विस्तृत उत्तर
वैदिक विवाह और सामान्य (लौकिक) विवाह में कई महत्वपूर्ण अंतर हैं:
वैदिक विवाह की विशेषताएँ
- 1अग्नि साक्षी: वैदिक विवाह में अग्नि को प्रमुख साक्षी माना जाता है। अग्नि के समक्ष ही सभी प्रतिज्ञाएँ ली जाती हैं।
- 1सप्तपदी अनिवार्य: जिस विवाह में सप्तपदी (सात पद/फेरे) होती है, वही 'वैदिक विवाह' कहलाता है। बिना सप्तपदी के विवाह वैदिक नहीं माना जाता।
- 1मंत्रोच्चार: सम्पूर्ण विधि वैदिक मंत्रों के साथ होती है — संकल्प, हवन, अग्नि परिक्रमा, सप्तपदी सभी मंत्रयुक्त।
- 1संस्कार दृष्टि: वैदिक विवाह एक 'संस्कार' है — यह जन्म-जन्मांतर का बंधन है, केवल सामाजिक अनुबंध नहीं।
- 1ध्रुव दर्शन: विवाह के अंत में ध्रुव तारा और अरुन्धती का दर्शन कराया जाता है — अटल प्रेम और पतिव्रत का प्रतीक।
- 1होम-हवन: लाजा होम (भुने चावल से हवन), अग्नि परिक्रमा, प्रायश्चित्त होम आदि अनिवार्य हैं।
सामान्य (लौकिक) विवाह
- 1सामाजिक अनुबंध: अन्य धर्मों/पद्धतियों में विवाह प्रायः एक सामाजिक या कानूनी करार है जिसे विशेष परिस्थितियों में तोड़ा जा सकता है।
- 1अग्नि साक्षी नहीं: सामान्य विवाह में अग्नि, मंत्र, सप्तपदी का विधान नहीं होता।
- 1सांसारिक दृष्टि: केवल इस जन्म तक का बंधन माना जाता है।
मनुस्मृति में आठ प्रकार के विवाह
ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य (ये चार श्रेष्ठ); आसुर, गान्धर्व, राक्षस, पैशाच (ये चार निम्न)। 'ब्राह्म विवाह' सर्वश्रेष्ठ माना गया है जिसमें सम्पूर्ण वैदिक विधि का पालन होता है।
विशेष: वर्तमान में हिन्दू विवाह अधिनियम (1955) के अंतर्गत सप्तपदी सहित वैदिक विवाह को कानूनी मान्यता प्राप्त है।





