विस्तृत उत्तर
दक्षिणा देना पूजा और यज्ञ का एक अनिवार्य अंग है। 'दक्षिणा' केवल पंडित की फीस नहीं है — शास्त्रों में इसका गहरा अर्थ बताया गया है।
शास्त्रीय कारण — 'दक्षिणा' एक देवी का नाम है जो यज्ञ की पत्नी मानी जाती हैं। चूँकि पत्नी अर्धांगिनी होती है, इसलिए बिना दक्षिणा के कोई भी यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकता। भगवद्गीता में भी कहा गया है — वह यज्ञ तामसिक होता है जो शास्त्र-विरुद्ध और दक्षिणा के बिना किया जाए।
दूसरा अर्थ — दक्षिणा भक्त के हृदय में व्याप्त लोभ और संग्रह-वृत्ति को त्यागने का प्रतीक है। जब हम कुछ दान करते हैं तो वह हमारे भीतर की कंजूसी को कम करता है और आत्मशुद्धि होती है।
कितनी दें — शास्त्रों में दक्षिणा के लिए कोई निश्चित न्यूनतम राशि निर्धारित नहीं की गई है। यह भाव और श्रद्धा का मामला है। पंडित की पारिश्रमिक से अधिक देना दक्षिणा की भावना है। यदि धन का अभाव हो तो गंगाजल, पुष्प, या फल अर्पित करके भी दक्षिणा दी जा सकती है — भाव सबसे बड़ा है।
देवता को भी दक्षिणा अर्पित की जाती है जो भगवान को दी गई अपनी समस्त उपलब्धियों के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है।





