विस्तृत उत्तर
विष्णु पुराण के अत्यन्त सूक्ष्म ब्रह्माण्डीय सिद्धान्त के अनुसार महर्लोक का स्वरूप कृतकाकृतक है। कृतक का अर्थ है विनाशशील और अकृतक का अर्थ है अविनाशी। कृतकाकृतक का अर्थ है — जो आंशिक रूप से विनाशशील हो और आंशिक रूप से अविनाशी हो। इस गूढ़ सिद्धान्त का तात्पर्य यह है कि ब्रह्मा के दिन की समाप्ति पर होने वाले नैमित्तिक प्रलय के समय यद्यपि यह लोक अग्नि से पूरी तरह नष्ट या भस्म नहीं होता (यह इसका अकृतक गुण है) परन्तु अत्यधिक संताप के कारण यहाँ रहने वाले ऋषियों और मुनियों को यह लोक खाली करना पड़ता है जिससे यह पूर्णतः निर्जन हो जाता है (यह इसका कृतक गुण है)। विष्णु पुराण (२.७.१३) में पारिभाषिक रूप से इसे यही कहा गया है।
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