भविष्य पुराण के अंतर्गत वैशाख कृष्ण पक्ष की वरूथिनी एकादशी की संपूर्ण, प्रामाणिक एवं विस्तृत व्रत कथा
१. मंगलाचरण एवं पौराणिक पृष्ठभूमि का पारंपरिक आरंभ
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्। देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥
सृष्टि के पालनहार, चतुर्भुज रूपधारी, शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करने वाले श्रीहरि विष्णु के चरण कमलों में कोटि-कोटि वंदन है। अज्ञान रूपी अंधकार को नष्ट करने वाले भगवान वेदव्यास जी की वंदना करते हुए, पुराणों के पुण्यमय आख्यानों का स्मरण किया जाता है। सनातन धर्म में एकादशी तिथि का स्थान सर्वोपरि है। यह तिथि साक्षात् भगवान श्रीहरि की स्वरूपा मानी गई है । पुराणों में वर्णित है कि जो भी प्राणी एकादशी का व्रत श्रद्धा और निष्ठा के साथ करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर अंततः मोक्ष को प्राप्त होता है。
नैमिषारण्य के पवित्र तपोवन में, जहाँ शौनक आदि अट्ठासी हजार ऋषि-मुनि ज्ञान की पिपासा शांत करने हेतु एकत्रित थे, वहाँ सूतजी महाराज ने पुराणों की अद्भुत कथाओं का रसपान कराया। सूतजी कहते हैं— "हे ऋषियों! एकादशी के माहात्म्य का वर्णन स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत काल में धर्मराज युधिष्ठिर के समक्ष किया था । भविष्य पुराण और पद्म पुराण में इस पावन तिथि के संदर्भ में जो पारंपरिक आख्यान, यम-नियम और व्रत-फल वर्णित हैं, वही आख्यान मैं आप सभी के कल्याण हेतु प्रस्तुत कर रहा हूँ। आज वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की परम कल्याणकारी 'वरूथिनी एकादशी' की कथा का पूर्ण एवं अक्षुण्ण पाठ प्रस्तुत है।"
२. युधिष्ठिर-श्रीकृष्ण संवाद: कथा का पारंपरिक प्रारंभ
महाभारत के भयंकर युद्ध और उसके पश्चात् के समय में, जब पांडवों ने धर्मराज्य की स्थापना कर ली, तब एक दिन धर्मराज युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर, अतीव श्रद्धा और भक्ति-भाव से, तीनों लोकों के स्वामी भगवान श्रीकृष्ण से एकादशी तिथियों के माहात्म्य को जानने की अभिलाषा प्रकट की । युधिष्ठिर का हृदय प्रजा के कल्याण और धर्म के गूढ़ रहस्यों को जानने के लिए सदैव लालायित रहता था。
युधिष्ठिर उवाच:
धर्मराज युधिष्ठिर ने अत्यंत विनीत भाव से कहा— "हे वासुदेव! हे जगत्पते! हे कमलनयन! मैं आपके श्रीचरणों में साष्टांग प्रणाम करता हूँ। हे देव! आपके मुखारविंद से विभिन्न व्रतों और एकादशियों की पावन कथाएँ सुनकर मेरे मन को असीम शांति प्राप्त होती है। हे माधव! अब आप कृपा करके मुझे वैशाख मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी के विषय में विस्तार से बताएँ। इस पवित्र एकादशी का क्या नाम है? इसकी महिमा क्या है? इस दिन किस देवता की आराधना की जाती है? और इस व्रत को धारण करने से प्राणी को किस अलौकिक फल की प्राप्ति होती है? हे कृपानिधान! इस व्रत की जो भी पारंपरिक और प्रामाणिक कथा हो, वह आप मुझे सुनाने की कृपा करें, जिससे मेरा और संपूर्ण मानव जाति का कल्याण हो सके।"
श्रीकृष्ण उवाच:
धर्मराज युधिष्ठिर के ऐसे धर्मयुक्त, लोक-कल्याणकारी और विनयपूर्ण वचन सुनकर भगवान श्रीकृष्ण के मुखमंडल पर मंद मुस्कान छा गई। भगवान मधुसूदन अपनी अमृतमयी वाणी में बोले— "हे राजन्! हे धर्मराज! तुमने संपूर्ण मानव जाति के कल्याण और तीनों लोकों के हित के लिए अत्यंत उत्तम और पवित्र प्रश्न किया है। तुम्हारी धर्म में ऐसी निष्ठा देखकर मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की यह पवित्र एकादशी 'वरूथिनी एकादशी' के नाम से विख्यात है । 'वरूथिनी' का शाब्दिक अर्थ है 'रक्षक' या 'कवच प्रदान करने वाली'। अतः यह एकादशी अपने भक्तों को संपूर्ण पापों, कष्टों, रोगों और दुर्भाग्य से सुरक्षित रखने वाली एक दिव्य ढाल के समान है । हे कुंतीपुत्र! यह एकादशी लोक और परलोक, दोनों में सौभाग्य प्रदान करने वाली, समस्त पापों का समूल नाश करने वाली और अंत में प्राणी को मोक्ष देने वाली है। जो भी प्राणी इस एकादशी का व्रत पूर्ण निष्ठा से करता है, वह मेरी विशेष कृपा का पात्र बन जाता है।"
वरूथिनी एकादशी का माहात्म्य एवं दानों से तुलना
भगवान श्रीकृष्ण ने वरूथिनी एकादशी की अनंत महिमा का विस्तार से वर्णन करते हुए आगे कहा— "हे राजन्! इस चराचर जगत में दान का विशेष महत्व शास्त्रों में वर्णित है। संसार में विभिन्न प्रकार के दान मनुष्य को सद्गति प्रदान करते हैं। महर्षियों ने दानों की एक श्रेष्ठता-क्रम निर्धारित की है, जिसके अनुसार प्रत्येक दान का अपना विशिष्ट फल है।"
भगवान श्रीकृष्ण के वचनों के अनुसार दानों की श्रेष्ठता का पारंपरिक क्रम इस प्रकार है:
| दान का प्रकार | दान की महिमा एवं तुलनात्मक श्रेष्ठता |
|---|---|
| अश्व दान (घोड़े का दान) | सामान्य दानों में इसे अत्यंत पवित्र और श्रेष्ठ माना गया है। |
| गज दान (हाथी का दान) | शास्त्रों के अनुसार, हाथी का दान घोड़े के दान से भी अधिक श्रेष्ठ है । |
| भूमि दान | हाथी के दान से श्रेष्ठ भूमि का दान माना गया है, क्योंकि यह आश्रय प्रदान करता है। |
| तिल दान | भूमि दान से श्रेष्ठ तिल का दान है, जो पितरों को तृप्त करता है। |
| स्वर्ण दान | तिल के दान से श्रेष्ठ स्वर्ण दान है, जो दरिद्रता का नाश करता है। |
| अन्न दान | स्वर्ण दान से भी श्रेष्ठ अन्न दान है, क्योंकि अन्न से ही देवता, पितर और समस्त प्राणियों की तृप्ति होती है। |
| कन्या दान | अन्न दान के समान ही कन्या दान को भी महादान माना गया है । |
| विद्या दान | कन्या दान से भी बढ़कर विद्या का दान है, जो अज्ञान के अंधकार को मिटाता है। |
| गोदान (गायों का दान) | विद्या दान से भी बढ़कर गोदान है, जो सभी पापों को धो देता है। |
"परन्तु हे युधिष्ठिर! जो असीम पुण्य और फल इन सभी प्रकार के महादानों को करने से प्राप्त होता है, वह सारा का सारा पुण्य केवल एक बार श्रद्धापूर्वक 'वरूथिनी एकादशी' का व्रत कर लेने से मनुष्य को सहज ही प्राप्त हो जाता है । सूर्य ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र जैसे परम पवित्र तीर्थ में एक सौ मन स्वर्ण दान करने से जो अक्षय पुण्य प्राप्त होता है, वही महान पुण्य वरूथिनी एकादशी का व्रत करने वाले प्राणी को बिना किसी प्रयास के प्राप्त हो जाता है । हे नृपश्रेष्ठ! दस हजार वर्षों तक घोर वन में जाकर निराहार रहकर जो तपस्या का फल मिलता है, वह फल वरूथिनी एकादशी का उपवास करने से एक ही दिन में मिल जाता है ।
इस एकादशी के प्रभाव से एक दुर्भाग्यशाली और कष्टों में घिरी स्त्री भी परम सौभाग्यवती हो जाती है। यह व्रत दुखी प्राणियों के लिए अमृत के समान है। यमराज के दूतों से भयभीत रहने वाले और जन्म-मरण के चक्र में फँसे हुए जीवों के लिए इस व्रत से बड़ा कोई रक्षक नहीं है । हे युधिष्ठिर! प्राचीन काल में इक्ष्वाकु वंश के महाराजा धुन्धुमार ने भी इसी एकादशी का व्रत किया था, जिसके प्रभाव से वे भगवान शिव द्वारा दिए गए भयंकर शाप (कुष्ठ रोग) से मुक्त हो गए थे । इसी प्रकार, एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, इस व्रत के प्रताप से एक अत्यंत पापी व्यक्ति भी अपने पापों से मुक्त होकर गरुड़ पर सवार होकर विष्णु लोक को प्राप्त हुआ था। परन्तु इस व्रत की जो सबसे महान और प्रामाणिक कथा है, वह सूर्यवंशी राजा मान्धाता की है। मैं तुम्हें राजा मान्धाता का वह अद्भुत आख्यान पूर्ण विस्तार से सुनाता हूँ, जिसे ध्यानपूर्वक श्रवण करो।"
३. मुख्य कथा: राजा मान्धाता का परिचय एवं धर्मनिष्ठ शासन
श्रीकृष्ण बोले— "हे धर्मराज! प्राचीन काल में पावन नर्मदा नदी के तट पर सूर्यवंश (इक्ष्वाकु वंश) के एक अत्यंत प्रतापी, चक्रवर्ती और धर्मनिष्ठ सम्राट राज्य करते थे, जिनका नाम राजा मान्धाता था । राजा मान्धाता का जन्म अत्यंत अलौकिक था और वे भगवान विष्णु के परम भक्त थे। उनका साम्राज्य अत्यंत विस्तृत था और उनकी कीर्ति चारों दिशाओं में फैली हुई थी। उनके तेज के समक्ष बड़े-बड़े शत्रु नतमस्तक हो जाते थे, परन्तु उनका स्वभाव अत्यंत विनम्र और देवतुल्य था。
राजा मान्धाता केवल एक शूरवीर ही नहीं थे, अपितु वे अत्यंत दानी, तपस्वी और प्रजापालक शासक थे । उनके राज्य में 'धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष'—इन चारों पुरुषार्थों का पूर्ण रूप से पालन होता था। उनके शासनकाल में प्रजा को किसी भी प्रकार का दैहिक, दैविक या भौतिक ताप नहीं सताता था। उनके राज्य की भूमि साक्षात् कामधेनु के समान फल देने वाली थी, जो बिना जोते ही प्रचुर अन्न उत्पन्न करती थी। चारों वर्ण और चारों आश्रमों के लोग अपने-अपने धर्म का निष्ठापूर्वक पालन करते थे । राजा अपनी प्रजा का पालन अपने ही औरस पुत्रों की भांति करते थे। उनके राज्य में कभी अकाल नहीं पड़ता था, कोई अकाल मृत्यु को प्राप्त नहीं होता था, और कोई भी व्यक्ति भूखा या दरिद्र नहीं था。
राजा मान्धाता का हृदय अत्यंत कोमल और दानशील था। उनके विशाल राजदरबार से कोई भी भिक्षुक या याचक कभी खाली हाथ नहीं लौटता था। ब्राह्मणों का आदर, गौ माता की रक्षा, संतों का सत्कार और यज्ञ-हवन राजा के दैनिक जीवन का अनिवार्य अंग था। उनका सारा जीवन भगवान श्रीहरि की उपासना और धर्म के संवर्धन में ही व्यतीत होता था । राजा के खजाने सदैव दान के लिए खुले रहते थे और उनके राज्य में चारों ओर शांति, समृद्धि और सत्य का बोलबाला था。
४. वनगमन का प्रसंग एवं घोर तपस्या
"यद्यपि राजा मान्धाता के पास संपूर्ण वैभव, ऐश्वर्य और त्रैलोक्य के समान सुख उपलब्ध थे, तथापि उनका मन सांसारिक भोगों में लिप्त नहीं था। जीवन के उत्तरार्ध में, जब राजा ने देखा कि उनके पुत्र राज्य का भार संभालने योग्य हो गए हैं, तब भगवान विष्णु की अनन्य भक्ति और आत्म-साक्षात्कार की उत्कृष्ट अभिलाषा से प्रेरित होकर, राजा ने अपना राजपाट अपने योग्य पुत्रों को सौंप दिया और संन्यास ग्रहण करने का दृढ़ निश्चय किया。
सांसारिक मोह-माया का परित्याग कर, राजा मान्धाता राजसी वस्त्रों को त्यागकर घने और एकांत वन की ओर प्रस्थान कर गए । वे नर्मदा नदी के उस पार एक ऐसे अति दुर्गम और शांत वन में पहुँचे, जहाँ अनेक सिद्ध ऋषियों और महर्षियों के पावन आश्रम स्थित थे । वन का वातावरण अत्यंत मनोरम और आध्यात्मिक था। वहाँ कदम्ब, अशोक, पीपल, बरगद और रुद्राक्ष के विशाल वृक्ष आकाश को चूम रहे थे। मृग, मयूर और अन्य वन्य जीव आपस का वैर भुलाकर एक साथ विचरण कर रहे थे。
उन ऋषि आश्रमों के सामीप्य में, राजा मान्धाता ने एक विशाल और प्राचीन वृक्ष के नीचे अपना आसन ग्रहण किया। राजा ने उस तपोभूमि को अपनी तपस्या के लिए अत्यंत उपयुक्त माना, क्योंकि वहाँ मुनियों के वेद मंत्रों की गूंज और यज्ञ की पवित्र अग्नि का धुआँ वातावरण को शुद्ध कर रहा था。
राजा ने वल्कल वस्त्र धारण किए, सभी प्रकार के राजसी अन्न-जल का परित्याग किया, और पद्मासन लगाकर अपने नेत्र बंद कर लिए। उन्होंने अपने चंचल मन और दसों इंद्रियों को पूर्ण रूप से वश में कर लिया। अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि स्थिर करते हुए, वे अपने हृदय कमल में भगवान विष्णु के चतुर्भुज स्वरूप—जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित हैं—का ध्यान करने लगे। राजा की यह तपस्या इतनी घोर और निष्काम थी कि वे अपने शरीर की सुध-बुध पूरी तरह खो बैठे। उन्हें सर्दी, गर्मी, वर्षा या भूख-प्यास का तनिक भी भान नहीं रहा । वे केवल 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' के अजपा-जाप में लीन हो गए और जड़वत एक ही स्थान पर वर्षों तक बैठे रहे。
५. भयंकर भालू द्वारा आक्रमण एवं भुजा-विच्छेदन की दारुण घटना
"हे युधिष्ठिर! समय व्यतीत होता गया और राजा मान्धाता की तपस्या अपने चरम पर पहुँच गई। उनका शरीर कृशकाय हो गया था, परन्तु उनके मुख पर ब्रह्मतेज चमक रहा था। तभी एक दिन, विधाता के अटल विधान और प्रारब्ध के खेल से, वन में एक अत्यंत विशाल और खूंखार जंगली भालू भटकता हुआ उसी स्थान पर आ पहुँचा, जहाँ राजा मान्धाता समाधिस्थ थे ।
वह भालू अत्यंत भूखा, क्रूर और भयानक था। उसके नेत्र लाल अंगारे के समान दहक रहे थे और उसके विशाल जबड़ों से लार टपक रही थी। उसने जब वृक्ष के नीचे शांत और निहत्थे बैठे राजा को देखा, तो वह भयंकर गर्जना करता हुआ उनकी ओर झपटा। बिना किसी पूर्व चेतावनी के, उस खूंखार जंगली भालू ने राजा मान्धाता पर प्राणघातक आक्रमण कर दिया । भालू ने अपने नुकीले और भयंकर दांतों से राजा की दायीं भुजा को जोर से पकड़ लिया और उसे चबाने लगा ।
भालू के दांत राजा की भुजा के मांस को फाड़ते हुए हड्डियों तक पहुँच गए। भुजा-विच्छेदन की वह पीड़ा अत्यंत असहनीय और अकल्पनीय थी। रक्त की धारा बह निकली, जिसने वन की भूमि को लाल कर दिया। भालू राजा की भुजा को नोंचता रहा और उन्हें घसीटता हुआ पास के घने और अंधकारमय जंगल की ओर ले जाने लगा ।
परन्तु हे राजन्! राजा मान्धाता का अलौकिक धैर्य और धर्म-निष्ठा देखो! ऐसी असहनीय शारीरिक और मानसिक पीड़ा के बीच, जब उनका शरीर लहूलुहान हो रहा था और उनकी भुजा भालू के जबड़ों में चब रही थी, तब भी राजा ने क्षत्रिय होने के बावजूद अपने प्राणों की रक्षा के लिए तनिक भी प्रतिकार नहीं किया । राजा ने विचार किया— 'मैं वन में तपस्वी जीवन व्यतीत कर रहा हूँ और मैंने संपूर्ण जगत के प्रति अहिंसा का व्रत धारण किया है। यदि मैंने इस भालू पर प्रहार किया या अपने मन में तनिक भी क्रोध उत्पन्न किया, तो मेरा बरसों का तप भंग हो जाएगा और मेरी तपश्चर्या निष्फल हो जाएगी।' इस महान विचार से राजा मान्धाता ने न तो भालू पर क्रोध किया, न ही अपने बचाव के लिए कोई शस्त्र उठाया, और न ही अपनी आँखें खोलीं। वे जानते थे कि शरीर नश्वर है, परन्तु धर्म और व्रत शाश्वत हैं । राजा मान्धाता ने उस दारुण दुख को भगवान की इच्छा और अपने प्रारब्ध का भोग मानकर पूर्ण धैर्य के साथ सहन किया。
६. दुःख, आर्तनाद एवं भगवान श्रीहरि की स्तुति
"जब भालू राजा को घसीटते हुए और उनकी भुजा को खाते हुए जंगल के अत्यंत घने और अंधेरे हिस्से में ले गया, तब राजा का धैर्य शारीरिक रूप से टूटने लगा। भालू ने उनकी एक भुजा को पूरी तरह से विच्छेदित कर दिया था। उनका शरीर अत्यंत दुर्बल हो चुका था और अत्यधिक रक्तस्राव के कारण उनके प्राण संकट में पड़ गए थे । मृत्यु को अपने सम्मुख देखकर राजा मान्धाता भयभीत अवश्य हुए, परन्तु उन्होंने किसी सांसारिक शक्ति, अस्त्र-शस्त्र या अपने बाहुबल का आश्रय नहीं लिया。
निस्सहाय और मर्माहत अवस्था में, राजा ने अपने हृदय में विराजमान अपने एकमात्र रक्षक, त्रिलोकीनाथ भगवान श्रीहरि विष्णु को पुकारना आरंभ किया । राजा ने मन ही मन अत्यंत करुण और कातर स्वर में भगवान की स्तुति करते हुए कहा—
'हे दीनानाथ! हे कमलनयन! हे शरणागतवत्सल! हे अखिल ब्रह्मांड नायक! मेरी रक्षा करें। हे नारायण, जिस प्रकार आपने ग्राह के मुख से डूबते हुए गजेन्द्र की रक्षा की थी और अपना सुदर्शन चक्र चलाकर ग्राह का उद्धार किया था, जिस प्रकार आपने भक्त प्रह्लाद को हिरण्यकशिपु के भीषण अत्याचारों से बचाया था, उसी प्रकार आज इस खूंखार पशु से मेरी रक्षा करें। हे प्रभु! मैं पूर्ण रूप से आपकी शरण में हूँ। मेरा यह शरीर, मन और प्राण केवल आपके ही निमित्त है। यदि मेरी घोर तपस्या में कोई त्रुटि रह गई हो, तो मुझे क्षमा करें, परन्तु हे माधव! अपने इस दास को इस दारुण कष्ट से उबारें।' राजा की आँखों से अश्रु बहने लगे और उनका सच्चा आर्तनाद सीधे वैकुण्ठ में भगवान विष्णु के कानों तक पहुँचा।"
७. भगवान का प्राकट्य एवं भालू का वध
"हे युधिष्ठिर! भगवान विष्णु अपने भक्तों का दुख कभी सहन नहीं कर सकते। वे तो करुणा के सागर हैं। जैसे ही उन्होंने राजा मान्धाता की करुण पुकार सुनी, वे क्षण भर का भी विलंब किए बिना, गरुड़ पर सवार होकर तुरंत उस घने वन में प्रकट हो गए । भगवान के दिव्य और अलौकिक प्रकाश से वह सारा अंधकारमय वन जगमगा उठा。
भगवान विष्णु ने देखा कि उनका परम भक्त रक्त से लथपथ है और एक क्रूर भालू उनकी भुजा को पूरी तरह से चबा चुका है। भक्त की यह दारुण दुर्दशा देखकर श्रीहरि ने तुरंत अपना अमोघ और तेजस्वी 'सुदर्शन चक्र' धारण किया। भगवान ने अपने चक्र से उस क्रूर भालू पर प्रहार किया। सुदर्शन चक्र ने क्षण भर में भालू का मस्तक धड़ से अलग कर दिया और उसे मार गिराया । साक्षात् भगवान के हाथों मारे जाने के कारण उस भालू का भी उद्धार हो गया और वह पाप मुक्त हो गया。
भगवान ने अपने दिव्य हाथों से राजा मान्धाता को उठाया और उनके घावों पर अपना करुणापूर्ण हाथ फेरा। परन्तु राजा अत्यंत दुखी और शोकग्रस्त थे। जब राजा ने देखा कि भालू ने उनकी एक भुजा पूरी तरह से खा ली है और उनका सुंदर शरीर सदा के लिए अंगभंग हो चुका है, तो वे अतीव वेदना से रोने लगे।"
८. पूर्व-पुण्य की रक्षा एवं ऋषि आश्रम गमन
"राजा को इस प्रकार विलाप करते देख, करुणासागर भगवान विष्णु ने बड़े ही कोमल और मधुर वचनों में कहा—
'हे वत्स! हे राजन्! तुम शोक मत करो । तुम मेरे अनन्य भक्त हो और मैंने तुम्हारी रक्षा की है। तुम्हारी तपस्या से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ।'
राजा मान्धाता ने हाथ जोड़कर पूछा— 'हे भगवन्! मैंने जीवन भर धर्म का पालन किया, दान दिए, और सत्य के मार्ग पर चला। यहाँ भी मैं पूर्ण निष्ठा और अहिंसा के साथ आपकी घोर तपस्या कर रहा था। फिर मुझे यह भयंकर शारीरिक और मानसिक पीड़ा क्यों सहनी पड़ी? भालू द्वारा मेरी भुजा के विच्छेदन का क्या कारण है?'
भगवान विष्णु ने राजा के पूर्व जन्मों के कर्मों का रहस्य खोलते हुए कहा— 'हे राजन्! इसमें आश्चर्य करने की कोई बात नहीं है। संसार का यह अटल नियम है कि प्राणी को अपने कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है। यह दुखद घटना तुम्हारे किसी पूर्व जन्म के अपराध का ही परिणाम है । पूर्व जन्म में अंजाने में किए गए एक पाप कर्म के कारण ही तुम्हें यह शारीरिक कष्ट प्राप्त हुआ है और इस भालू ने तुम्हारी भुजा काटी है। परन्तु चूँकि तुम इस जन्म में धर्मनिष्ठ रहे, तुमने अपनी तपस्या के दौरान क्रोध नहीं किया, धैर्य नहीं खोया, और क्षमाशीलता का व्रत निभाते हुए मुझ पर अपना पूर्ण विश्वास बनाए रखा, इसलिए तुम्हारा वह पूर्व-पाप अब पूर्ण रूप से नष्ट हो चुका है। तुम्हारे पूर्व-पुण्य की रक्षा हुई है और तुम्हारी तपस्या व्यर्थ नहीं गई है。
अब तुम इस अंगभंग अवस्था से मुक्ति पाने के लिए यहाँ समीप ही स्थित एक महान ऋषि के आश्रम में जाओ। वे ऋषि तुम्हें आगे का मार्ग दिखाएंगे।' इतना कहकर भगवान विष्णु वहीं अंतर्धान हो गए।
भगवान के दर्शन पाकर राजा मान्धाता का सारा शोक और भय समाप्त हो गया। यद्यपि उनकी भुजा कट चुकी थी, फिर भी भगवान की आज्ञा को शिरोधार्य कर, राजा मान्धाता वन में आगे बढ़े और समीप ही स्थित एक अत्यंत पवित्र ऋषि आश्रम में पहुँचे । वहाँ एक सिद्ध महर्षि तपस्यारत थे। राजा ने अपनी एक भुजा से ही महर्षि के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और अपनी संपूर्ण व्यथा तथा भगवान विष्णु के आदेश के विषय में उन्हें बताया।"
९. वरूथिनी एकादशी व्रत का उपदेश
"राजा मान्धाता की पीड़ा और भगवान के आदेश को सुनकर सिद्ध महर्षि अत्यंत प्रसन्न हुए। महर्षि ने राजा को सांत्वना देते हुए कहा—
'हे राजन्! भगवान श्रीहरि अत्यंत दयालु हैं। उन्होंने तुम्हें पाप मुक्त कर दिया है। अब तुम्हारे शरीर की पूर्णता और मोक्ष की प्राप्ति के लिए मैं तुम्हें एक परम कल्याणकारी व्रत का उपदेश देता हूँ। तुम यहाँ से तुरंत भगवान विष्णु की पवित्र नगरी मथुरा की ओर प्रस्थान करो । वैशाख मास के कृष्ण पक्ष में जो एकादशी आती है, उसे 'वरूथिनी एकादशी' कहा जाता है। वह एकादशी तीनों लोकों में भगवान को अत्यंत प्रिय है और वह सभी पापों का समूल नाश करने वाली है। तुम मथुरा पहुँचकर, उस वरूथिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के 'वराह अवतार' (भगवान विष्णु का सूकर अवतार जिसने पाताल से पृथ्वी का उद्धार किया था) की विधि-विधान से पूजा करो और पूर्ण निष्ठापूर्वक इस एकादशी का उपवास करो ।
हे मान्धाता! वरूथिनी एकादशी का व्रत अत्यंत प्रभावशाली है। इसके प्रभाव से न केवल तुम्हारे पूर्व जन्म के शेष पाप भस्म हो जाएंगे, अपितु तुम्हारी कटी हुई भुजा पुनः उग आएगी। तुम्हारा यह शरीर पहले से भी अधिक सुंदर, सुदृढ़ और पूर्ण अंगों वाला हो जाएगा。
महर्षि ने राजा को वरूथिनी एकादशी के कठोर नियमों का उपदेश देते हुए कहा कि इस व्रत में दशमी से लेकर द्वादशी तक कुछ विशेष नियमों का पालन करना अनिवार्य है。
दशमी, एकादशी और द्वादशी के पारंपरिक व्रत नियम
महर्षि ने जो व्रत-नियम बताए, वे इस प्रकार हैं:
| व्रत के दिन | वर्जित कर्म एवं पालन योग्य नियम |
|---|---|
| दशमी के दिन | दशमी के दिन से ही शारीरिक और मानसिक पवित्रता ग्रहण करनी चाहिए। कांसे के बर्तन में भोजन करना वर्जित है । मसूर की दाल, चने, कोदों, शाक (जैसे पालक), और मधु (शहद) का सेवन नहीं करना चाहिए । दूसरे के घर का अन्न खाने का पूर्णतः त्याग करना चाहिए। दशमी के दिन सूर्यास्त के पश्चात भोजन नहीं करना चाहिए और केवल एक बार सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए । पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। |
| एकादशी के दिन | एकादशी के दिन पूर्ण निराहार और निर्जल रहकर (अपनी क्षमता अनुसार) व्रत करना चाहिए । किसी की निंदा नहीं करनी चाहिए, झूठ नहीं बोलना चाहिए, और क्रोध से सर्वथा दूर रहना चाहिए । जुआ खेलना, दिन में सोना, बाल या नाखून काटना, और शरीर पर तेल लगाना पूर्णतः वर्जित है । रात्रि के समय निद्रा का परित्याग कर भगवान के नाम का संकीर्तन और जागरण करना चाहिए । |
| द्वादशी के दिन | द्वादशी के दिन सूर्योदय के पश्चात ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देनी चाहिए। गौमाता को ग्रास खिलाना चाहिए। तत्पश्चात, भगवान के चरणों का चरणामृत एवं तुलसी पत्र ग्रहण कर अपने व्रत का पारण करना चाहिए । पारण के समय सात्विक भोजन ही ग्रहण करना चाहिए। |
महर्षि ने कहा— 'हे राजन्! तुम मेरी आज्ञा मानकर इन नियमों के साथ इस व्रत का अनुष्ठान करो।' महर्षि का आशीर्वाद प्राप्त कर राजा मान्धाता ने बिना किसी विलंब के मथुरा नगरी की ओर प्रस्थान किया।"
१०. श्रद्धापूर्वक व्रत-पालन एवं भुजा की पुनः प्राप्ति
"मथुरा पहुँचकर राजा मान्धाता ने ऋषि द्वारा बताए गए मार्ग का अक्षरशः पालन किया । जब वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि आई, तब राजा ने सभी निषिद्ध वस्तुओं का त्याग कर दिया और पूर्ण सात्विकता धारण की。
अगले दिन, प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर, राजा ने यमुना नदी के पवित्र जल में स्नान किया और वरूथिनी एकादशी के व्रत का संकल्प लिया। राजा ने 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का निरंतर उच्चारण करते हुए भगवान विष्णु के 'वराह अवतार' की प्रतिमा स्थापित की । उन्होंने अक्षत, धूप, दीप, गंध, पुष्प, चंदन और तुलसी दल से भगवान वराह की षोडशोपचार पूजा की। राजा ने भगवान को ऋतुफल, पीले फल और मिष्ठान्न का भोग लगाया ।
पूरे दिन निराहार रहकर, राजा ने अपनी इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखा। उन्होंने किसी की निंदा नहीं की और क्रोध से दूर रहे। रात्रि के समय, राजा ने निद्रा का परित्याग कर दिया और जागरण करते हुए भगवान के नाम का संकीर्तन किया। उनका पूरा ध्यान केवल भगवान के वराह स्वरूप पर केंद्रित था ।
अगले दिन, द्वादशी तिथि के सूर्योदय के पश्चात, राजा ने स्नान कर ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा दी, गौमाता को रोटी दी, और भगवान के चरणों का चरणामृत एवं तुलसी पत्र ग्रहण कर अपने व्रत का पारण किया ।
हे युधिष्ठिर! वरूथिनी एकादशी व्रत के महान प्रताप, ऋषि के उपदेश और भगवान वराह की असीम कृपा से, पारण करते ही एक अद्भुत चमत्कार हुआ। राजा मान्धाता की वह भुजा जिसे भालू ने चबाकर खा लिया था, वह चमत्कारिक रूप से पुनः उनके शरीर से उत्पन्न होकर जुड़ गई और पूरी तरह स्वस्थ हो गई । राजा का अंगभंग शरीर पुनः अत्यंत सुंदर, बलिष्ठ और दिव्य कांति से परिपूर्ण हो गया। उनकी खोई हुई शक्ति वापस लौट आई और उनके शरीर से एक अलौकिक तेज निकलने लगा ।
व्रत के फलस्वरूप, राजा मान्धाता अपने पूर्व जन्म के सभी पापों से पूरी तरह मुक्त हो गए। उनकी निष्ठा की जीत हुई। तत्पश्चात, राजा मान्धाता अपनी राजधानी लौट आए और अनेक वर्षों तक सुखपूर्वक और धर्मपूर्वक राज्य का संचालन किया। अंत समय में, इसी वरूथिनी एकादशी के महान पुण्य के प्रभाव से राजा मान्धाता मृत्यु के बाद एक दिव्य विमान में बैठकर सीधे स्वर्ग और साक्षात् विष्णु लोक (वैकुण्ठ धाम) को प्राप्त हुए।"
११. पारंपरिक उपसंहार एवं फलश्रुति
धर्मराज युधिष्ठिर को यह अत्यंत पावन कथा सुनाने के पश्चात, भगवान श्रीकृष्ण ने वरूथिनी एकादशी की फलश्रुति (व्रत कथा सुनने और पढ़ने का फल) का पारंपरिक वर्णन किया。
श्री भगवान उवाच: "हे युधिष्ठिर! मैंने तुम्हारे समक्ष यह अत्यंत गुप्त और परम पवित्र वरूथिनी एकादशी का माहात्म्य और राजा मान्धाता की कथा पूर्ण रूप से कह सुनाई है। इस व्रत से प्राणी की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और वह जन्म-मृत्यु के चक्र से छूटकर अंतिम गति प्राप्त करता है ।
पारंपरिक फल-वचन: जो मनुष्य संसार के भय से पीड़ित है, उसे वरूथिनी एकादशी का व्रत रखकर भगवान विष्णु का स्मरण अवश्य करना चाहिए। इस व्रत को करने से समस्त पापों का नाश होकर मोक्ष मिलता है । बड़े से बड़े पाप को नष्ट करने के लिए वरूथिनी एकादशी का व्रत अति उत्तम है। यमराज से डरने वाले मनुष्य को वरूथिनी एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए。
जो भी मनुष्य पूर्ण श्रद्धा और भक्ति-भाव से इस वरूथिनी एकादशी का व्रत करता है, अथवा जो व्यक्ति व्रत करने में असमर्थ होने पर भी केवल इस पावन एकादशी की कथा और माहात्म्य को पढ़ता है, सुनता है, या दूसरों को सुनाता है, उसे दस हजार वर्षों की तपस्या का फल प्राप्त होता है । इतना ही नहीं, इस कथा के श्रवण मात्र से मनुष्य को सहस्त्र गोदान (एक हज़ार गायों के दान) के बराबर महापुण्य की प्राप्ति होती है । वह इस लोक में सभी प्रकार के सांसारिक सुखों को भोगकर, अंततः सभी पापों से मुक्त होकर साक्षात श्री विष्णु लोक (वैकुण्ठ धाम) में प्रतिष्ठित होता है ।"
इस प्रकार भविष्य पुराण के अंतर्गत धर्मराज युधिष्ठिर और भगवान श्रीकृष्ण के संवाद में वर्णित, सूर्यवंशी राजा मान्धाता और वराह भगवान से संबंधित वरूथिनी एकादशी की यह संपूर्ण और पारंपरिक व्रत-कथा संपन्न हुई।
बोलिए श्री विष्णु भगवान की जय! वराह भगवान की जय! वरूथिनी एकादशी माता की जय! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।