विस्तृत उत्तर
मंदिर में चढ़ाए गए प्रसाद को घर लाना न केवल शास्त्रसम्मत है, बल्कि अत्यन्त शुभ और पुण्यदायक माना गया है।
शास्त्रीय विधान
1प्रसाद = भगवान की कृपा
विष्णुपुराण: प्रसाद का शाब्दिक अर्थ है 'प्रसन्नता' — यह भगवान की प्रसन्नता का प्रतीक है। देवता को अर्पित भोग जब भक्तों में वितरित होता है, तो वह 'प्रसाद' बन जाता है।
2प्रसाद घर लाना — शुभ
- ▸प्रसाद घर लाकर परिवार के सदस्यों में बाँटना चाहिए
- ▸जो लोग मंदिर नहीं जा पाते — बीमार, वृद्ध, बच्चे — उन्हें प्रसाद देना विशेष पुण्य
- ▸प्रसाद न बाँटना या फेंकना = दोष
3प्रसाद ग्रहण के नियम
- ▸दाहिने हाथ से ग्रहण करें
- ▸श्रद्धा और सम्मान से खाएं — जूठा न छोड़ें
- ▸प्रसाद भूमि पर न गिराएं
- ▸चरणामृत (तीर्थ) तीन बार ग्रहण करें और शेष सिर पर लगाएं
4किस प्रसाद को कब ग्रहण करें
- ▸सूखा प्रसाद (मिठाई, बताशे, पंजीरी) — घर ला सकते हैं, कई दिन तक रख सकते हैं
- ▸फल प्रसाद — घर लाकर परिवार में बाँटें
- ▸चरणामृत/पंचामृत — तत्काल ग्रहण करें (लम्बे समय तक रखना उचित नहीं)
- ▸भोग प्रसाद (पके हुए भोजन) — शीघ्र ग्रहण करें, बासी न खाएं
5प्रसाद का सम्मान
- ▸प्रसाद को पैरों से न छुएं
- ▸अपवित्र स्थान पर न रखें
- ▸प्रसाद को खराब होने पर वृक्ष की जड़ में या जल में विसर्जित करें — कूड़ेदान में न फेंकें
6विशेष मान्यता
- ▸तीर्थ स्थानों (तिरुपति, जगन्नाथ, वैष्णो देवी) का प्रसाद घर लाना अत्यन्त शुभ
- ▸यह प्रसाद दूर बैठे परिजनों तक पहुँचाना = उन्हें भी तीर्थ का पुण्य लाभ
निषेध
- ▸मंदिर का प्रसाद बेचना पाप है
- ▸प्रसाद को अनादर से व्यवहार करना अशुभ
- ▸प्रसाद लेकर भूल जाना या सड़ने देना उचित नहीं





