विस्तृत उत्तर
उपनयन संस्कार षोडश संस्कारों में अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार है। 'उपनयन' का अर्थ है 'गुरु के निकट ले जाना'। इस संस्कार से बालक 'द्विज' (दो बार जन्म लेने वाला) कहलाता है — पहला जन्म माता से, दूसरा गुरु से।
आयु विधान
मनुस्मृति के अनुसार — ब्राह्मण बालक का 8वें वर्ष, क्षत्रिय का 11वें वर्ष और वैश्य का 12वें वर्ष में उपनयन होना चाहिए।
संस्कार की प्रमुख विधि
- 1पूर्व तैयारी: शुभ मुहूर्त निर्धारण (उत्तरायण सूर्य, शुभ नक्षत्र)। संस्कार से एक दिन पूर्व बालक को केवल दूध पीना चाहिए। पिता या उपनयनकर्ता गायत्री मंत्र का 12 सहस्र जाप का संकल्प लेता है।
- 1मुंडन: परम्परानुसार बालक का मुंडन कराया जाता है, जो शृंगारिकता के प्रति उदासीनता का प्रतीक है।
- 1गृहयज्ञ: गणपति, सरस्वती, लक्ष्मी आदि का आह्वान और स्तुति के साथ हवन किया जाता है।
- 1यज्ञोपवीत धारण: तीन सूत्रों का जनेऊ (यज्ञोपवीत) बालक को धारण कराया जाता है। तीन लड़ें गायत्री मंत्र के तीन चरणों (त्रिपदा) का प्रतीक हैं। प्रत्येक लड़ में तीन धागे होते हैं। तीन गाँठें भूः, भुवः, स्वः व्याहृतियों का प्रतीक हैं।
- 1गायत्री उपदेश: आचार्य बालक को गायत्री मंत्र की दीक्षा देते हैं। यह संस्कार का सबसे महत्वपूर्ण अंग है।
- 1मेखला और दण्ड धारण: बालक को मौंजी (मेखला) बाँधी जाती है और दण्ड (डण्डा) दिया जाता है। दण्ड ज्ञान के कठिन मार्ग पर चलने का प्रतीक है।
- 1भिक्षा चर्या: बालक परिजनों से भिक्षा माँगता है, जो विनम्रता और अहंकार नाश का प्रतीक है।
यज्ञोपवीत मंत्र: 'यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।'
विशेष: ब्रह्मचारी तीन सूत्र और गृहस्थ छह सूत्र का जनेऊ धारण करता है। समावर्तन संस्कार तक मौंजी-मेखला का परित्याग होता है, किन्तु यज्ञोपवीत आजीवन बना रहता है।
ध्यान दें: विभिन्न गृह्यसूत्रों (आश्वलायन, आपस्तम्ब, हिरण्यकेशि, गोभिल) में उपनयन विधि के कुछ भेद-विभेद मिलते हैं। क्षेत्र और शाखा के अनुसार विधि में अंतर हो सकता है।





