विस्तृत उत्तर
## वेदों में ब्रह्मांड की उत्पत्ति
वेदों में सृष्टि-वर्णन के तीन महासूक्त
### 1. नासदीय सूक्त (ऋग्वेद 10/129) — दार्शनिक दृष्टि
नासदासीन्नो सदासीत्तदानीम्।' — उस समय न सत् था, न असत्; न आकाश था। यह विश्व की सबसे प्राचीन सृष्टि-जिज्ञासा है। आदि में अव्यक्त, अंधकारमय अवस्था थी। 'तपसस्तन्महिनाजायतैकम्' — तप से 'तदेकम्' (वह एक) प्रकट हुआ। 'काम' (इच्छाशक्ति) सृष्टि का प्रथम बीज था। अंत में ऋषि कहते हैं — 'शायद वह स्वयं भी नहीं जानता' — ब्रह्मांड-रहस्य की ईमानदार स्वीकृति।
### 2. हिरण्यगर्भ सूक्त (10/121) — ईश्वरवादी दृष्टि
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे।' — आदि में हिरण्यगर्भ (स्वर्णिम गर्भ/ब्रह्म) था — भूत-भविष्य का स्वामी, एकमात्र जीवनदायी देव।
### 3. पुरुषसूक्त (10/90) — यज्ञात्मक दृष्टि
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।' — पुरुष (ब्रह्म) समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त है। देवताओं ने उस पुरुष का यज्ञ करके सूर्य, चंद्र, इंद्र, पृथ्वी और समस्त सृष्टि की रचना की।
वैज्ञानिक साम्य: नासदीय सूक्त की अवधारणा आधुनिक 'बिग बैंग' सिद्धांत से놀랍게 मिलती-जुलती है।





