विस्तृत उत्तर
वास्तु शास्त्र के अनुसार भवन निर्माण में आकार का बहुत महत्व है। वास्तु के मूल सिद्धांत वर्गाकार और आयताकार आकारों को सर्वोत्तम मानते हैं क्योंकि इनमें ऊर्जा का वितरण समान रूप से होता है और सभी कोण 90 डिग्री के होते हैं।
गोल या वृत्ताकार आकार का कमरा या भवन वास्तु शास्त्र में आवासीय प्रयोजन के लिए अशुभ माना गया है। गोल आकार में कोई स्पष्ट कोना नहीं होता, इसलिए ऊर्जा का प्रवाह असंतुलित रहता है। वास्तु में ऊर्जा के प्रवाह के लिए सुस्पष्ट दिशाओं और कोणों की आवश्यकता होती है जो गोल आकार में संभव नहीं है।
गोल आकार में ब्रह्मस्थान की पहचान और ऊर्जा का केंद्रीयकरण भी ठीक से नहीं हो पाता। इससे घर में रहने वाले लोगों को मानसिक अस्थिरता, निर्णय लेने में कठिनाई और आर्थिक उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ सकता है।
हालाँकि सार्वजनिक भवनों जैसे मंदिर, रंगमंच, सभागार आदि में गोल या अर्धगोलाकार आकार स्वीकार्य है क्योंकि वहाँ निवास नहीं होता।
दर्पण के लिए भी वास्तु में गोल या अण्डाकार आकार वर्जित है। चौकोर या आयताकार दर्पण ही शुभ माना जाता है। गोल आकार की डाइनिंग टेबल भी वास्तु में अनुपयुक्त मानी जाती है।





