विस्तृत उत्तर
मंदिर में दान देना हिन्दू धर्म में अत्यन्त पुण्यदायक कर्म है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने दान के तीन प्रकार बताए हैं — सात्विक, राजसिक, और तामसिक।
दान का शास्त्रीय विधान
1सात्विक दान (सर्वश्रेष्ठ — गीता 17.20)
देशकालं च पात्रे च तद्दानं सात्विकं स्मृतम्।
— सही देश (स्थान), सही काल (समय), सही पात्र (योग्य व्यक्ति) को बिना किसी प्रत्युपकार की आशा से दिया गया दान = सात्विक।
2मंदिर में दान के प्रकार
- ▸अन्न दान: मंदिर की रसोई/भंडारे के लिए — सर्वश्रेष्ठ ('अन्नदानं परं दानम्')
- ▸धन दान: दान पेटी (हुंडी) में — मंदिर संचालन, गरीबों की सेवा
- ▸वस्त्र दान: देवता को वस्त्र अर्पित करना या गरीबों को
- ▸गो-दान: गाय दान — सर्वोच्च दान (ब्राह्मण/गौशाला को)
- ▸स्वर्ण/रजत दान: देवता को — उत्तम
- ▸तेल/घी दान: दीपक के लिए — प्रकाश दान
- ▸पुष्प/फल दान: पूजा सामग्री
3दान देने के नियम
- ▸श्रद्धा: बिना श्रद्धा का दान = व्यर्थ (गीता)
- ▸गोपनीय: दान का प्रचार न करें — 'दाहिना हाथ दे, बाएँ को पता न चले'
- ▸प्रत्युपकार रहित: बदले में कुछ न चाहें
- ▸अपमानरहित: दान लेने वाले का अपमान न करें
- ▸सामर्थ्य अनुसार: अपनी क्षमता के अनुसार — अत्यधिक न दें, न बहुत कम
- ▸दक्षिण हाथ से: दान सदा दाहिने हाथ से दें
4विशेष शुभ समय
- ▸एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या
- ▸संक्रांति (मकर संक्रांति विशेष)
- ▸ग्रहण काल
- ▸सोमवती अमावस्या
- ▸श्राद्ध पक्ष
- ▸नवरात्रि, दीपावली, शिवरात्रि
5दान का फल (शास्त्रीय)
- ▸अन्न दान = पुण्य + स्वर्ग
- ▸विद्या दान = सर्वोत्तम ('विद्यादानं सर्वदानेषु श्रेष्ठम्')
- ▸गो-दान = पितृ तृप्ति
- ▸धन दान = लक्ष्मी कृपा
चेतावनी
- ▸दान किसी दबाव या भय से न दें (ठग तांत्रिकों से सावधान)
- ▸मंदिर की दान पेटी/हुंडी में ही दें — अनधिकृत व्यक्ति को नहीं
- ▸दान रसीद/प्रमाण लें (बड़ी राशि का)
- ▸तामसिक दान (अपमानपूर्वक, अयोग्य पात्र को) — गीता में निंदित





