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पढ़िए: रामचरितमानस – बाल कांड (नवम संस्करण) जनकपुर में श्रीराम-सीता का प्रथम मिलन और पुष्पवाटिका प्रसंग!
जानिए कैसे श्रीराम और सीता का पहला मिलन हुआ, संक्षिप्त और सरल रूप में!
रामचरितमानस

रामचरितमानस – बाल कांड (नवम संस्करण) जनकपुर

📿 पौराणिक•6 मिनट पढ़ें
अंतिम अपडेट: 26 मार्च 2025
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रामचरितमानस का पाठ – बाल कांड (नवम संस्करण) ! जनकपुर में श्रीराम-सीता का प्रथम मिलन, पुष्पवाटिका प्रसंग, सरल और संक्षिप्त रूप में !

ज्ञान-सार

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बाल कांड – पोस्ट 9: जनकपुर में श्रीराम-सीता प्रथम मिलन

बाल कांड – पोस्ट 9: जनकपुर में श्रीराम-सीता प्रथम मिलन

प्रमुख घटनाक्रम: अहल्या उद्धार के बाद ऋषि विश्वामित्र राम-लक्ष्मण को लेकर मिथिला नगरी (जनकपुर) में प्रवेश करते हैं। वहाँ महाराज जनक द्वारा शिवजी के धनुष-भंग का स्वयंवर आयोजित था, जिसमें अनेकों राजा जुटे थे। राम-लक्ष्मण जनकपुर में विश्वामित्र के साथ अतिथि बनकर ठहरे।

उधर जानकी (सीता जी) ने पार्वतीजी का पूजन कर मन ही मन भगवान श्रीराम को पति रूप में पाने का वर माँगा।

एक दिन जानकी जब पुष्पवाटिका (राजउद्यान) में गयीं, तब पहली बार उनकी दृष्टि रामचंद्र पर पड़ी, और राम ने भी सीता को देखा – दोनों के हृदय में अनिर्वचनीय प्रेम उदित हुआ। यह राम-सीता का प्रथम मिलन (दृष्टि मिलन) था। इस पोस्ट में इन घटनाओं को रोमांचक और विस्तृत रूप में जानेंगे।

जनकपुर में राम का प्रवेश और जनक का प्रेम

जब विश्वामित्र जी राम-लक्ष्मण के साथ जनकपुर पहुंचे, तो राजा जनक ने अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने देखा कि दो तेजस्वी राजकुमार मुनि के साथ हैं। जनक को उन्हें देखते ही असीम स्नेह महसूस हुआ (हालाँकि पता नहीं था कि ये अयोध्या नरेश के पुत्र हैं)।

विश्वामित्र ने राम-लक्ष्मण को जनक के सुंदर उद्यान में घूमने की अनुमति दी। राम और लक्ष्मण सवेरे गुरु की आज्ञा लेकर फूल लेने उस राज बाग में गए।

उस बाग का बड़ा ही मनोरम वर्णन तुलसीदास जी करते हैं – तरह-तरह के पुष्पों और फलों से लदे वृक्ष, कोयल-पपीहे की मधुर बोली और सरोवर में खिले कमल। भगवान राम उस बाग की शोभा देखकर आनंदित हुए और मन ही मन उसका सौंदर्य सराहने लगे।

उधर जानकी का पार्वती पूजन और पुष्पवाटिका प्रसंग

उस समय माता सीता (जानकी) अपनी सखियों सहित उसी बाग में आई हुई थीं। माता सुनयना (जनक की पत्नी) ने सीता को गिरिजा (पार्वती) की पूजा के लिए भेजा था कि “जाकर मां पार्वती को प्रणाम करके अपने योग्य वर माँग लो।”

सीता ने वहाँ एक मंदिर में भगवती पार्वती का पूज न करके मन ही मन यह वर माँगा – “हे गौरी माँ! मुझे श्रीराम जैसे पति मिलें” (यहाँ श्रीराम का नाम उन्होंने नहीं लिया था, पर मन में चित्र वही था जो उन्होंने पूर्वजन्म में शिवजी के धनुष को उठाते बालक रूप में देखा था – एक किंवदंती अनुसार सीता ने बालपन में शिव धनुष हिला दिया था, तभी जनक ने प्रतिज्ञा की थी)।

उधर राम इस बात से अनभिज्ञ थे, वे बाग़ में फूल चुनने में तल्लीन थे।

सीता पूजा करके लौट रही थीं, सहसा उनकी एक सखी ने दूर से दो राजकुमारों को बाग में पुष्प चुनते देखा। वह उनकी छवि पर मोहित होकर दौड़ी हुई जानकी के पास गई और प्रेम से विह्वल होकर बोली – “हे सखी सीते! बाग में दो अतिसुंदर राजकुमार फूल तोड़ रहे हैं, ऐसा रूप तो मैंने कभी नहीं देखा!”

सखी का हाव-भाव देख सीता के हृदय में भी कौतूहल और लगाव जागा। उनकी सभी सखियाँ इस प्रस्ताव पर सहमत हो गईं कि चलकर राजकुमारों को देखा जाए।

एक सखी ने कहा – “सखी! मैंने सुना है विश्वामित्र मुनि दो राजकुमारों को साथ लाए हैं, संभवतः ये वहीं हैं।”

यह सुनते ही सीता के हृदय में एक अनोखी उत्कंठा जाग उठी, उनके नेत्र उन राजकुमारों के दर्शन हेतु व्याकुल हो उठे।

पार्वती पूजन से लौटकर सीता ने अपनी प्रिय सखी को आगे किया और स्वयं कुछ संकोच करती हुई उस ओर चलीं जहां राम-लक्ष्मण थे।

राम-सीता प्रथम दर्शन (नयन मिलाप)

इधर भगवान राम फूल चुन रहे थे, तभी उन्हें कंकण और पायल की मधुर ध्वनि कानों में सुनाई दी। राम ने हृदय में अनुमान किया और लक्ष्मण से मुस्कुराकर कहा – “भैया! यह मृदंग जैसी ध्वनि सुन रहे हो? ऐसा लगता है मानो कामदेव ने युद्ध का नगाड़ा बजा दिया हो”:

चौपाई:

कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि, कहत लखन सन रामु हृदयँ गुनि –
मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्ही, मनसा बिस्व बिजय कहँ कीन्ही॥

भावार्थ: कंकण, करधनी और पायल की ध्वनि सुनकर रामचंद्रजी ने मन में विचारकर लक्ष्मण से कहा – “(यह ध्वनि ऐसी प्रतीत हो रही है) मानो कामदेव ने विश्वविजय का संकल्प करके युद्ध-डंके पर चोट की हो (यानी कामदेव ने आह्वान किया हो)।”

ऐसा कहकर (और लक्ष्मण को मुस्कुराकर चुप रहने का संकेत देकर) श्री राम ने उधर दृष्टि फेरकर देखा। सामने जानकी सहित अनेक सखियाँ बाग में टहल रही थीं। राम की दृष्टि सीता जी पर पड़ी और सीता की नजर भी राम पर उठी – दोनों ने एक दूसरे को पलभर में ही अपने हृदय में बसा लिया।

चौपाई:

अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा, सिय मुख ससि भए नयन चकोरा।
भए बिलोचन चारु अचंचल, मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल॥

भावार्थ: ऐसा कहकर श्री रामजी ने फिर उस ओर देखा। श्री सीता जी के मुखरूपी चन्द्रमा को देखने के लिए उनके नेत्र चकोर पक्षी बन गए। सुंदर नेत्र स्थिर हो गए (टकटकी लग गई) – मानो जनक के पूर्वज निमि ने (पलक का निवास त्यागकर) संकोचवश पलकों को गिरना छोड़ दिया हो (इसलिए राम पलक झपकना भूलकर अपलक निहारने लगे)।

राम एकटक सीता को निहारने लगे। उधर सीता ने भी उन दो राजकुमारों में श्रीराम को पहचान लिया कि यही वह मनचाहा वर है जो उन्होंने अभी माँ गौरी से माँगा था। उनके मन में पार्वती के वरदान का स्मरण हो आया और एक पवित्र प्रेम का उदय हुआ। वे आश्चर्य और आनंद से भरकर चारों ओर ऐसे देखने लगीं जैसे डरी हुई हिरनी हो (संकोचवश)।

राम-सीता का यह प्रथम दर्शन संसार के सबसे सुंदर मिलनों में से एक है। दोनों एक-दूसरे की रुप-छटा पर मुग्ध हो गए। राम जी ने सीता की अप्रतिम शोभा देखी तो मन ही मन प्रशंसा करने लगे, पर मुख से कोई शब्द नहीं निकले:

चौपाई:

देखि सीय सोभा सुखु पावा, हृदयँ सराहत बचनु न आवा॥
जनु बिरंचि सब निज निपुनाई, बिरचि बिस्व कहँ प्रगटि देखाई॥

भावार्थ: सीता की शोभा देखकर श्रीरामजी ने बड़ा सुख पाया। वे हृदय में उसकी सराहना करते हैं, किन्तु मुख से वचन नहीं निकलते। वह शोभा ऐसी अनुपम है मानो ब्रह्मा ने अपनी सारी कारीगरी मूर्त रूप में रचकर संसार को दिखा दी हो।

उधर सीता जी भी राम के सौंदर्य पर न्योछावर हो रही थीं।

सखियाँ इस मनोभाव को समझ रही थीं, पर सबने सीता को आश्वस्त किया कि “सचमुच यह राजकुमार तुम्हारे योग्य हैं, लगता है देवताओं ने ही इन्हें यहाँ भेजा है”।

कुछ पल तक यही स्थिति रही – राम और सीता एक दूसरे को देखते रहे, समय मानो ठहर गया। फि र सीता जी सकुचाकर आगे बढ़ गईं और राम भी संयमित होकर फूल बटोरने का उपक्रम करने लगे।

इस अलौकिक मिलन के बाद राम-लक्ष्मण आश्रम लौट आए।

माँ सीता ने फिर से जाकर गिरिजा कुमारी की पूजा की बार-बार और राम जी को अपने वर के रूप में माँगा।

पढ़िए:रामचरितमानस का पाठ – बाल कांड (दशम संस्करण) ! जनक द्वारा स्वयंवर की घोषणा, राजाओं का विफल प्रयास, श्रीराम द्वारा शिवधनुष भंग और राम-सीता विवाह !

❓ इस विषय के 5 प्रश्न

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस का नामकरण 'मानस' क्यों किया गया?

शिवजी ने इस कथा को अपने मन (मानस) में रचकर रखा था, इसीलिये प्रसन्न होकर इसका नाम 'रामचरितमानस' रखा। 'मानस' के दो अर्थ — (1) मन (शिवजी का मन), (2) पवित्र सरोवर (रामचरित का मानसरोवर)।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस में 'मानस' शब्द का क्या अर्थ बताया गया है?

'मानस' के दो अर्थ हैं — (1) मन — शिवजी ने इस कथा को अपने मन में रचकर रखा था, (2) सरोवर — रामचरित का पवित्र मानसरोवर। शिवजी ने प्रसन्न होकर इसका नाम 'रामचरितमानस' रखा।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस किसने लिखी?

गोस्वामी तुलसीदासजी ने — 'रामचरितमानस कबि तुलसी।' संवत् 1631-1633 (1574-1576 ई.) में रचना। अयोध्या में शुरू, काशी में समर्पित। हिन्दी साहित्य के महानतम कवि।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस की रचना कहाँ शुरू हुई?

अयोध्या में — 'अवधपुरीं यह चरित प्रकासा।' कुछ भाग काशी में भी लिखा। अन्त में काशी में भगवान विश्वनाथ के समक्ष समर्पित।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस किस भाषा में लिखी गई?

अवधी भाषा में। तुलसीदासजी ने श्लोक 7 में कहा — 'भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति' अर्थात् रघुनाथजी की कथा को मनोहर भाषारचना में विस्तृत करता है। कथा है कि शिवजी ने स्वप्न में जनभाषा में लिखने का आदेश दिया।

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