विस्तृत उत्तर
कन्यादान हिन्दू विवाह संस्कार का एक प्रमुख अंग है जिसे महादानों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
शाब्दिक अर्थ
कन्यादान' = कन्या का दान। इसमें पिता (या अभिभावक) अपनी पुत्री को वर को सौंपता है। मूल रूप में इस संस्कार को 'पाणिग्रहण' कहा जाता था — अर्थात वर द्वारा कन्या का हाथ ग्रहण करना और कन्या द्वारा वर का हाथ ग्रहण करना।
कन्यादान का वास्तविक अर्थ
कन्यादान सामान्य 'दान' नहीं है। इसका तात्पर्य है कि पिता अपने उत्तरदायित्व को वर को हस्तांतरित करता है। कन्या कोई 'वस्तु' नहीं जो दान दी जाए — यह उत्तरदायित्व और सम्मान का हस्तांतरण है।
कन्यादान की विधि
- 1पिता (या निकटतम पुरुष अभिभावक) कन्या का दाहिना हाथ वर के दाहिने हाथ में देता है।
- 2जल और कुश सहित संकल्प लिया जाता है।
- 3पिता मंत्रोच्चार के साथ कन्या को वर को सौंपता है।
- 4वर प्रतिज्ञा करता है कि वह कन्या का धर्म, अर्थ और काम — तीनों में अतिक्रमण नहीं करेगा।
कन्यादान का महत्व
- ▸शास्त्रों में कन्यादान को सबसे बड़ा दान माना गया है।
- ▸इसका पुण्य भूमिदान, गोदान आदि से भी अधिक बताया गया है।
- ▸कन्यादान करने वाले पिता और कुल दोनों का उद्धार होता है — ऐसी मान्यता है।
आधुनिक दृष्टिकोण
कन्यादान की अवधारणा पर आधुनिक समाज में पुनर्विचार हो रहा है। मूल पाणिग्रहण संस्कार में दोनों पक्षों (वर और कन्या) का 'परस्पर' हाथ ग्रहण करना बताया गया है, जो समानता का प्रतीक है।
ध्यान दें: पिता के अभाव में भाई, चाचा, ताऊ या अन्य पुरुष अभिभावक कन्यादान कर सकता है। कुछ परम्पराओं में माता भी कन्यादान करती हैं।





