विस्तृत उत्तर
मंदिर में दीपदान हिन्दू धर्म में सर्वाधिक सरल और प्रभावशाली दान माना गया है। अग्निपुराण और पद्मपुराण में इसकी विशेष महिमा वर्णित है।
शास्त्रीय महत्व
1अग्निपुराण
अग्निदेव ने महर्षि वशिष्ठ से कहा — 'दीपदान व्रत, योग और मोक्ष प्रदान करने वाला है। जो मनुष्य देव मंदिर अथवा ब्राह्मण के घर में दीपदान करता है, वह सब कुछ प्राप्त कर सकता है।'
2पद्मपुराण
महादेव ने कार्तिकेय को बताया कि दीपावली और कार्तिक मास में दीपदान का विशेष महत्व है। मंदिरों और नदी किनारे दीपदान करने से लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।
3'दीपं ज्योतिः परब्रह्म' — दीपक का प्रकाश परब्रह्म का प्रतीक
दीपक = अग्नि तत्व = ज्ञान = अंधकार (अज्ञान) का नाश। 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' का साक्षात् रूप।
दीपदान के फल (शास्त्रोक्त)
- ▸दीर्घायु प्राप्ति
- ▸नेत्र ज्योति की रक्षा और वृद्धि
- ▸धन-पुत्र-सौभाग्य की प्राप्ति
- ▸अकाल मृत्यु से रक्षा (धनतेरस पर यमराज हेतु दीपदान)
- ▸पूजा में हुई अशुद्धि क्षमा
- ▸घी+तिल तेल दोनों का दीपक = अश्वमेध यज्ञ समान पुण्य (शास्त्रोक्त)
- ▸पितरों को उत्तम गति (आकाशदीप)
दीपदान की विधि
- 1मिट्टी/ताँबा/पीतल/चाँदी का दीपक लें (मिट्टी सर्वसुलभ)
- 2शुद्ध गो-घृत (घी) या तिल तेल भरें
- 3रुई/कपास की बत्ती बनाएँ
- 4मंदिर में देवता के सामने या दीपस्तंभ पर जलाएँ
- 5संकल्प मंत्र: 'ॐ दीपं ज्योतिः परब्रह्म दीपं सर्वतमोपहम्। दीपेन साध्यते सर्वं सन्ध्यादीपं नमोऽस्तुते।।'
- 6'ॐ नमो नारायणाय' या 'ॐ नमः शिवाय' जप करें
कहाँ-कहाँ दीपदान
- ▸मंदिर में देवता के सामने (सर्वश्रेष्ठ)
- ▸पीपल/बरगद वृक्ष के नीचे
- ▸नदी/सरोवर में (पत्ते पर)
- ▸तुलसी चौरा पर
- ▸घर की चौखट पर (संध्या काल)
विशेष शुभ समय
- ▸कार्तिक मास (दीपावली सहित) — सर्वाधिक
- ▸श्रावण मास — शिव कृपा
- ▸चैत्र मास — देवी मंदिर में
- ▸प्रत्येक अमावस्या/पूर्णिमा
- ▸धनतेरस (यम दीपदान — अकाल मृत्यु निवारण)
- ▸नरक चतुर्दशी
विशेष
जो व्यक्ति नियमित पूजा नहीं कर सकता, वह केवल दीपक जलाकर भी पूजा कर सकता है — दीपक ही सम्पूर्ण पूजा है।





