विस्तृत उत्तर
शास्त्रों में वरूथिनी एकादशी का फल अन्य सभी दानों और व्रतों से कहीं अधिक उत्कृष्ट बताया गया है। भविष्य पुराण के अनुसार, जो पुण्य दस हजार वर्षों की कठिन तपस्या से मिलता है, वह इस एक व्रत से मिल जाता है। यह व्रत सुपात्र ब्राह्मण को दान देने, अश्वमेध यज्ञ करने और यहां तक कि 'कन्यादान' करने से भी अधिक श्रेष्ठ है। कुरुक्षेत्र में सूर्य ग्रहण के समय 40 किलो (एक मन) सोना दान करने पर जो पुण्य मिलता है, वही पुण्य इस व्रत का है। पद्म पुराण कहता है कि चित्रगुप्त भी इस व्रत के पुण्यों का हिसाब लगाने में असमर्थ हैं।



