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'यद्गत्वा न निवर्तन्ते' और 'क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं

'क्षीणे पुण्ये' = स्वर्लोक में पुण्य खत्म होने पर वापसी। 'यद्गत्वा न निवर्तन्ते' = मोक्ष में कोई वापसी नहीं।

संक्षिप्त उत्तर

'क्षीणे पुण्ये' = स्वर्लोक में पुण्य खत्म होने पर वापसी। 'यद्गत्वा न निवर्तन्ते' = मोक्ष में कोई वापसी नहीं। यही स्वर्लोक (अस्थायी) और परम धाम (नित्य) का मूल अंतर है।

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विस्तृत उत्तर

भगवद्गीता के दो श्लोक स्वर्लोक और मोक्ष के बीच के मूलभूत अंतर को स्पष्ट करते हैं। पहला श्लोक — गीता (9.21) का 'क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति' — यह स्वर्लोक का वर्णन है। इसका अर्थ है कि जब जीवात्मा का संचित पुण्य क्षीण हो जाता है तो उसे अनिवार्य रूप से पुनः मृत्युलोक पर लौटकर जन्म लेना पड़ता है। यहाँ से वापसी निश्चित है। दूसरा श्लोक — गीता (15.6) का 'यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम' — यह भगवान के परम धाम (वैकुंठ/ब्रह्म-अवस्था/मोक्ष) का वर्णन है। इसका अर्थ है — वह परम धाम जहाँ जाने के पश्चात जीव लौटकर वापस संसार में नहीं आता। यहाँ से वापसी नहीं है। इस प्रकार पहला श्लोक स्वर्लोक की अनित्यता (पुण्य क्षीण होने पर वापसी) को दर्शाता है जबकि दूसरा श्लोक मोक्ष की नित्यता (कोई वापसी नहीं) को स्थापित करता है। यही स्वर्लोक और मोक्ष के बीच का सबसे महत्वपूर्ण तात्विक अंतर है।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

'यद्गत्वा न निवर्तन्ते' और 'क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति' में क्या मूल अंतर है को संदर्भ सहित समझें

'यद्गत्वा न निवर्तन्ते' और 'क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति' में क्या मूल अंतर है का सबसे सीधा सार यह है: 'क्षीणे पुण्ये' = स्वर्लोक में पुण्य खत्म होने पर वापसी। 'यद्गत्वा न निवर्तन्ते' = मोक्ष में कोई वापसी नहीं। यही स्वर्लोक (अस्थायी) और परम धाम (नित्य) का मूल...

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