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वैदिक संस्कार📜 कात्यायनस्मृति, मनुस्मृति, धर्मसिंधु, कर्मकांड प्रदीप2 मिनट पठन

जनेऊ धारण करने के नियम क्या हैं?

संक्षिप्त उत्तर

जनेऊ नियम: बाएँ कंधे-दाहिनी बगल (सव्य), पितृकर्म में अपसव्य। ब्रह्मचारी 3 सूत्र, गृहस्थ 6 सूत्र। शरीर से न उतारें, धोकर साफ करें। शौच में दाहिने कान पर लपेटें। चाबी न बाँधें। टूटा-जीर्ण तुरंत बदलें। प्रतिदिन गायत्री जप अनिवार्य।

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विस्तृत उत्तर

जनेऊ (यज्ञोपवीत) धारण करने के शास्त्रोक्त नियम इस प्रकार हैं:

1धारण की स्थिति

जनेऊ बाएँ कंधे के ऊपर और दाहिनी बगल के नीचे (उपवीती/सव्य) धारण किया जाता है। यही सामान्य स्थिति है जिसे 'सव्य' कहते हैं।

2अपसव्य (प्राचीनावीती)

जब दाहिने कंधे से बाएँ हाथ के नीचे जनेऊ किया जाता है, इसे 'प्राचीनावीती' या 'अपसव्य' कहते हैं। सम्पूर्ण पितृकर्म — श्राद्ध, तर्पण आदि — अपसव्य होकर ही करने का विधान है।

3सूत्र संख्या

ब्रह्मचारी — 3 सूत्र (एक जनेऊ)। गृहस्थ (विवाह उपरान्त) — 6 सूत्र (दो जनेऊ)। कुछ परम्पराओं में माता-पिता के जीवित होने पर 6 और दोनों के न रहने पर 9 सूत्र का विधान भी मिलता है।

4शारीरिक शुद्धता

जनेऊ शरीर से बाहर नहीं निकालना चाहिए। साफ करने के लिए पहने रहकर ही घुमाकर धो लेना चाहिए। भूल से उतर जाए तो प्रायश्चित की एक माला जप करके बदल लेने का नियम है।

5शौच नियम

मल-मूत्र त्याग करते समय जनेऊ को दाहिने कान पर लपेटकर रखना चाहिए। कान पर लपेटने का वैज्ञानिक और शास्त्रीय दोनों कारण बताए गए हैं।

6अपवित्रता से बचाव

जनेऊ में चाबी आदि नहीं बाँधनी चाहिए — यह देव प्रतिमा की मर्यादा है। जनेऊ को गंदा, टूटा या जीर्ण नहीं रखना चाहिए।

7मृतक सूतक

सूतक (जन्म या मृत्यु अशौच) समाप्ति पर जनेऊ बदलना आवश्यक है।

8गायत्री जप

जनेऊ धारण करने वाले को प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जप और संध्या वंदन करना अनिवार्य माना गया है।

विशेष: कात्यायनस्मृति में कहा गया है कि यदि अज्ञानतावश अधिक उम्र तक यज्ञोपवीत नहीं हुआ हो, तो प्रायश्चित (व्रात्यस्तोम) करके उपनयन किया जा सकता है।

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शास्त्रीय स्रोत
कात्यायनस्मृति, मनुस्मृति, धर्मसिंधु, कर्मकांड प्रदीप
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