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वैदिक संस्कार📜 धर्मसिंधु, स्मृति ग्रंथ, कर्मकांड प्रदीप2 मिनट पठन

जनेऊ बदलने का क्या नियम है?

संक्षिप्त उत्तर

जनेऊ बदलें: प्रतिवर्ष श्रावण पूर्णिमा (श्रावणी/उपाकर्म) पर। टूटने-गंदा होने पर तुरंत। सूतक-अशौच समाप्ति पर। श्मशान से लौटने पर। विधि: पहले नया धारण (मंत्र सहित) → फिर पुराना उतारें → नदी/पीपल पर विसर्जन।

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विस्तृत उत्तर

जनेऊ (यज्ञोपवीत) बदलने के प्रमुख नियम इस प्रकार हैं:

1नियमित बदलाव — श्रावणी पर्व

प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा (रक्षाबंधन) को 'श्रावणी' या 'उपाकर्म' पर्व पर जनेऊ बदलने का मुख्य विधान है। इस दिन पुराना जनेऊ उतारकर नया जनेऊ धारण किया जाता है।

2जीर्ण-शीर्ण होने पर

यदि जनेऊ टूट जाए, गंदा हो जाए, या इसके धागे उलझ जाएं तो तुरंत नया जनेऊ धारण करना चाहिए। जीर्ण जनेऊ रखना अशुभ माना गया है।

3सूतक (अशौच) के बाद

परिवार में जन्म (सूतक) या मृत्यु (मृतक अशौच) होने पर अशौच काल समाप्ति पर स्नान करके नया जनेऊ धारण करना चाहिए।

4अशुद्धि की स्थिति में

यदि भूलवश जनेऊ शरीर से उतर जाए, या किसी अशुद्ध वस्तु का स्पर्श हो जाए, तो प्रायश्चित स्वरूप गायत्री मंत्र की एक माला (108 जाप) करके नया जनेऊ धारण करना चाहिए।

5श्मशान यात्रा के बाद

शवयात्रा या श्मशान से लौटने पर स्नान करके जनेऊ बदलने का विधान है।

6बदलने की विधि

पहले नया जनेऊ 'यज्ञोपवीतं परमं पवित्रम्...' मंत्र का उच्चारण करते हुए धारण करें, फिर पुराना जनेऊ 'एतावद्दिनपर्यन्तं ब्रह्मत्वं धारितं मया...' मंत्र बोलकर उतारें। पहले नया पहनें, फिर पुराना उतारें — यह क्रम महत्वपूर्ण है।

7पुराने जनेऊ का विसर्जन

पुराना जनेऊ पवित्र नदी, जलस्रोत में प्रवाहित करें या पीपल के वृक्ष पर रखें। अपवित्र स्थान पर न फेंकें।

स्त्रियों का नियम: कुछ परम्पराओं में स्त्रियों को मासिक शौच के बाद जनेऊ बदलने का विधान मिलता है, किन्तु सामान्यतः स्त्रियों का पृथक उपनयन नहीं होता।

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शास्त्रीय स्रोत
धर्मसिंधु, स्मृति ग्रंथ, कर्मकांड प्रदीप
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