विस्तृत उत्तर
ऑनलाइन पूजा = आधुनिक अवधारणा; शास्त्रों में उल्लेख स्वाभाविक रूप से नहीं।
शास्त्रसम्मत क्यों हो सकती
- 1संकल्प — पूजा = संकल्प (intention) प्रधान। संकल्प लेकर ऑनलाइन कराई पूजा = फलदायी (वैदिक सिद्धांत)।
- 2प्रतिनिधि पूजा — शास्त्रों में 'प्रतिनिधि' (agent) द्वारा पूजा = मान्य। राजा पुरोहित से पूजा कराते थे = प्राचीन परंपरा। ऑनलाइन = आधुनिक प्रतिनिधि पूजा।
- 3भाव प्रधान — गीता 9.26 — भाव = सर्वोपरि।
सीमाएं
- 1भौतिक उपस्थिति = अधिक प्रभावी (प्राण प्रतिष्ठा, ऊर्जा, वातावरण)।
- 2विश्वसनीयता — क्या पूजा वास्तव में हो रही है? विश्वसनीय संस्था/पंडित।
- 3व्यावसायीकरण — कई ऑनलाइन सेवाएं = व्यापार; शास्त्रीयता कम।
व्यावहारिक: दूर हो/जा न सकें → ऑनलाइन = विकल्प (प्रतिस्थापन नहीं)। संभव हो तो स्वयं/भौतिक = श्रेष्ठ।
सार: शास्त्रीय सिद्धांत (संकल्प + प्रतिनिधि) = मान्य करते हैं। परंतु ऑनलाइन = विकल्प; स्वयं पूजा/भौतिक उपस्थिति = सर्वोत्तम।



