विस्तृत उत्तर
अन्नदान को हिन्दू शास्त्रों में सर्वोत्तम दान माना गया है। 'अन्नदानं परं दानम्' — अन्नदान सभी दानों में श्रेष्ठ है।
शास्त्रीय आधार
1तैत्तिरीय उपनिषद
अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्' — अन्न ही ब्रह्म है। 'अन्नं न निन्द्यात्, अन्नं न परिचक्षीत' — अन्न की निन्दा न करें, अन्न को त्यागें नहीं।
2महाभारत (अनुशासन पर्व)
भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा — 'अन्नदानं परं दानं विद्यादानमतः परम्।' अन्नदान सर्वश्रेष्ठ और उसके ऊपर केवल विद्यादान।
3विष्णुपुराण
अन्नदाता सुखी भव' — अन्न देने वाला सदा सुखी रहे। अन्नदान = प्राणदान, क्योंकि अन्न से प्राण धारण होते हैं।
मंदिर में अन्नदान विधान
4संकल्प
अन्नदान से पूर्व संकल्प करें — नाम, गोत्र, और उद्देश्य बोलकर। 'मैं भगवान की प्रसन्नता और सभी प्राणियों की तृप्ति के लिए यह अन्नदान करता/करती हूँ।'
5सामग्री
- ▸शुद्ध सात्विक भोजन (प्याज-लहसुन-मांस रहित)
- ▸चावल, दाल, रोटी, सब्जी, मिठाई, फल
- ▸अनाज (कच्चा) — गेहूँ, चावल, दाल का दान भी उत्तम
6किसे दान करें
- ▸भूखे और निर्धन को (सर्वश्रेष्ठ)
- ▸ब्राह्मण/पुरोहित को
- ▸मंदिर की रसोई/भंडारा में
- ▸अन्नक्षेत्र (Free Kitchen) चलाने वाली संस्थाओं को
7कब करें
- ▸प्रतिदिन (सर्वोत्तम — 'अतिथि देवो भव')
- ▸एकादशी, अमावस्या, पूर्णिमा — विशेष
- ▸श्राद्ध पक्ष — पितर तृप्ति
- ▸त्योहारों पर भंडारा
- ▸ग्रहण काल के बाद
8नियम
- ▸अन्नदान श्रद्धा और सम्मान से करें — दया या अहंकार से नहीं
- ▸भोजन स्वच्छ और ताज़ा हो — बासी/सड़ा नहीं
- ▸खाने वाले का अपमान न करें
- ▸'इदं न मम' (यह मेरा नहीं) भाव से — समर्पण
अन्नदान का फल
- ▸इस लोक में सुख-समृद्धि
- ▸परलोक में उत्तम गति
- ▸पितरों की तृप्ति (श्राद्ध में)
- ▸सभी पापों का नाश
- ▸जो अन्नदान नहीं करता वह 'चोर' के समान (गीता 3.12)
विशेष
मंदिर के भंडारे/लंगर में सेवा करना भी अन्नदान का ही रूप है — केवल धन ही नहीं, श्रम-दान भी अन्नदान है।





