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सृष्टि विज्ञान📜 ऋग्वेद 10/129 (नासदीय सूक्त), 10/90 (पुरुषसूक्त), 10/121 (हिरण्यगर्भ सूक्त), अथर्ववेद 10/72 मिनट पठन

वेदों में ब्रह्मांड की उत्पत्ति कैसे बताई गई है?

संक्षिप्त उत्तर

वेदों में सृष्टि के तीन दृष्टिकोण हैं — नासदीय सूक्त (10/129) दार्शनिक रहस्य-वर्णन, हिरण्यगर्भ सूक्त (10/121) ईश्वर-केन्द्रित सृष्टि और पुरुषसूक्त (10/90) यज्ञात्मक सृष्टि। सबका सार — सृष्टि एक ही परम तत्त्व 'तदेकम्' से प्रकट हुई।

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विस्तृत उत्तर

## वेदों में ब्रह्मांड की उत्पत्ति

वेदों में सृष्टि-वर्णन के तीन महासूक्त

### 1. नासदीय सूक्त (ऋग्वेद 10/129) — दार्शनिक दृष्टि

नासदासीन्नो सदासीत्तदानीम्।' — उस समय न सत् था, न असत्; न आकाश था। यह विश्व की सबसे प्राचीन सृष्टि-जिज्ञासा है। आदि में अव्यक्त, अंधकारमय अवस्था थी। 'तपसस्तन्महिनाजायतैकम्' — तप से 'तदेकम्' (वह एक) प्रकट हुआ। 'काम' (इच्छाशक्ति) सृष्टि का प्रथम बीज था। अंत में ऋषि कहते हैं — 'शायद वह स्वयं भी नहीं जानता' — ब्रह्मांड-रहस्य की ईमानदार स्वीकृति।

### 2. हिरण्यगर्भ सूक्त (10/121) — ईश्वरवादी दृष्टि

हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे।' — आदि में हिरण्यगर्भ (स्वर्णिम गर्भ/ब्रह्म) था — भूत-भविष्य का स्वामी, एकमात्र जीवनदायी देव।

### 3. पुरुषसूक्त (10/90) — यज्ञात्मक दृष्टि

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।' — पुरुष (ब्रह्म) समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त है। देवताओं ने उस पुरुष का यज्ञ करके सूर्य, चंद्र, इंद्र, पृथ्वी और समस्त सृष्टि की रचना की।

वैज्ञानिक साम्य: नासदीय सूक्त की अवधारणा आधुनिक 'बिग बैंग' सिद्धांत से놀랍게 मिलती-जुलती है।

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शास्त्रीय स्रोत
ऋग्वेद 10/129 (नासदीय सूक्त), 10/90 (पुरुषसूक्त), 10/121 (हिरण्यगर्भ सूक्त), अथर्ववेद 10/7
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