विस्तृत उत्तर
मानसिक जप = सदैव अनुमत। इसमें कोई विवाद नहीं।
विस्तार
- 1मन में जप — ईश्वर नाम, मंत्र, भजन — मन में कभी वर्जित नहीं। 'कलियुग केवल नाम अधारा' — नाम स्मरण सदैव शुभ।
- 2माला से जप — कुछ परंपरा में वर्जित (माला स्पर्श = पूजा सामग्री); कुछ में अनुमत।
- 3मुखर (बोलकर) जप — कुछ परंपरा में वर्जित; कुछ में अनुमत।
- 4गीता/रामायण पाठ — श्रवण (सुनना) = सदैव अनुमत। पुस्तक स्पर्श = कुछ में वर्जित।
सर्वसम्मत: मन में ईश्वर स्मरण = सदैव, सभी अवस्थाओं में, सभी परंपराओं में अनुमत और शुभ। भगवान भाव देखते हैं, शरीर की अवस्था नहीं।





