विस्तृत उत्तर
लक्ष्मी तंत्र और वैदिक शास्त्रों के एक अत्यंत गूढ़ एवं सुंदर श्लोक में देवी अपने नाम का अर्थ और अपनी भूमिका को स्वयं स्पष्ट करती हैं:
साक्षिणी सर्वभूतानां लक्षयामि शुभाशुभम्। लक्ष्मी चास्मि हरे नित्यं लक्ष्यं सर्वमतेरहम्।।
इस श्लोक का अर्थ अत्यंत गंभीर है। देवी कहती हैं कि मैं सब जीवों की साक्षिणी हूँ, अर्थात् मैं सबको देखने वाली हूँ। मैं समस्त प्राणियों के पुण्य और पाप देखती हूँ। मैं नित्य रूप से हरि (विष्णु) की लक्ष्मी हूँ और मैं सारे ज्ञान तथा मति का एकमात्र लक्ष्य हूँ।
इस विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि लक्ष्मी केवल अंधाधुंध धन प्रदान करने वाली कोई तटस्थ शक्ति नहीं हैं, बल्कि वे मानव के कर्मों (शुभ और अशुभ) का अत्यंत सूक्ष्म निरीक्षण करने वाली 'साक्षिणी' हैं। मनुष्य के जीवन में धन या ऐश्वर्य का आगमन उसके शुभ कर्मों का परिणाम है, और यदि वह कर्म दूषित हो जाए, तो साक्षिणी के रूप में लक्ष्मी तत्काल उस स्थान से विमुख हो जाती हैं।





