंतरिक भावना का मूल्य है। शुद्ध धन और सच्ची श्रद्धा ही श्राद्ध की वास्तविक पूँजी है। शास्त्रीय आधार के रूप में विष्णु पुराण और मार्कण्डेय पुराण इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः श्राद्ध सदैव न्याय और ईमानदारी से कमाए गए धन से ही करना चाहिए। अन्याय, छल-कपट या भ्रष्टाचार से अर्जित धन से किया गया श्राद्ध पितरों को स्वर्ग नहीं पहुँचाता, बल्कि वह नीच योनियों में पड़े जीवों को प्राप्त होता है, और पितर क्षुधा से पीड़ित रहते हैं।
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