विस्तृत उत्तर
यह आधुनिक युग का महत्वपूर्ण प्रश्न है। शास्त्रों में ऑनलाइन दर्शन का उल्लेख स्वाभाविक रूप से नहीं, परंतु भक्ति के सिद्धांतों से उत्तर मिलता है।
ऑनलाइन दर्शन — शुभ है
- 1भाव प्रधान — गीता 9.26 — भगवान भाव देखते हैं, माध्यम नहीं। सच्चे भाव से ऑनलाइन दर्शन भी फलदायी।
- 2कलियुग में नाम स्मरण पर्याप्त — 'कलियुग केवल नाम अधारा' — यदि नाम मात्र से पुण्य, तो दर्शन (किसी भी माध्यम) से भी।
- 3असमर्थ व्यक्ति — बीमार, वृद्ध, विकलांग, दूरदराज — इनके लिए ऑनलाइन दर्शन अत्यंत लाभकारी।
मंदिर जाना श्रेष्ठ — क्यों
- 1प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति — मंदिर की मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा होती है; ऊर्जा अनुभव भिन्न।
- 2वातावरण — मंदिर का वातावरण (मंत्र, घंटी, धूप, भक्तों का समूह) अद्वितीय।
- 3परिक्रमा/प्रसाद — भौतिक उपस्थिति में ही संभव।
- 4सत्संग — भक्तों का संग।
सार: ऑनलाइन दर्शन = पुण्य (भाव से)। मंदिर = अधिक पुण्य (भौतिक अनुभव)। दोनों शुभ, परंतु मंदिर श्रेष्ठ। ऑनलाइन = विकल्प (असमर्थ के लिए), प्रतिस्थापन नहीं।





