देवशयनी (आषाढ़ शुक्ल) एकादशी की संपूर्ण, पारंपरिक एवं प्रमाण-आधारित व्रत कथा
सनातन धर्म के व्रत-पर्व विधानों में आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का अत्यंत विशिष्ट और सर्वोपरि स्थान है। इस पावन तिथि को पारंपरिक रूप से 'देवशयनी एकादशी', 'हरिशयनी एकादशी', 'पद्मा एकादशी', 'आषाढ़ी एकादशी' और 'देवपोढ़ी एकादशी' के नाम से जाना जाता है । पारंपरिक व्रत कथाओं और पौराणिक संदर्भों का गहन विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि देवशयनी एकादशी के दिन पढ़ी और सुनी जाने वाली मुख्य कथा मुख्य रूप से दो प्राचीन ग्रंथों—'पद्म पुराण' (उत्तर खण्ड, अध्याय ५७) तथा 'भविष्योत्तर पुराण'—पर आधारित है ।
इस दिन व्रत का पारण करने वाले और उपवास रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए केवल पारंपरिक कथा का श्रवण ही विहित है। इस रिपोर्ट में पद्म पुराण और भविष्योत्तर पुराण में वर्णित उस मूल, अक्षुण्ण और प्रामाणिक कथा को पूर्ण विस्तार और पारंपरिक संवादों के साथ प्रस्तुत किया गया है, जिसका वाचन सदियों से इस एकादशी के दिन होता आ रहा है。
तथ्यात्मक और शास्त्रीय संदर्भों को स्पष्ट करने हेतु निम्नलिखित तालिका में कथा के मूल स्रोतों और उनके प्रमुख प्रसंगों का वर्गीकरण किया गया है:
| शास्त्रीय स्रोत / पुराण | वर्णित एकादशी का नाम | मुख्य पात्र एवं संवाद | कथा का मूल प्रसंग |
|---|---|---|---|
| भविष्योत्तर पुराण | देवशयनी, पद्मा एकादशी | युधिष्ठिर-श्रीकृष्ण, ब्रह्मा-नारद | सूर्यवंशी राजा मान्धाता, राज्य में अकाल, महर्षि अंगिरा का उपदेश और व्रत के प्रभाव से वर्षा । |
| पद्म पुराण (उत्तर खण्ड) | हरिशयनी, पद्मा एकादशी | युधिष्ठिर-श्रीकृष्ण | चांडाल/शूद्र की तपस्या से अकाल, एकादशी व्रत से संकट निवारण, चातुर्मास के नियम । |
| वामन / ब्रह्म वैवर्त पुराण | देवशयनी एकादशी | वामन-बलि, लक्ष्मी-बलि | वामन अवतार, राजा बलि का दान, भगवान विष्णु का पाताल में चार मास के लिए शयन (चातुर्मास आरंभ) । |
नीचे उस पूर्ण, क्रमबद्ध और प्रामाणिक पारंपरिक कथा का विस्तृत प्रस्तुतीकरण किया गया है, जिसमें कोई भी आधुनिक दार्शनिक विश्लेषण या कल्पित प्रसंग नहीं जोड़ा गया है。
१. कथा का पारंपरिक प्रारंभ: युधिष्ठिर-श्रीकृष्ण संवाद
पौराणिक कथा की पारंपरिक संरचना सदैव एक महान संवाद से आरंभ होती है। देवशयनी एकादशी की यह परम पावन कथा द्वापर युग में पाण्डव ज्येष्ठ, धर्मराज युधिष्ठिर और योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के मध्य हुए उस अलौकिक संवाद से प्रारंभ होती है, जिसमें मानव जाति के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया गया है ।
युधिष्ठिर द्वारा प्रश्न और भगवान की स्तुति
कुरुक्षेत्र के भीषण युद्ध के पश्चात जब धर्मराज युधिष्ठिर ने राजसिंहासन ग्रहण किया, तो उनके अंतर्मन में अपनी प्रजा के लौकिक एवं पारलौकिक कल्याण की चिंता सदैव बनी रहती थी। एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने अत्यंत विनम्रता, श्रद्धा और भक्ति-भाव से कमलनयन भगवान श्रीकृष्ण को साष्टांग प्रणाम किया। हाथ जोड़कर स्तुति करते हुए युधिष्ठिर ने कहा:
"हे त्रिलोकीनाथ! हे देवकीनंदन! हे अच्युत! हे जगदीश्वर! आपको मेरा बारंबार प्रणाम है। हे माधव! आप संपूर्ण चराचर जगत के स्वामी हैं, आप ही सृष्टि के रचयिता, पालनहार और संहारकर्ता हैं। हे कृपानिधान! आपके श्रीमुख से मैंने अनेक व्रतों और उपवासों की महिमा का श्रवण किया है, परंतु मेरी ज्ञान-पिपासा अभी शांत नहीं हुई है। कृपा करके मेरे एक बड़े संशय का निवारण करें। हे केशव! आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है, उसका वास्तविक नाम क्या है? उस पावन दिन किस अधिष्ठात्री देवता की पूजा की जाती है? उस एकादशी के व्रत की उत्पत्ति कैसे हुई और उसका माहात्म्य क्या है? हे कमलनयन! आप भक्तवत्सल हैं, अतः कृपा करके इस व्रत का पूर्ण और विस्तृत विधान तथा उससे जुड़ी वह पवित्र कथा मुझे आदि से अंत तक सुनाने की कृपा करें, जिसके श्रवण मात्र से संसार के सभी प्राणियों का उद्धार हो सके" ।
श्रीकृष्ण द्वारा देवशयनी एकादशी का माहात्म्य-वर्णन
धर्मराज युधिष्ठिर के ऐसे लोक-कल्याणकारी और धर्म-युक्त वचनों को सुनकर भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न हुए। उनके मुखमंडल पर एक अलौकिक मुस्कान छा गई और वे मेघ के समान गंभीर परंतु अत्यंत मधुर वाणी में बोले:
"हे राजन्! हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ युधिष्ठिर! तुमने संपूर्ण मानव जाति के परम कल्याण के लिए अत्यंत उत्तम और लोकोपकारी प्रश्न किया है। तीनों लोकों में और चौदह भुवनों में एकादशी के समान पापनाशक, पवित्र और पुण्यदायी कोई अन्य व्रत नहीं है । जो मनुष्य इस जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पाकर मोक्ष की इच्छा रखता है, उसे एकादशी का व्रत नियमपूर्वक अवश्य करना चाहिए。
हे धर्मराज! आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की इस परम पवित्र एकादशी का नाम 'पद्मा एकादशी' है। इसे संसार में 'देवशयनी', 'हरिशयनी' अथवा 'आषाढ़ी एकादशी' के नाम से भी जाना जाता है । इस दिन सर्वव्यापी, सर्वेश्वर, इंद्रियों के स्वामी भगवान हृषीकेश (विष्णु) की विशेष रूप से पूजा की जाती है। हे पाण्डव श्रेष्ठ! जो मनुष्य इस दिन श्रद्धापूर्वक कमल के पुष्पों से भगवान नारायण का पूजन करता है, उसने मानो तीनों लोकों और तीनों सनातन देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का पूजन पूर्ण कर लिया हो ।
हे युधिष्ठिर! इस एकादशी के संदर्भ में मैं तुम्हें वही परम पवित्र, रहस्यमयी और प्राचीन कथा सुनाता हूँ, जिसे सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा जी ने अपने मानस पुत्र देवर्षि नारद को सुनाया था । इस दिव्य कथा के श्रवण मात्र से ही मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के संचित घोर पाप नष्ट हो जाते हैं, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, और वह मोक्ष के मार्ग पर आने वाली सभी बाधाओं को पार कर परम गति को प्राप्त होता है । तुम एकाग्र चित्त होकर इस इतिहास का श्रवण करो।"
पारंपरिक आरंभिक वाक्य: ब्रह्मा-नारद संवाद
श्रीकृष्ण ने कहा—"हे युधिष्ठिर! प्राचीन काल की बात है, एक बार देवर्षि नारद अपने हाथों में वीणा लिए, 'नारायण-नारायण' का गान करते हुए सत्यलोक में पहुँचे। वहाँ जाकर उन्होंने अपने पिता, चतुर्मुख ब्रह्मा जी को साष्टांग प्रणाम किया और हाथ जोड़कर विनीत भाव से पूछा:
'हे पितामह! हे जगत के स्रष्टा! मैं आपके श्रीचरणों में वंदना करता हूँ। कृपा कर मुझे यह बताने का कष्ट करें कि आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम क्या है? उस दिन किस देवता का पूजन होता है और इस व्रत को करने से किस फल की प्राप्ति होती है?'
देवर्षि नारद के इस विनम्र प्रश्न को सुनकर ब्रह्मा जी अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले:
'हे पुत्र नारद! तुम भगवान विष्णु के परम भक्त हो। तुमने मानव जाति के उद्धार के लिए बड़ा ही उत्तम प्रश्न पूछा है। तीनों लोकों में श्री हरि के दिन (एकादशी) से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। यह एकादशी बड़े-से-बड़े पापों को नष्ट करने वाली है। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी 'पद्मा' या 'देवशयनी' कहलाती है । इस संसार में भगवान विष्णु (हृषीकेश) को प्रसन्न करने के लिए इस एकादशी का व्रत करने से बढ़कर कोई दूसरा मार्ग नहीं है। जो प्राणी इस एकादशी का उपवास नहीं करता, वह नर्क का गामी होता है । हे नारद! इस देवशयनी एकादशी की अपार महिमा को सिद्ध करने वाली सूर्यवंशी राजा मान्धाता की एक अत्यंत प्राचीन कथा शास्त्रों में वर्णित है, जिसे मैं तुम्हें पूर्ण विस्तार से सुनाता हूँ। तुम इसे ध्यानपूर्वक सुनो।' "
२. मुख्य कथा (पूर्ण एवं अक्षुण्ण रूप में)
ब्रह्मा जी ने देवर्षि नारद को जो कथा सुनाई, वही देवशयनी एकादशी की सबसे प्रामाणिक कथा है। यह कथा इस प्रकार है:
त्रेता युग का वर्णन
हे देवर्षि! प्राचीन काल में, त्रेता युग (कुछ ग्रंथों में सत्य युग का भी उल्लेख है) का समय था । वह युग अत्यंत पवित्र था, जब धर्म अपने चारों चरणों—सत्य, तप, दया और दान (पवित्रता)—पर पूर्ण रूप से स्थित था । उस समय पृथ्वी पर सर्वत्र धर्म और मर्यादा का अखंड साम्राज्य था। समाज के सभी वर्ण—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—वेद-शास्त्रों में वर्णित अपने-अपने धर्म और कर्म का निष्ठापूर्वक पालन करते थे । ब्राह्मण केवल वेदाध्ययन और तपस्या में लीन रहते थे, क्षत्रिय धर्मपूर्वक प्रजा की रक्षा करते थे, वैश्य न्यायपूर्वक कृषि और व्यापार करते थे, तथा शूद्र सेवा भाव से अपना जीवन व्यतीत करते थे। उस युग में पाप, छल, कपट, झूठ और अनैतिकता का लेशमात्र भी स्थान नहीं था। चारों ओर वेदों की ऋचाओं का गान होता था और यज्ञों की पवित्र अग्नि निरंतर प्रज्वलित रहती थी ।
सूर्यवंशी राजा मान्धाता का परिचय एवं धर्मनिष्ठ राज्य-शासन
उसी पुनीत काल में सूर्यवंश (विवस्वत के कुल) में एक अत्यंत प्रतापी, चक्रवर्ती और सत्यवादी सम्राट का जन्म हुआ, जिनका नाम 'मान्धाता' था । राजा मान्धाता केवल एक अजेय और शूरवीर योद्धा ही नहीं थे, अपितु वे एक महान तपस्वी और साक्षात् धर्म के स्वरूप थे। संपूर्ण पृथ्वी पर उनका एकछत्र शासन था। वे अपने सत्य वचनों पर दृढ़ रहने वाले महान सम्राट थे। उनके राजकोष में तनिक भी ऐसा धन नहीं था जो अन्याय, अधर्म या अनुचित मार्ग से अर्जित किया गया हो ।
चक्रवर्ती राजा मान्धाता अपनी प्रजा का पालन-पोषण ठीक उसी प्रकार करते थे, जिस प्रकार एक पिता अपनी सगी और प्रिय संतान का करता है । उनके धर्मनिष्ठ और न्यायपूर्ण शासन काल में प्रजा को कोई शारीरिक कष्ट, मानसिक संताप, आधि-व्याधि या रोग नहीं था । राज्य में कोई अकाल मृत्यु नहीं होती थी और न ही किसी नागरिक को दरिद्रता का सामना करना पड़ता था। सारा राज्य धन-धान्य, पशु-धन और स्वर्ण से परिपूर्ण था। राजा के धर्म-सम्मत आचरण के कारण प्रकृति भी उनके पूर्ण रूप से अनुकूल थी; समय-समय पर पर्याप्त वर्षा होती थी, जिससे पृथ्वी भरपूर अन्न और औषधियां उत्पन्न करती थी। संपूर्ण साम्राज्य में सुख, शांति और समृद्धि का अखंड वास था ।
वर्षा का अभाव और राज्य में भयंकर अकाल
परंतु हे नारद! काल की गति और विधाता का विधान बड़ा ही विचित्र होता है। कभी-कभी राजा के किसी अनजाने दोष या राज्य की सीमा के भीतर किसी के द्वारा किए जा रहे अदृश्य शास्त्र-विरुद्ध आचरण (पाप) के कारण प्रकृति कुपित हो जाती है। राजा मान्धाता के इतने सुखी और धर्मनिष्ठ राज्य में भी अचानक ऐसा ही एक घोर संकट उत्पन्न हो गया ।
देखते ही देखते, लगातार तीन वर्षों तक राजा मान्धाता के राज्य में वर्षा की एक बूँद भी नहीं गिरी । आकाश से बादलों का नामोनिशान मिट गया और सूर्य की प्रचंड किरणों ने पृथ्वी को जलाकर राख कर दिया। वर्षा के घोर अभाव में राज्य में भयंकर सूखा और अकाल पड़ गया । नदियाँ, सरोवर, कुएँ और तालाब सूख कर पूरी तरह निर्जल हो गए। खेतों में खड़ी फसलें जल गईं और नए अन्न का उत्पादन पूर्णतः रुक गया। अन्न और जल के अभाव में सर्वत्र हाहाकार मच गया。
पेड़-पौधे सूख कर ठूंठ हो गए, पशु-पक्षी जल के बिना तड़प-तड़प कर प्राण त्यागने लगे। राज्य में होने वाले सभी धार्मिक और वैदिक अनुष्ठान पूरी तरह से बंद हो गए। देवताओं को अर्पित की जाने वाली 'स्वाहा' (आहुति), पितरों को अर्पित की जाने वाली 'स्वधा', और यज्ञों में उच्चारित होने वाला 'वषट्कार' शांत हो गया । जो प्रजा कल तक अत्यंत सुखी और समृद्ध थी, वह आज भूख और प्यास की ज्वाला में जलने लगी。
प्रजा का कष्ट और राजा से संवाद
अकाल की इस दारुण और असह्य पीड़ा से व्याकुल होकर, राज्य की समस्त प्रजा, मंत्रीगण, सामंत और विद्वान ब्राह्मण एकत्रित होकर राजा मान्धाता के राजमहल के सम्मुख उपस्थित हुए । भूख-प्यास से मृतप्राय हो चुकी प्रजा ने अत्यंत करुण और कातर स्वर में अपने दयालु राजा से पुकार लगाई और कहा:
"हे राजन्! हे प्रजापालक! हमारी रक्षा करें। हे नाथ! संसार के सभी शास्त्रों और वेदों में यह स्पष्ट कहा गया है कि जल ही जीवन का मूल है। जल को 'नार' कहा जाता है और परब्रह्म भगवान श्री हरि का निवास जल में होने के कारण ही उनका एक नाम 'नारायण' है । उसी जल (वर्षा) से पृथ्वी पर अन्न उत्पन्न होता है और अन्न से ही संपूर्ण चर-अचर जगत् का जीवन चलता है। हे महाराज! बिना जल और अन्न के आपकी यह प्रजा नष्ट हो रही है। यदि शीघ्र ही जल नहीं मिला तो यह संपूर्ण राज्य श्मशान में परिवर्तित हो जाएगा ।
हे राजन्! प्राचीन धर्मग्रंथों में यह भी लिखा है कि राजा के पापों या राज्य में पनप रहे अधर्म के कारण ही प्रजा को ऐसे भयंकर प्राकृतिक प्रकोपों और अकाल का कष्ट भोगना पड़ता है। हे चक्रवर्ती सम्राट! आप तो धर्म के अवतार हैं, फिर हम पर यह विपत्ति क्यों? आप कोई ऐसा जतन, कोई ऐसा उपाय कीजिए जिससे आकाश से जल की वर्षा हो और आपकी इस मरणासन्न प्रजा के प्राण बच सकें। यदि आप हमारी रक्षा नहीं करेंगे तो हम सभी अकाल मृत्यु को प्राप्त हो जाएंगे।"
प्रजा की इस हृदयविदारक पुकार को सुनकर राजा मान्धाता का हृदय दुख, करुणा और पीड़ा से भर गया। राजा ने अत्यंत शांत, गंभीर और उत्तरदायित्व-पूर्ण स्वर में प्रजा से कहा:
"हे मेरी प्रिय प्रजा! आप लोग जो कह रहे हैं, वह पूर्णतः सत्य है। जल ही जीवन का मुख्य आधार है और अन्न से ही यह संसार स्थिर है । राजा होने के नाते राज्य में होने वाले किसी भी कष्ट के लिए मैं स्वयं को ही उत्तरदायी मानता हूँ । मैं दिन-रात अपने अंतर्मन में विचार कर रहा हूँ कि मुझसे जाने-अनजाने में ऐसा कौन-सा पाप या अपराध हुआ है, जिसका इतना कठोर दंड आप सभी को भुगतना पड़ रहा है । मैंने अपने ज्ञान में आज तक कभी कोई अधर्म नहीं किया, न ही राजकोष में कोई अनीति का धन रखा, फिर भी विधाता का यह कोप मेरे राज्य पर क्यों है, यह मेरी समझ से परे है। हे प्रजाजनों! आप तनिक धैर्य रखें। मैं आपकी पीड़ा दूर करने के लिए और इस अकाल का मूल कारण जानने के लिए इसी क्षण महान तपस्वियों और ऋषियों की शरण में वन की ओर जाता हूँ। मैं कोई न कोई समाधान अवश्य लेकर लौटूंगा, यह मेरा वचन है।"
ऋषियों से परामर्श हेतु वन-गमन और महर्षि अंगिरा से भेंट
अपनी दुखी प्रजा को यह आश्वासन देकर, चक्रवर्ती सम्राट मान्धाता ने अपने राजसी सुखों का त्याग कर दिया। उन्होंने अपने साथ केवल कुछ प्रमुख मंत्रियों और अंगरक्षकों को लिया और ईश्वर का स्मरण करते हुए घने और दुर्गम वनों की ओर प्रस्थान किया । राजा वन-वन भटकते हुए, महान तपस्वियों, योगियों और ऋषियों के आश्रमों में जाकर इस भीषण अकाल का कारण और इसके निवारण का मार्ग पूछने लगे。
अनेक बीहड़ वनों को पार करने के पश्चात, राजा मान्धाता अंततः ब्रह्मा जी के मानस पुत्र, परम तेजस्वी 'महर्षि अंगिरा' के आश्रम में पहुँचे । महर्षि अंगिरा का आश्रम अत्यंत शांत, अलौकिक और दिव्य था; वहाँ का वातावरण वेदमंत्रों की ध्वनि और यज्ञ के धुएं से गुंजायमान था। महर्षि अंगिरा का मुखमंडल द्वितीय ब्रह्मा के समान तेज से देदीप्यमान था。
राजा मान्धाता ने अपनी सवारी से उतर कर महर्षि अंगिरा के चरण कमलों में साष्टांग दंडवत प्रणाम किया और अत्यंत विनीत भाव से हाथ जोड़कर खड़े हो गए । महर्षि अंगिरा ने राजा को आशीर्वाद दिया और अत्यंत प्रेमपूर्वक उनका कुशल-मंगल पूछा। महर्षि ने राजनीति के धर्म के अनुसार राजा से उनके राज्य के 'सात अंगों' (राजा स्वयं, उनके मंत्री, राजकोष, सेना, मित्र, राष्ट्र के ब्राह्मण, और राज्य में होने वाले यज्ञ-अनुष्ठान) की कुशलता के विषय में प्रश्न किया ।
राजा मान्धाता ने हाथ जोड़कर, अत्यंत अश्रुपूर्ण नेत्रों से महर्षि अंगिरा को उत्तर दिया: "हे परम ज्ञानी महर्षिवर! आपकी असीम कृपा से मेरे राज्य का प्रशासन तो धर्मानुकूल चल रहा है, किंतु हे भगवन्, पिछले तीन वर्षों से मेरे राज्य में वर्षा की एक बूँद भी नहीं गिरी है । भयंकर अकाल और सूखे के कारण मेरी निर्दोष प्रजा अन्न और जल के बिना तड़प-तड़प कर प्राण त्याग रही है। हे त्रिकालदर्शी ऋषि! मैं धर्म के मार्ग पर चलने वाला शासक हूँ। मैंने वेद-शास्त्रों की आज्ञा का कभी उल्लंघन नहीं किया। फिर मेरे राज्य पर यह दैवीय प्रकोप क्यों है? मेरे राज्य से यह अकाल कैसे दूर होगा? कृपया अपने दिव्य ज्ञान से मेरे इस संशय को दूर करें और मेरी प्रजा की रक्षा का कोई उपाय बताएं।"
अकाल का कारण और देवशयनी एकादशी व्रत का उपदेश
राजा मान्धाता के करुण वचनों को सुनकर महर्षि अंगिरा ने अपने तपोबल से ध्यान लगाया। कुछ क्षण पश्चात ध्यान से बाहर आकर महर्षि ने राजा से कहा:
"हे राजन्! यह कृत युग (सत्य युग/त्रेता युग का धर्म) है। इस युग में धर्म अपने चारों चरणों पर स्थित रहता है। इस युग में कठोर तपस्या करने और वेदों के अध्ययन का अधिकार केवल और केवल ब्राह्मणों को ही प्राप्त है । अन्य वर्णों को उनके निर्धारित कर्मों का ही पालन करना चाहिए। किंतु हे राजन! तुम्हारे राज्य की सीमा के भीतर, एक शूद्र (चांडाल) वर्ण का व्यक्ति घोर तपस्या में लीन है। उस शूद्र द्वारा शास्त्र-विरुद्ध आचरण और अनधिकृत तपस्या किए जाने के कारण ही प्रकृति का संतुलन बिगड़ गया है और तुम्हारे राज्य में वर्षा रुक गई है ।
हे प्रजापालक! जब तक राज्य में वह अनधिकृत तपस्या चलती रहेगी, तब तक बादलों से जल की वर्षा नहीं होगी। यदि तुम अपनी प्रजा का कल्याण चाहते हो और इस अकाल से मुक्ति पाना चाहते हो, तो तुम्हें राजधर्म का पालन करते हुए उस तपस्या करने वाले शूद्र का वध करना होगा। उसके प्राण-दंड से ही यह दोष समाप्त होगा और वर्षा होगी।"
महर्षि अंगिरा की बात सुनकर राजा मान्धाता भारी धर्म-संकट में पड़ गए। एक ओर प्रजा का कष्ट था और दूसरी ओर एक तपस्वी का प्राण। सत्यवादी और दयालु राजा ने विनम्रतापूर्वक, किंतु दृढ़ता से महर्षि से कहा:
"हे मुनिश्रेष्ठ! मैं आपका अत्यंत सम्मान करता हूँ, किंतु मेरा हृदय इस बात के लिए तनिक भी गवाही नहीं दे रहा है कि मैं एक ऐसे व्यक्ति का वध करूँ जो निरपराध है और केवल ईश्वर की तपस्या में लीन है । वह कोई हिंसक अपराध नहीं कर रहा है। एक तपस्वी का रक्त बहाना मेरे क्षत्रिय धर्म, दया भाव और अंतरात्मा के विरुद्ध है। हे दयालु महर्षि! मैं उस निर्दोष तपस्वी को मृत्युदंड नहीं दे सकता। कृपा करके मुझे कोई ऐसा आध्यात्मिक मार्ग, कोई महाव्रत, दान या पुण्य कर्म बताएं, जिसे करने से बिना किसी का रक्त बहाए, बिना किसी की हत्या किए मेरे राज्य का यह भयंकर दोष शांत हो जाए और मेरी प्रजा को इस अकाल से मुक्ति मिल जाए।"
राजा मान्धाता के हृदय में बसी दया, अहिंसा और धर्म के प्रति अगाध निष्ठा को देखकर महर्षि अंगिरा अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा की प्रशंसा करते हुए कहा:
"हे राजन्! तुम्हारी दयालुता और धर्म-निष्ठा अद्भुत है। यदि तुम किसी को प्राण-दंड नहीं देना चाहते और आध्यात्मिक मार्ग से इस संकट का निवारण चाहते हो, तो मेरी बात ध्यानपूर्वक सुनो।
आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है, उसे 'पद्मा एकादशी' या 'देवशयनी एकादशी' कहते हैं । यह एकादशी महान पुण्य प्रदान करने वाली, सभी प्रकार के दोषों और पापों को भस्म करने वाली तथा मनोवांछित फल देने वाली है । इस व्रत के प्रभाव से बड़े-से-बड़े अनिष्ट भी टल जाते हैं और यह व्रत सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाला है।
हे राजन्! तुम तुरंत अपनी राजधानी लौट जाओ और अपने मंत्रियों, परिवारजनों, सेवकों और राज्य के चारों वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) की समस्त प्रजा के साथ मिलकर, पूर्ण श्रद्धा और विधि-विधान के साथ इस आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) का व्रत करो । इस दिन भगवान हृषीकेश (विष्णु) की पूजा करो, रात्रि में जागरण करो और अन्न का त्याग करो। इस महान व्रत के सामूहिक प्रभाव से तुम्हारे राज्य का वह अज्ञात दोष निश्चित रूप से नष्ट हो जाएगा और भगवान नारायण की कृपा से तुम्हारे राज्य में अवश्य वर्षा होगी।"
श्रद्धापूर्वक व्रत-पालन, वर्षा की पुनः प्राप्ति और राज्य में सुख-समृद्धि
महर्षि अंगिरा के मुख से यह अचूक और आध्यात्मिक उपाय सुनकर राजा मान्धाता का मुखमंडल हर्ष से खिल उठा। उन्होंने महर्षि के चरणों में पुनः साष्टांग प्रणाम किया और उनसे आज्ञा लेकर तुरंत अपनी राजधानी (अयोध्या नगरी) की ओर प्रस्थान किया ।
राजधानी पहुँचकर राजा मान्धाता ने पूरे राज्य में ढिंढोरा पिटवाकर यह उद्घोषणा करवा दी कि आने वाले आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की 'देवशयनी एकादशी' का व्रत राज्य का प्रत्येक नागरिक अवश्य करेगा। राजा की आज्ञा और भगवान विष्णु के प्रति श्रद्धा को सर्वोपरि मानते हुए, राज्य के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र—सभी वर्णों के स्त्री, पुरुष, वृद्ध और बालकों ने पूरी निष्ठा के साथ एकादशी के व्रत का संकल्प लिया ।
जब आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी (पद्मा एकादशी) की पावन तिथि आई, तो राजा मान्धाता ने स्वयं अपनी रानियों, मंत्रियों और सैनिकों के साथ अन्न और जल का त्याग कर व्रत रखा। राज्य भर में भगवान विष्णु के नाम का संकीर्तन होने लगा। चारों ओर धूप, दीप, नैवेद्य और कमल के पुष्पों से भगवान नारायण की विधि-विधान से पूजा की गई । ब्राह्मणों को जल से भरा कलश, छाता और खड़ाऊं दान किए गए । पूरी रात्रि जागरण किया गया और शंख, चक्र, गदा धारी भगवान से करबद्ध प्रार्थना की गई कि वे राज्य के संकट को दूर करें。
देवशयनी एकादशी के उस महान और सामूहिक व्रत का प्रभाव अद्भुत और अकल्पनीय था। व्रत के पुण्य के फलीभूत होते ही, जो आकाश पिछले तीन वर्षों से जलरहित और तप्त था, वह अचानक घने, काले और मंगलकारी बादलों से आच्छादित हो गया । आकाश में बिजली चमकने लगी और मेघों की गंभीर गर्जना के साथ ही मूसलाधार वर्षा प्रारंभ हो गई ।
निरंतर और प्रचुर मात्रा में हुई उस दिव्य वर्षा ने सूखी हुई पृथ्वी की प्यास बुझा दी। सूखी नदियाँ जल से लबालब भर गईं, सरोवर और तालाब छलक उठे। खेतों में फिर से हरियाली छा गई और प्रचुर मात्रा में धान और अन्न उत्पन्न हुआ । पशु-पक्षियों और प्रजा को नवजीवन प्राप्त हुआ। राजा मान्धाता के राज्य से अकाल, दरिद्रता और हाहाकार हमेशा के लिए मिट गया। भगवान श्री हरि विष्णु (हृषीकेश) की कृपा से राज्य में पुनः पहले जैसी सुख, शांति, समृद्धि और धन-धान्य की वृद्धि हो गई ।
इस प्रकार राजा मान्धाता और उनकी प्रजा ने देवशयनी एकादशी के व्रत के अद्भुत और प्रत्यक्ष फल का दर्शन किया。
३. द्वितीय प्रचलित पाठ: वामन अवतार एवं राजा बलि का प्रसंग
देवशयनी एकादशी के अवसर पर पारंपरिक रूप से राजा मान्धाता की कथा के अतिरिक्त, भगवान विष्णु के 'शयन' करने के कारण को स्पष्ट करने वाला 'राजा बलि और वामन अवतार' का प्रसंग भी अनिवार्य रूप से प्रस्तुत किया जाता है (ब्रह्म वैवर्त पुराण एवं वामन पुराण के अनुसार) ।
प्राचीन काल में दैत्यों के अधिपति राजा बलि थे, जो अत्यंत पराक्रमी होने के साथ-साथ भगवान विष्णु के परम भक्त, असीम दानी और सत्यवादी थे । जब राजा बलि ने अपने बाहुबल से स्वर्ग पर अधिकार कर लिया और देवताओं को निष्कासित कर दिया, तब समस्त देवता त्राहि-त्राहि करते हुए भगवान श्री हरि विष्णु की शरण में गए。
देवताओं के कल्याण और राजा बलि के अहंकार को तोड़ने (तथा उनकी भक्ति का मान रखने) के लिए भगवान विष्णु ने माता अदिति के गर्भ से 'वामन अवतार' (एक छोटे ब्राह्मण कुमार का रूप) धारण किया । भगवान वामन रूप धारण करके राजा बलि के उस यज्ञ स्थल पर पहुँचे जहाँ राजा बलि महायज्ञ कर रहे थे और ब्राह्मणों को मुँहमांगा दान दे रहे थे。
वामन भगवान ने राजा बलि से दान में केवल 'तीन पग (कदम) भूमि' मांगी । राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य ने भगवान के छल को पहचान लिया और बलि को दान देने से रोका, परंतु सत्यनिष्ठ राजा बलि अपने वचन से नहीं डिगे। उन्होंने वामन भगवान को तीन पग भूमि दान करने का संकल्प ले लिया。
संकल्प पूर्ण होते ही भगवान वामन ने अपना आकार अत्यंत विशाल कर लिया। उन्होंने अपने पहले पग में संपूर्ण पृथ्वी और पाताल लोक को नाप लिया। दूसरे पग में उन्होंने स्वर्ग और संपूर्ण ब्रह्मांड को नाप लिया। अब भगवान का तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान ही शेष नहीं बचा ।
तब भगवान ने राजा बलि से पूछा: "हे बलि! अब मैं अपना तीसरा पग कहाँ रखूँ?"
भक्तराज बलि ने अत्यंत विनम्रता से अपना मस्तक भगवान के आगे झुका दिया और कहा: "हे प्रभु! आप अपना तीसरा पग मेरे शीश पर रख दें।"
भगवान वामन ने अपना तीसरा पग राजा बलि के मस्तक पर रखा, जिससे राजा बलि पाताल लोक (सुतल लोक) में पहुँच गए। राजा बलि की इस अगाध भक्ति, दानवीरता और सत्यनिष्ठा से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए। भगवान ने बलि को पाताल लोक का राज्य सौंप दिया और वरदान मांगने को कहा ।
तब भक्त बलि ने भगवान से प्रार्थना की: "हे प्रभु! मेरी यही कामना है कि आप सदैव मेरे समक्ष रहें और मेरे महल में निवास करें।"
भगवान विष्णु ने अपने प्रिय भक्त को निराश नहीं किया और 'तथास्तु' कहकर वरदान दे दिया। परंतु इस वरदान के कारण भगवान बैकुंठ छोड़कर पाताल में रहने लगे, जिससे माता लक्ष्मी और समस्त देवता अत्यंत चिंतित हो गए । माता लक्ष्मी ने एक गरीब स्त्री का वेश धारण कर पाताल लोक में प्रवेश किया और राजा बलि को रक्षासूत्र (राखी) बांधकर उन्हें अपना भाई बना लिया । जब बलि ने बहन से उपहार मांगने को कहा, तो माता लक्ष्मी ने अपने पति भगवान विष्णु को वचन से मुक्त करने और बैकुंठ लौटने का वरदान मांग लिया ।
राजा बलि ने अपनी बहन को दिया वचन निभाया। तब भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी और राजा बलि, दोनों के वचनों का मान रखने के लिए एक व्यवस्था (नियम) बनाई। भगवान श्री हरि ने राजा बलि से कहा: "हे बलि! मैं तुम्हारे निश्छल प्रेम और भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूँ। मैं प्रत्येक वर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी (देवशयनी एकादशी) से लेकर कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी (देवप्रबोधिनी एकादशी) तक, इन चार मासों के लिए तुम्हारे पाताल लोक स्थित महल में निवास करूँगा और योगनिद्रा में शयन करूँगा" ।
इसीलिए इस आषाढ़ शुक्ल एकादशी को 'देवशयनी एकादशी' कहा जाता है। इस दिन से भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर और राजा बलि के द्वार पर चार महीने तक शयन करते हैं । इसी अवधि को 'चातुर्मास' कहा जाता है। इन चार महीनों में भगवान शिव सृष्टि का संचालन करते हैं ।
४. पारंपरिक उपसंहार एवं फलश्रुति
ब्रह्मा जी ने देवर्षि नारद को यह संपूर्ण कथा सुनाकर कहा: "हे नारद! जो कोई भी मनुष्य पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ इस आषाढ़ शुक्ल 'देवशयनी' या 'पद्मा' एकादशी का व्रत करता है, वह जीवन के सभी कष्टों से मुक्त होकर अंत में भगवान विष्णु के परम धाम को प्राप्त होता है। यह व्रत सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला है।"
इसके पश्चात योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा: "हे धर्मराज! मैंने तुम्हें यह पावन व्रत कथा विस्तारपूर्वक सुनाई है। देवशयनी एकादशी का यह पावन व्रत सर्व-पाप-हारी, भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला है । हे राजन्! जो मनुष्य इस शयनी एकादशी का व्रत करता है, और जो मनुष्य इस देवशयनी एकादशी की व्रत कथा को पूर्ण श्रद्धा से पढ़ता है, अथवा भक्तिपूर्वक सुनता है, उसके शरीर में स्थित समस्त पाप वैसे ही भस्म हो जाते हैं जैसे प्रज्वलित अग्नि के स्पर्श से रुई का ढेर भस्म हो जाता है ।
हे युधिष्ठिर! इस कथा के श्रवण मात्र से मनुष्य अश्वमेध यज्ञ के समान महान फल को प्राप्त करता है और उसे एक हजार गौदान के बराबर अक्षय पुण्य मिलता है । जो व्यक्ति इस दिन रात्रि में जागरण कर शंख, चक्र, गदा धारी भगवान नारायण की कमल पुष्पों से पूजा करता है, उसके पुण्यों की गणना करने में स्वयं चतुर्मुख ब्रह्मा जी भी असमर्थ हैं । यह व्रत करने वाला मनुष्य, चाहे वह किसी भी जाति या वर्ण (चांडाल तक) का क्यों न हो, वह संसार में सदा मेरा प्रिय रहता है ।
अतः हे राजन्! जो मनुष्य मुझे प्रसन्न करना चाहता है और जीवन-मरण के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष (वैकुंठ) की कामना करता है, उसे आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की इस देवशयनी एकादशी का नियमपूर्वक व्रत अवश्य करना चाहिए । इस दिन से चातुर्मास का आरंभ होता है, अतः भगवान विष्णु के शयन काल में मनुष्य को भूमि पर शयन करना चाहिए, पलाश के पत्ते पर भोजन करना चाहिए और भगवत्-भक्ति में अपना समय व्यतीत करना चाहिए ।
जो श्रद्धा से देवशयनी एकादशी का व्रत करता है या इस परम पावन कथा को सुनता है, उसके जन्म-जन्मांतर के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और वह अंत में परम गति को प्राप्त होता है।"
(इति श्री पद्म पुराणे एवं भविष्योत्तर पुराणे आषाढ़ शुक्ल देवशयनी एकादशी माहात्म्य व्रत कथा संपूर्णम्।)
(बोलिए श्री भगवान विष्णु की जय! श्री लक्ष्मी-नारायण भगवान की जय! एकादशी माता की जय!)