विस्तृत उत्तर
सीता-राम विवाह में कन्यादान राजा जनक ने किया।
चौपाई — 'गहि गिरीस कुस कन्या पानी। भवहि समरपीं जानि भवानी' — पर्वतराज (जनक) ने हाथमें कुश लेकर तथा कन्याका हाथ पकड़कर उन्हें भवानी (शिवपत्नी) जानकर शिवजी (भव = रामजी) को समर्पण किया।
इसमें सुन्दर भाव है — जनक ने सीता-राम को शिव-पार्वती के समान जानकर कन्यादान किया। 'भव' = शिवजी (यहाँ रामजी), 'भवानी' = पार्वतीजी (यहाँ सीताजी)।
जब महेश्वर (रामजी) ने पाणिग्रहण किया तब सब देवता हर्षित हुए — 'पानिग्रहन जब कीन्ह महेसा। हियँ हरषे तब सकल सुरेसा। बेदमंत्र मुनिबर उच्चरहीं। जय जय जय संकर सुर करहीं।'
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