विस्तृत उत्तर
षोडशोपचार पूजा में जल अर्पण के कई अलग-अलग रूप हैं जिनके अलग-अलग उद्देश्य और मंत्र हैं:
पाद्य — पैर धोने के लिए जल। देवता के आगमन पर सर्वप्रथम उनके चरणों को जल से धोने की परंपरा है। 'पाद्यं समर्पयामि' बोलते हुए अर्पित करते हैं।
अर्घ्य — हाथ धोने के लिए सम्मानजनक जल। यह अतिथि सत्कार की परंपरा से आया है जिसमें अतिथि के हाथ-पैर धोने का जल दिया जाता था। 'अर्घ्यं समर्पयामि' बोलकर अर्पित करते हैं।
आचमन — कुल्ले के लिए जल, जो मुख की शुद्धि के लिए दिया जाता है। 'आचमनं समर्पयामि' कहते हैं।
स्नान — यह वास्तविक स्नान है जो पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शर्करा) से या शुद्ध जल से कराया जाता है। 'स्नानं समर्पयामि' या 'अभिषेक' करते हैं।
नैवेद्य मध्य जल — भोजन के मध्य में पीने के लिए जल। 'नैवेद्य मध्ये आचमनीयं जलं समर्पयामि' बोलते हैं।
तर्पण — तर्पण जल का अर्पण जो पूर्वजों और देवताओं की तृप्ति के लिए दिया जाता है।
संक्षेप में — पाद्य (पैर धोना), अर्घ्य (हाथ धोना), आचमन (कुल्ला), स्नान (स्नान) और नैवेद्यान्तर (भोजन के बाद जल) — ये पाँच प्रकार के जल-अर्पण षोडशोपचार पूजा के अनिवार्य अंग हैं।





