विस्तृत उत्तर
दक्षिणा = पूजा/अनुष्ठान करवाने वाले पुरोहित/पुजारी को दी जाने वाली श्रद्धा-राशि। यह दान से भिन्न है — यह सेवा का प्रतिफल और श्रद्धा का प्रतीक है।
शास्त्रीय विधान
1दक्षिणा का सिद्धांत
गृह्य सूत्र: 'दक्षिणा बिना यज्ञ/पूजा अपूर्ण।' — दक्षिणा पूजा का अभिन्न अंग है, अतिरिक्त भार नहीं। दक्षिणा देने से पूजा का फल बहुगुणित होता है।
2कितनी दक्षिणा
शास्त्र में निश्चित राशि नहीं बताई — 'श्रद्धानुसार और सामर्थ्यानुसार' का नियम है।
व्यावहारिक मार्गदर्शन
- ▸सामान्य दर्शन/आरती: ₹11, ₹21, ₹51 — सामान्य श्रद्धा
- ▸विशेष पूजा/अभिषेक: ₹101, ₹251, ₹501 — पूजा के प्रकार अनुसार
- ▸विस्तृत अनुष्ठान (हवन, सत्यनारायण): ₹1,001 - ₹5,001 — पुरोहित के समय और श्रम अनुसार
- ▸बड़े अनुष्ठान (रुद्राभिषेक, नवग्रह): पुरोहित/मंदिर से पूर्व चर्चा कर तय करें
3दक्षिणा देने के नियम
- ▸सदा विषम संख्या में (1, 11, 21, 51, 101 आदि) — सम संख्या अशुभ
- ▸दाहिने हाथ से दें
- ▸दोनों हाथों से पूजा थाली/दक्षिणा पात्र में रखें (सबसे शुभ)
- ▸पुजारी को सीधे हाथ में दें — भूमि पर न रखें
- ▸श्रद्धा और सम्मान भाव से — अपमानपूर्वक नहीं
- ▸सिक्के (विशेषतः ₹1 का) — सामान्यतः शुभ, परंतु केवल सिक्का देना अपर्याप्त
4दक्षिणा + वस्त्र
परम्परा: दक्षिणा के साथ फल, मिठाई, या वस्त्र (धोती/शाल) भी देना अत्यन्त शुभ। बड़े अनुष्ठानों में यह प्रथा अनिवार्य।
5महत्वपूर्ण
- ▸दक्षिणा = पुजारी का अधिकार — उसे देना कर्तव्य
- ▸परंतु पुजारी बलपूर्वक या अत्यधिक माँग करे — उचित नहीं
- ▸यदि आर्थिक स्थिति कमजोर हो — यथासम्भव (एक रुपया भी श्रद्धा से दिया = श्रेष्ठ)
- ▸मन्तव्य: 'भगवान भाव देखते हैं, राशि नहीं'





