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पापमोचनी एकादशी व्रत कथा: चैत्र कृष्ण पक्ष की संपूर्ण पारंपरिक कथा

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पापमोचनी एकादशी व्रत कथा: प्रामाणिक, पौराणिक एवं संपूर्ण पाठ

सनातन वाङ्गमय और पौराणिक साहित्य में एकादशी व्रतों का अत्यंत गूढ़ और पावन स्थान है। विशेष रूप से फाल्गुन/चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली 'पापमोचनी एकादशी' का माहात्म्य अपने नाम के अनुरूप ही अनंत पापों का शमन करने वाला माना गया है। प्रस्तुत प्रलेख विशुद्ध रूप से पारंपरिक व्यासपीठों पर वाचित, भविष्योत्तर पुराण, पद्म पुराण तथा लोक-प्रचलित नारद पुराण की परंपराओं पर आधारित पापमोचनी एकादशी की संपूर्ण, अक्षुण्ण और प्रामाणिक कथा का संकलन है। इस लेख में किसी भी प्रकार की आधुनिक दार्शनिक व्याख्या, व्यक्तिगत टिप्पणी अथवा व्रत-नियमों का समावेश न करते हुए, केवल और केवल पारंपरिक कथा को उसके मूल पौराणिक स्वरूप में प्रस्तुत किया गया है。

कथा के विभिन्न पारंपरिक संस्करणों और उनके शास्त्रीय स्रोतों को स्पष्टता प्रदान करने हेतु नीचे एक सारणी प्रस्तुत की गई है:

कथा का संस्करण शास्त्रीय/पौराणिक स्रोत मुख्य संवाद शृंखला विशिष्ट प्रसंग
प्रथम (मुख्य) संस्करण भविष्योत्तर पुराण / पद्म पुराण श्रीकृष्ण-युधिष्ठिर तथा लोमश-मान्धाता संवाद च्यवन पुत्र मेधावी ऋषि, कामदेव का षड्यंत्र, ५७ वर्ष का काल, पिता-पुत्र संवाद
द्वितीय (वैकल्पिक) संस्करण नारद पुराण परंपरा / लोक-परंपरा श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद / सूत-शौनक संवाद मेधावी ऋषि का तप, देवराज इन्द्र का भय, देवर्षि नारद का आगमन और व्रत-उपदेश

१. कथा का पारंपरिक प्रारंभ: श्रीकृष्ण-युधिष्ठिर एवं लोमश-मान्धाता संवाद

पापमोचनी एकादशी की कथा का वाचन पारंपरिक रूप से भगवान श्रीकृष्ण और धर्मपुत्र महाराज युधिष्ठिर के अत्यंत पावन संवाद से आरंभ होता है। नैमिषारण्य में सूत जी शौनकादि ऋषियों को यह कथा सुनाते हुए कहते हैं कि द्वापर युग में जब धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान वासुदेव से एकादशी के माहात्म्य को जानने की जिज्ञासा प्रकट की, तब यह गुह्य ज्ञान संसार के समक्ष प्रकट हुआ。

महाराज युधिष्ठिर ने दोनों हाथ जोड़कर अत्यंत श्रद्धापूर्वक, विनीत भाव से भगवान श्रीकृष्ण से पूछा— "हे त्रिलोकीनाथ! हे मधुसूदन! हे भक्तवत्सल! मैंने आपके श्रीमुख से फाल्गुन शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी का अद्भुत माहात्म्य श्रवण किया। अब कृपा कर आप मुझे चैत्र मास (गुजरात-महाराष्ट्र पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास) के कृष्ण पक्ष की एकादशी के विषय में विस्तारपूर्वक बतलाइये। हे प्रभु! इस परम पावन एकादशी का नाम क्या है? इस दिन किस देवता का पूजन किया जाता है, तथा इस कथा का क्या विधान और माहात्म्य है? हे श्रीकृष्ण! आप मेरे और संपूर्ण मानव जाति के कल्याण हेतु, संसार के उद्धार की कामना से यह सब विस्तार से बताने की कृपा करें।"

धर्मराज युधिष्ठिर के इन धर्मयुक्त और विनम्र वचनों को सुनकर देवकीनंदन भगवान श्रीकृष्ण के मुखमंडल पर एक अलौकिक मुस्कान छा गई। उन्होंने युधिष्ठिर को संबोधित करते हुए कहा— "हे राजन्! हे कुंतीपुत्र! हे नृपश्रेष्ठ! तुमने संपूर्ण चराचर जगत के कल्याण के लिए बहुत ही उत्तम प्रश्न किया है। एकादशी का व्रत मुझे अत्यंत प्रिय है और इसका माहात्म्य श्रवण करने मात्र से प्राणियों के जन्म-जन्मांतर के संचित पाप भस्म हो जाते हैं। मैं तुम्हें एक अत्यंत पापनाशक और पुण्यदायी कथा सुनाता हूँ। हे अर्जुन (युधिष्ठिर के भ्राता के संदर्भ में)! पूर्वकाल में एक बार यही प्रश्न पृथ्वीपति, सूर्यवंशी राजा मान्धाता ने धर्म के गुह्यतम रहस्यों के ज्ञाता महर्षि लोमश से किया था। उस समय जो कुछ महर्षि लोमश ने राजा मान्धाता को बताया था, वही परम पवित्र और पापों का समूल नाश करने वाली कथा मैं आज तुम्हें सुना रहा हूँ, इसे पूर्ण एकाग्रचित्त होकर श्रवण करो।"

कथा के अगले चरण में श्रीकृष्ण उस प्राचीन संवाद का वर्णन करते हैं जो राजा मान्धाता और महर्षि लोमश के मध्य हुआ था。

सूर्यवंशी चक्रवर्ती सम्राट मान्धाता ने महर्षि लोमश के आश्रम में जाकर उन्हें साष्टांग दंडवत प्रणाम किया और अत्यंत विनम्रता से पूछा— "हे ऋषिश्रेष्ठ! हे भगवन्! मैं लोगों के हित की इच्छा से यह सुनना चाहता हूँ कि कलियुग में मनुष्यों के भयंकर पापों का मोचन किस प्रकार सम्भव है? हे मुनिनाथ! चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में किस नाम की एकादशी होती है और उस दिन किस देव की आराधना करने से किस फल की प्राप्ति होती है? कृपा कर कोई ऐसा सरल और अचूक उपाय बतायें, जिससे सहज ही बड़े-बड़े पातकियों को भी उनके पापों से छुटकारा मिल जाए।"

राजा मान्धाता के परोपकार से परिपूर्ण इस प्रश्न को सुनकर महर्षि लोमश अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने उत्तर दिया— "हे नृपश्रेष्ठ! हे राजन्! तुमने बहुत ही सुंदर और लोकमंगलकारी प्रश्न पूछा है। मनुष्यों के समस्त भयंकर पापों को नष्ट करने वाली, चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की इस महान एकादशी का नाम 'पापमोचनी एकादशी' है। नाम के अनुरूप ही यह एकादशी बड़े-बड़े पापों का मोचन (नाश) करने वाली, पिशाच योनि से मुक्ति दिलाने वाली और सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली है। पूर्वकाल की बात है, इस एकादशी के प्रभाव से कैसे एक महान तपस्वी और एक अप्सरा को उनके घोर पापों और दारुण शाप से मुक्ति मिली, वह अत्यंत प्राचीन और पवित्र कथा मैं तुम्हें विस्तारपूर्वक सुनाता हूँ।"


२. मुख्य कथा (पूर्ण एवं अक्षुण्ण रूप में) - भविष्योत्तर पुराण आधारित प्रथम संस्करण

महर्षि लोमश ने राजा मान्धाता को पापमोचनी एकादशी की वह दिव्य कथा सुनानी आरंभ की, जो च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी और स्वर्ग की अप्सरा मंजुघोषा के प्रसंग से जुड़ी है。

चैत्ररथ वन की शोभा और मेधावी ऋषि का उग्र तप

महर्षि लोमश बोले— हे राजन्! प्राचीन काल में 'चैत्ररथ' नामक एक अत्यंत रमणीय और विशाल वन था। उस वन की प्राकृतिक छटा अवर्णनीय और देवों को भी मोहित करने वाली थी। वसंत ऋतु के आगमन पर वह वन और भी मनोरम हो उठता था; वहाँ नाना प्रकार के सुगंधित पुष्प, पल्लव और लताएँ सदैव पुष्पित रहती थीं। उस परम पावन और सुरम्य वन में गंधर्व, किन्नर और देव-कन्याएँ (अप्सराएँ) सदैव स्वच्छंद विहार किया करती थीं। वे गंधर्व कन्याएँ अपने अनुचरों के साथ वाद्ययंत्रों की मधुर ध्वनि पर नृत्य और गान करती थीं। देवराज इन्द्र भी अन्य देवताओं के साथ उस दिव्य वन में क्रीड़ा और भ्रमण हेतु नियमित रूप से आते रहते थे। विशेषकर चैत्र और वैशाख के महीनों में देवताओं का वहाँ निरंतर आवागमन लगा रहता था।

उसी चैत्ररथ वन के एक एकांत और पवित्र स्थान पर एक महान मुनि घोर तपस्या में लीन थे। वे परम तेजस्वी मुनि, महान महर्षि च्यवन के पुत्र थे, जिनका नाम 'मेधावी' था। युवा मेधावी ऋषि अत्यंत बुद्धिमान, विद्वान और कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले थे। उनके शारीरिक स्वरूप का वर्णन करते हुए शास्त्र कहते हैं कि उनके कंधे पर स्वच्छ श्वेत यज्ञोपवीत (जनेऊ) सुशोभित रहता था, वे हाथ में संन्यासी का दंड धारण किए हुए थे और भगवान शिव के अनन्य भक्त होकर अपने पिता के आश्रम से दूर उस वन में निरंतर समाधिस्थ रहते थे। उनका तपोबल दिनों-दिन इतना उग्र और प्रचंड होता जा रहा था कि स्वर्गलोक में देवताओं को चिंता होने लगी।

कामदेव का षड्यंत्र और मंजुघोषा का आगमन

ऋषि की उस कठोर तपस्या को देखकर देवराज इन्द्र और अन्य स्वर्गवासी देवता भयभीत हो गए। उन्हें लगा कि कहीं मुनि मेधावी अपने तपोबल से इन्द्रासन न प्राप्त कर लें। उस तपस्या को भंग करने के उद्देश्य से स्वर्गलोक की एक अत्यंत रूपसी और विख्यात अप्सरा को भेजा गया। उस अप्सरा का नाम 'मंजुघोषा' था। मंजुघोषा ने मेधावी ऋषि को लुभाने के लिए अनेक उपाय रचे, किंतु वह मुनि के प्रचंड तपोबल, उनके वर्षों के वैराग्य और उनके शाप के भय से अत्यंत त्रस्त थी। इसलिए, वह सीधे मुनि के समीप जाने का साहस नहीं कर सकी।

अपनी सुरक्षा का विचार करते हुए, मंजुघोषा ने ऋषि के आश्रम से लगभग एक कोस (लगभग दो मील) की दूरी पर अपना तंबू स्थापित किया। वहीं बैठकर उसने अपने हाथों में तानपूरा (वीणा) लिया और उसके तारों को झंकृत करना आरंभ किया। साथ ही, उसने अपने सुरीले कंठ से अत्यंत मधुर, आकर्षक एवं मादक गीत गाना आरंभ कर दिया। उसकी ध्वनि उस शांत वन में गूंजने लगी।

उसी समय, कामदेव (मन्मथ) जो कि प्रेम और वासना के देवता हैं, उन्हें मुनि मेधावी का तप भंग करने का स्वर्णिम अवसर मिल गया। कामदेव पूर्वकाल में भगवान शिव के क्रोधाग्नि से भस्म हो चुके थे, इसलिए वे शिव-भक्तों और तपस्वियों से प्रतिशोध लेने की ताक में रहते थे। मेधावी ऋषि को शिव-आराधना में लीन देखकर कामदेव ने उनसे अपना प्रतिशोध लेने का निश्चय किया। कामदेव ने मंजुघोषा को अपना अस्त्र और सहायक बनाया। पारंपरिक शास्त्रों में अत्यंत काव्यात्मक रूप से वर्णित है कि कामदेव ने मंजुघोषा की धनुषाकार भृकुटि (भौंहों) को अपना धनुष बनाया, उसके मादक कटाक्षों (तिरछी चितवन) को धनुष की प्रत्यंचा (डोरी) बनाया, उसके चंचल नेत्रों को अपने अचूक बाण तथा उसके उन्नत वक्षस्थल को अपना लक्ष्य बनाकर मुनि मेधावी के समीप पहुँच गए। दूसरे शब्दों में, कामदेव ने स्वयं मंजुघोषा के भीतर प्रवेश कर उसके हाव-भाव में अनंत लौकिक आकर्षण भर दिया।

तप-भंग और वासना के वशीभूत होना

एक दिन मेधावी मुनि अपनी समाधि से उठकर वन में विचरण करते हुए उसी मार्ग से निकले जहाँ मंजुघोषा अपने तंबू के निकट गा रही थी। तानपूरे की झंकार, अप्सरा के नूपुरों (पायलों) की रुनझुन और कंकण की मधुर ध्वनि ने मुनि का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। चन्दन और दिव्य पुष्पों की सुगंध से वातावरण सुवासित था। जब मेधावी ऋषि की दृष्टि उस अनुपम सुंदरी मंजुघोषा पर पड़ी, तो कामदेव ने तत्काल अपने शक्तिशाली बाणों (रस, स्पर्श, रूप, गंध और शब्द) का प्रहार ऋषि के हृदय पर कर दिया।

अप्सरा का रूप देखकर मुनि मेधावी अपनी सुध-बुध खो बैठे। ऋषि को अपनी ओर आकर्षित होते देखकर मंजुघोषा समझ गई कि मुनि अब उसके वशीभूत हो गए हैं। वह अपनी जगह से उठी और धीरे-धीरे अपने कामुक हाव-भाव और तिरछी चितवन से मुनि को मोहती हुई उनके समीप आई। उसने अपनी वीणा को भूमि पर रख दिया और अपनी दोनों भुजाओं से मुनि मेधावी का आलिंगन कर लिया, ठीक वैसे ही जैसे कोई कोमल लता किसी विशाल और सुदृढ़ वृक्ष से लिपट जाती है।

उस स्वर्गीय अप्सरा के प्रथम स्पर्श मात्र से ही मेधावी ऋषि का हृदय विचलित हो गया। उनका वर्षों का संचित वैराग्य, ज्ञान और ब्रह्मचर्य पल भर में खंडित हो गया। काम-पाश में पूर्णतः आबद्ध होकर मुनि अपना तप, व्रत, नियम, संन्यासी का दंड और भगवान शिव की आराधना सब कुछ भूल गए। वे मंजुघोषा के साथ उसी चैत्ररथ वन में काम-क्रीड़ा और रमण करने लगे। अप्सरा के प्रेम में वे इतने लीन और आसक्त हो गए कि उन्हें दिन और रात का कोई भान ही नहीं रहा। उनके मन से समय की गति की स्मृति पूरी तरह विलीन हो गई।

काल-विस्मृति और सत्य का भान

इस प्रकार मुनि और अप्सरा को एक साथ वासना के वशीभूत होकर रहते हुए दीर्घ काल व्यतीत हो गया। मुनि के लिए तो यह समय क्षण भर के समान था, किंतु वास्तव में एक बहुत लंबा युग बीत चुका था। अंततः, एक दिन मंजुघोषा का मन उस वन से ऊब गया और वह अपने मूल निवास, देवलोक (स्वर्गलोक) लौटने की इच्छा करने लगी। उसने अत्यंत विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर मुनि मेधावी से कहा— "हे विप्रवर! हे महानुभाव! हे श्रेष्ठ मुनि! मैंने आपके साथ एक लंबा समय व्यतीत किया है, अब मुझे अपने देश (स्वर्गलोक) वापस जाने की आज्ञा प्रदान करें।"

मेधावी मुनि, जो अभी भी माया और वासना के तीव्र प्रभाव में थे, उन्होंने व्याकुल होकर कहा— "हे कल्याणी! हे सुंदरी! अभी तो तुम मेरे पास आई ही हो। इतनी शीघ्रता क्या है? कम से कम कल सवेरे की संध्या वंदन का समय होने तक तो मेरे ही पास ठहरो।"

ऋषि के ये भोले और अज्ञानता से पूर्ण वचन सुनकर मंजुघोषा को अत्यंत आश्चर्य हुआ। उसने विस्मित स्वर में कहा— "हे विप्रवर! हे मुनिश्रेष्ठ! आप यह क्या कह रहे हैं? अब तक न जाने कितनी ही प्रातःकालीन और सांध्यकालीन बेलाएँ व्यतीत हो चुकी हैं! कृपया अपने समय पर विचार करें और अपनी योग-दृष्टि से देखें कि हमारे साथ रहते हुए कितना लंबा काल बीत चुका है।"

मंजुघोषा के इन यथार्थपूर्ण वचनों को सुनकर मेधावी ऋषि अचानक चौंके। उनकी चेतना लौटी और उनका ध्यान भंग हुआ। जब उन्होंने अपनी दिव्य योग-दृष्टि से काल की गणना की, तो वे स्तब्ध रह गए। उन्हें ज्ञात हुआ कि इस अप्सरा के साथ विहार करते हुए उन्हें ठीक सत्तावन (५७) वर्ष, नौ (९) माह और तीन (३) दिन व्यतीत हो चुके हैं। परंतु काम के प्रभाव में मुनि को यह संपूर्ण काल मात्र एक क्षण अथवा आधी रात के समान प्रतीत हुआ था।

भयंकर क्रोध और पिशाचिनी होने का दारुण शाप

सत्य का भान होते ही ऋषि के हृदय में तीव्र पश्चाताप की अग्नि प्रज्वलित हो उठी। उन्हें अपनी कठोर तपस्या, अपना अखंड ब्रह्मचर्य, अपनी आध्यात्मिक उन्नति और अपना संचित तपोबल छिन्न-भिन्न होता दिखाई दिया। उन्होंने अनुभव किया कि जिस तपस्या को उन्होंने वर्षों के कष्ट से अर्जित किया था, वह एक स्त्री के मोह में क्षण भर में राख हो गई। उन्होंने मंजुघोषा को अपनी तपस्या का नाश करने वाली और साक्षात् मृत्युरूपिणी (spiritual death personified) माना।

अपनी मूर्खता और तप के क्षय पर मुनि को भयंकर क्रोध आ गया। क्रोध के मारे मुनि के नेत्र रक्त के समान लाल हो गए और उनके शरीर से ज्वाला सी निकलने लगी। कांपते हुए और अत्यंत कुपित होकर उन्होंने उस अप्सरा की ओर देखा और उसे दारुण शाप दे दिया— "हे पापिनी! हे दुराचारिणी! तूने मेरे वर्षों के कठोर तप के फल को भस्म कर दिया है। तूने मेरे साथ छल किया है और मेरी योग-साधना को भ्रष्ट किया है। अतः मैं तुझे शाप देता हूँ कि तू अपने इस सुंदर अप्सरा रूप से च्युत होकर एक भयानक और नीच पिशाचिनी (hobgoblin/evil spirit) बन जा!"

अप्सरा का पश्चाताप और पापमोचनी एकादशी का उपदेश

मुनि के क्रोध की ज्वाला से दग्ध होकर और उनके कठोर शाप को सुनकर मंजुघोषा अत्यंत भयभीत हो गई। वह थर-थर कांपने लगी और रोते हुए मुनि के चरणों में गिर पड़ी। उसने अत्यंत नम्रतापूर्वक और करुण स्वर में प्रार्थना की— "हे विप्रवर! हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! मुझ पर कृपा करें और मुझे इस भयंकर शाप से मुक्ति का कोई उपाय बताएँ। हे नाथ! शास्त्रों में कहा गया है कि सत्पुरुषों के साथ सात कदम चलने या सात वाक्य बोलने मात्र से ही मैत्री स्थापित हो जाती है। मैंने तो आपके साथ ५७ वर्षों से अधिक का समय व्यतीत किया है। इसलिए हे स्वामी! मेरे इस साहचर्य का विचार करते हुए मेरी त्रुटि को क्षमा करें और मुझ अबला पर दया करें!"

अप्सरा की इस करुण पुकार को सुनकर और उसके सच्चे पश्चाताप को देखकर मेधावी मुनि का क्रोध कुछ शांत हुआ। उन्हें स्वयं भी अपने पतन, अपनी कामुकता और अपने द्वारा दिए गए अत्यंत कठोर शाप पर गहरी आत्मग्लानि होने लगी। मुनि ने विचार किया कि क्रोध भी तपस्या का ही नाश करता है। मुनि ने करुणा भाव से कहा— "हे भद्रे! मैं क्या करूँ? तूने मेरे महान तप को नष्ट कर दिया है। फिर भी तूने मुझसे शाप-मुक्ति का उपाय पूछा है, तो ध्यानपूर्वक सुन। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में जो अत्यंत मंगलकारी और पुण्यदायिनी एकादशी आती है, उसका नाम 'पापमोचनी' है। यह एकादशी समस्त प्रकार के पापों का समूल नाश करने वाली और सभी शापों से मुक्ति दिलाने वाली है। हे सुंदरी! तू उस पापमोचनी एकादशी का विधिपूर्वक उपवास कर। उस उत्तम व्रत के प्रभाव से तेरी यह घृणित पिशाच योनि तत्काल समाप्त हो जाएगी और तू पुनः अपना दिव्य रूप प्राप्त कर लेगी।"

पिता च्यवन ऋषि के आश्रम में वापसी और उनका उपदेश

अप्सरा मंजुघोषा को शाप से मुक्ति का यह अचूक उपाय बताकर, आत्मग्लानि और लज्जा से झुके हुए मेधावी मुनि अपने पिता महर्षि च्यवन के पवित्र आश्रम की ओर लौट गए। जब वे आश्रम पहुँचे, तो उनके पिता, परम ज्ञानी च्यवन ऋषि ने उनकी म्लान, तेजहीन और मलिन अवस्था को देखकर ही अपनी दिव्य दृष्टि से सब कुछ जान लिया।

महर्षि च्यवन ने दुखी होकर पूछा— "बेटा! यह तुमने क्या अनर्थ कर दिया? तुमने तो अपने सारे पुण्यों और तपस्या की महान संपत्ति का नाश कर डाला! तुम्हारा वह ब्रह्मतेज कहाँ चला गया?"

पिता के इन चुभते हुए किंतु सत्य वचनों को सुनकर मेधावी मुनि अत्यंत लज्जित हुए। उन्होंने सत्य स्वीकार करते हुए कहा— "पिताजी! मुझसे भयंकर अपराध हुआ है। मैंने एक अप्सरा के साथ रमण करने का महापातक किया है। मैं वासना के वशीभूत होकर अपना सब कुछ खो बैठा। अब आप ही कृपा कर कोई ऐसा शास्त्रीय प्रायश्चित या उपाय बताएँ जिससे मेरे इन भयंकर पापों का पूर्ण रूप से नाश हो जाए और मैं पुनः पवित्र हो सकूँ।"

महर्षि च्यवन ने अपने भटके हुए पुत्र को सांत्वना देते हुए कहा— "बेटा! तुम निराश मत हो। भगवान विष्णु की शरण में जाने से बड़े-से-बड़े पाप का प्रायश्चित संभव है। चैत्र कृष्ण पक्ष में जो 'पापमोचनी एकादशी' आती है, तुमने जिस व्रत का उपदेश उस अप्सरा को दिया है, तुम स्वयं भी उसी व्रत का विधिपूर्वक अनुष्ठान करो। उस उत्तम एकादशी व्रत का पालन करने से तुम्हारे पापों की संपूर्ण राशि का विनाश हो जाएगा और तुम पुनः अपने तपोबल को प्राप्त कर सकोगे।"

व्रत-पालन एवं शाप तथा पापों से पूर्ण मुक्ति

अपने पिता च्यवन मुनि के इन वचनों को सुनकर मेधावी मुनि ने चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी आने पर पूर्ण श्रद्धा और विधि-विधान के साथ 'पापमोचनी एकादशी' का अनुष्ठान किया। उन्होंने निराहार रहकर भगवान श्री हरि विष्णु की आराधना की। इस महाव्रत के प्रभाव से मुनि मेधावी के कामुकता के समस्त पाप और दोष समूल नष्ट हो गए और वे पुनः पूर्व की भाँति तपस्या के तेज से परिपूर्ण और पूर्णतः पवित्र हो गए।

उधर, उसी वन में मंजुघोषा ने भी मेधावी ऋषि के उपदेशानुसार पापमोचनी एकादशी के उत्तम व्रत का श्रद्धापूर्वक पालन किया। व्रत के महान प्रभाव से वह पिशाच की योनि से तत्काल मुक्त हो गई। उसने अपनी भयानक और कुरूप पिशाचिनी की देह त्याग दी और पुनः अपना सुंदर, दिव्य अप्सरा का रूप धारण कर लिया और मुक्त होकर स्वर्गलोक को चली गई।


मुख्य कथा - द्वितीय संस्करण (देवर्षि नारद के प्रसंग सहित लोक एवं पौराणिक पाठांतर)

सनातन परंपरा में एकादशी माहात्म्य की कथाओं के कई लोक-प्रचलित और पौराणिक पाठांतर (versions) भी प्राप्त होते हैं। 'नारद पुराण' की वाचन परंपरा अथवा अन्य स्थानीय सत्संग परंपराओं में इसी मेधावी ऋषि और अप्सरा मंजुघोषा की कथा में देवर्षि नारद की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका का उल्लेख मिलता है। व्यासपीठ से कई कथावाचक इस संस्करण का भी पठन करते हैं, जिसे पूर्ण और प्रामाणिक स्वरूप में यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।

इस संस्करण के अनुसार कथा का क्रम इस प्रकार है:

पूर्वकाल में मेधावी नामक एक महान ऋषि वन में घोर तपस्या में लीन थे। वे भगवान शिव के अनन्य भक्त थे और उनकी तपस्या इतनी उग्र थी कि देवराज इन्द्र का सिंहासन डोलने लगा। इन्द्र को यह भय सताने लगा कि कहीं यह ऋषि अपने तपोबल से स्वर्ग के राज्य पर अधिकार न कर ले。

अपने इस भय का निवारण करने के लिए देवराज इन्द्र ने ऋषि का तप भंग करने का निश्चय किया। उन्होंने स्वर्ग की सबसे सुंदर अप्सरा मंजुघोषा को बुलाया और उसे मेधावी ऋषि की तपस्या खंडित करने का आदेश देकर मृत्युलोक भेज दिया。

मंजुघोषा ने वन में आकर अपने रूप, यौवन और मधुर गायन से ऋषि को अपनी ओर आकर्षित किया। मेधावी ऋषि उस अप्सरा के अनुपम रूप-लावण्य को देखकर मोहित हो गए। उन्होंने अपनी वर्षों की शिव-भक्ति और तपस्या को त्याग दिया और वे उस अप्सरा के साथ सांसारिक सुखों में रमण करने लगे।

कई वर्षों तक अप्सरा के साथ वासनापूर्ण जीवन व्यतीत करने के पश्चात्, जब मंजुघोषा ने स्वर्ग वापस लौटने के लिए ऋषि से आज्ञा मांगी, तब मुनि को अपनी भूल का आभास हुआ। उन्हें यह अनुभव हुआ कि इस अप्सरा ने उनका सब कुछ—तप, पुण्य और ब्रह्मचर्य—नष्ट कर दिया है। भयंकर क्रोध और अपनी ग्लानि का कारण उस अप्सरा को मानकर, परेशान और कुपित ऋषि ने उसे तत्काल 'पिशाचिनी' हो जाने का शाप दे दिया।

शाप के कारण तुरंत पिशाचिनी का रूप प्राप्त कर चुकी वह अप्सरा अत्यंत दुखी हुई और विलाप करने लगी। वह ऋषि के चरणों में गिरकर शाप से मुक्ति के लिए करुण प्रार्थना करने लगी। उसी क्षण, परम ज्ञानी, त्रिकालदर्शी और भगवान विष्णु के परम भक्त देवर्षि नारद अपनी वीणा बजाते हुए 'नारायण-नारायण' का जाप करते वहाँ आ पहुँचे।

देवर्षि नारद ने पिशाच-रूप धारिणी अप्सरा का रुदन और ऋषि मेधावी का घोर पश्चाताप देखा। उन्होंने अपने तपोबल से संपूर्ण घटनाक्रम जान लिया। देवर्षि नारद ने करुणावश अप्सरा और ऋषि दोनों को संबोधित किया। उन्होंने बताया कि उन दोनों ने ही भारी पाप किया है—ऋषि ने वासना के वशीभूत होकर अपना तप नष्ट किया और क्रोध में आकर शाप देने का पाप किया, तथा अप्सरा ने एक तपस्वी का तप भंग करने का महापाप किया।

इन पापों और शाप से मुक्ति का मार्ग दिखाते हुए देवर्षि नारद ने उन्हें 'पापमोचनी एकादशी' के विषय में बताया। उन्होंने कहा कि चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की यह एकादशी सभी पापों का समूल नाश करने वाली है। देवर्षि नारद ने स्वयं उन दोनों को इस एकादशी के व्रत का संपूर्ण विधि-विधान बताया और कहा कि भगवान श्री हरि विष्णु की आराधना से ही तुम दोनों का कल्याण संभव है।

देवर्षि नारद द्वारा बताए गए विधान के अनुसार, मेधावी ऋषि और उस अप्सरा दोनों ने पूर्ण निष्ठा के साथ पापमोचनी एकादशी का व्रत किया। उस परम पावन व्रत के प्रताप से ऋषि अपने पापों से मुक्त होकर पुनः अपने योग-तेज को प्राप्त हुए और अप्सरा पिशाच-योनि से मुक्त होकर अपने दिव्य स्वरूप में पुनः स्वर्गलोक को प्राप्त हुई।

(नोट: पारंपरिक वाचन में कथावाचक अपने-अपने संप्रदाय और उपलब्ध ग्रंथ के अनुसार इनमें से किसी एक अथवा दोनों संस्करणों का वाचन करते हैं। दोनों ही संस्करणों का मूल संदेश एकादशी के व्रत का अतुलनीय प्रभाव दर्शाना है।)


३. पारंपरिक उपसंहार एवं फलश्रुति (माहात्म्य पाठ)

सनातन धर्म के किसी भी कथा-पाठ का समापन उसकी 'फलश्रुति' (व्रत और कथा श्रवण के फल का वर्णन) के बिना पूर्ण नहीं माना जाता। कथा के समापन पर जो फल-वचन महर्षि लोमश ने राजा मान्धाता को और भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाया था, वह पारंपरिक रूप से कथा के अंत में ज्यों-का-त्यों पढ़ा जाता है। यह फलश्रुति एकादशी के माहात्म्य को पूर्णता प्रदान करती है。

इस व्रत के प्रभाव से जिन घोर पापों का नाश होता है, उनकी पारंपरिक सूची निम्नलिखित है:

पाप का स्वरूप पारंपरिक संदर्भ (शास्त्रों के अनुसार) व्रत का प्रभाव
ब्रह्महत्या ब्राह्मण अथवा ज्ञानी पुरुष की हत्या समूल नाश
सुवर्ण की चोरी सोने अथवा बहुमूल्य वस्तु की चोरी (स्तेय) समूल नाश
सुरापान/मद्यपान नशीले पदार्थों अथवा मदिरा का सेवन समूल नाश
गुरु-पत्नी गमन गुरु की पत्नी अथवा सम्माननीय स्त्री के साथ व्यभिचार समूल नाश
अगम्या गमन शास्त्रों द्वारा वर्जित संबंधों में लिप्त होना समूल नाश
गर्भपात / बाल हत्या भ्रूण हत्या अथवा शिशु वध समूल नाश

भगवान श्रीकृष्ण कथा का उपसंहार करते हुए धर्मराज युधिष्ठिर से कहते हैं— "हे राजन्! जो श्रेष्ठ मनुष्य श्रद्धा और भक्ति-भाव से इस 'पापमोचनी एकादशी' का व्रत करते हैं, उनके जाने-अनजाने में किए गए सारे पाप पूर्ण रूप से नष्ट हो जाते हैं और वे मृत्यु के पश्चात मोक्ष को प्राप्त होते हैं।"

महर्षि लोमश राजा मान्धाता से कहते हैं— "हे नृपश्रेष्ठ! हे राजन्! इस पापमोचनी एकादशी के प्रभाव से मनुष्य की समस्त पाप-राशि जलकर भस्म हो जाती है। जो भी मनुष्य पूर्ण एकाग्रचित्त होकर इस पावन एकादशी की कथा को पढ़ता है अथवा श्रद्धापूर्वक श्रवण करता है, उसे सहस्र (एक हजार) गौदान (गायों का दान) करने का महान पुण्य फल प्राप्त होता है।" पारंपरिक श्लोक में इसे इस प्रकार उद्घोषित किया गया है— "पठनात् श्रवणाद् राजन् गौ सहस्र फलं लभेत्।"

शास्त्रों में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि पापमोचनी एकादशी का व्रत इतना शक्तिशाली है कि यह महापातकों (सबसे बड़े पापों) से भी मनुष्य को मुक्त कर देता है। इस व्रत को करने से ब्रह्म हत्या (ब्राह्मण की हत्या) करने वाले, सुवर्ण (सोना) चुराने वाले, मद्यपान (सुरापान) करने वाले, गुरु-पत्नी के साथ गमन करने वाले, अगम्या गमन करने वाले और गर्भपात (भ्रूण हत्या) जैसे अत्यंत भयंकर पाप करने वाले महापापी भी पूर्णतः पापमुक्त हो जाते हैं और अंत में परम गति (स्वर्गलोक/वैकुंठ) को प्राप्त होते हैं।

हे राजन्! यह पापमोचनी एकादशी का उत्तम व्रत मनुष्यों के लिए चिन्तामणि के समान समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला, सब पापों को हरने वाला और अंत में मोक्ष प्रदान करने वाला है। अतः प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन के पापों का प्रायश्चित करने और भगवान श्री हरि विष्णु की अनंत कृपा प्राप्त करने हेतु इस व्रत का पालन और इस कथा का श्रवण अवश्य करना चाहिए।

बोलिए भगवान श्री हरि विष्णु की जय।

पापमोचनी एकादशी माता की जय।

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