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वैदिक संस्कार📜 गरुड़ पुराण, कर्मकांड भास्कर, आदित्यपुराण, धर्मसिंधु2 मिनट पठन

दाह संस्कार की विधि क्या है?

संक्षिप्त उत्तर

दाह विधि: चिता निर्माण → शव स्थापन (उत्तर-शिर) → पिण्डदान → छिद्र-घट जल-परिक्रमा (3 बार) → घड़ा फोड़ें → मुखाग्नि (स्वयं प्रज्वलित) → कपाल क्रिया → अस्थि संचय (3रा दिन) → गंगा विसर्जन। पूर्ण दाह निषिद्ध। 13 दिन कर्ता का तप।

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विस्तृत उत्तर

दाह संस्कार अंत्येष्टि का मुख्य प्रकार है जिसमें मृत शरीर को अग्नि में समर्पित किया जाता है।

दाह संस्कार की विस्तृत विधि

1चिता निर्माण

  • श्मशान में शुद्ध स्थान चुनें।
  • भूमि पर पवित्र जल छिड़कें, गोबर से लीपें।
  • चिता वेदी — साढ़े 4 हाथ लम्बी, साढ़े 3 हाथ चौड़ी।
  • लकड़ियाँ (चन्दन, आम, पीपल आदि शुभ वृक्षों की) व्यवस्थित रखें।

2शव स्थापन

  • शव को चिता पर उत्तर दिशा में सिर करके रखें।
  • नग्न शव का दाह निषिद्ध है — वस्त्र अवश्य दें।
  • घी, कपूर, चन्दन, अगर-तगर, कर्पूर आदि सुगंधित पदार्थ रखें।

3पिण्डदान

  • चिता पर शव रखने के बाद पिण्डदान दें। कुल पाँच पिण्ड विभिन्न स्थानों पर दिए जाते हैं।

4परिक्रमा (छिद्र-घट विधि)

  • मुखाग्नि देने वाला छेद वाले मिट्टी के घड़े में जल लेकर चिता की तीन अपसव्य (वामावर्त) परिक्रमा करे।
  • घड़े से जल टपकता रहे।
  • तीन परिक्रमा पूर्ण होने पर बिना पीछे देखे घड़ा पीछे की ओर गिराकर फोड़ दें।

5मुखाग्नि

  • ज्येष्ठ पुत्र (या कर्ता) मुख की ओर से अग्नि प्रज्वलित करे।
  • अग्नि स्वयं प्रज्वलित करनी चाहिए (चाण्डालाग्नि निषिद्ध)।
  • मंत्रोच्चार के साथ अग्नि दें।

6कपाल क्रिया

  • जब चिता पूर्ण प्रज्वलित हो जाए और खोपड़ी (कपाल) न फटे तो बाँस या लकड़ी से कपाल फोड़ा जाता है। इसे 'कपाल क्रिया' कहते हैं।

7दाह के बाद

  • पूर्ण दाह निषिद्ध है — कुछ अवशेष रहना चाहिए (आदित्यपुराण)।
  • अस्थि संचय तीसरे दिन (कुछ परम्पराओं में चौथे दिन)।
  • अस्थि विसर्जन पवित्र नदी (गंगा) में।

अग्नि का नियम

दाह अग्नि घर से ले जाने का विधान है (स्मार्त परम्परा)। किसी अन्य से अग्नि लेना (चाण्डालाग्नि) शास्त्रानुमोदित नहीं है।

विशेष: मुखाग्नि देने वाले को 13 दिनों तक विशेष नियमों का कठोर पालन करना होता है — एक समय भोजन, भूमि शयन, ब्रह्मचर्य आदि।

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शास्त्रीय स्रोत
गरुड़ पुराण, कर्मकांड भास्कर, आदित्यपुराण, धर्मसिंधु
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