विस्तृत उत्तर
वेद के भीतर 'मन्त्र' और 'सूक्त' दोनों शब्द अलग-अलग संरचनात्मक इकाइयों को दर्शाते हैं, हालाँकि सामान्य भाषा में दोनों को परस्पर बदलकर बोला जाता है।
मन्त्र वेद की सबसे छोटी इकाई है — एक स्वतन्त्र पंक्ति या श्लोक जिसमें किसी देवता की स्तुति, याचना या ब्रह्मज्ञान का प्रकटन होता है। 'मन्त्र' शब्द की व्याख्या शास्त्रों में तीन प्रकार से दी गई है — जिसके मनन से संसार के दुखों से रक्षा हो (मननात् त्रायते), जिससे आत्मा का ज्ञान हो, और जिससे देवता का सत्कार हो। ऋग्वेद-संहिता में लगभग १०,५५२ मन्त्र हैं।
सूक्त एक देवता या एक विषय पर रचित मन्त्रों का समूह है। 'बृहद्देवताकार' में सूक्त की परिभाषा दी गई है — 'सम्पूर्णमृषिवाक्यं तु सूक्तमित्यभिधीयते' — अर्थात एक ऋषि का सम्पूर्ण उद्गार सूक्त है। प्रत्येक सूक्त के चार भेद होते हैं — देवता (जिस देव को सम्बोधित है), ऋषि (जिस ऋषि को दर्शन हुआ), छन्द (जिस छन्द में रचा गया), और अर्थ। ऋग्वेद में कुल १,०२८ सूक्त हैं। इस प्रकार एक सूक्त अनेक मन्त्रों से मिलकर बना होता है, जैसे पुरुषसूक्त में १६ ऋचाएँ हैं और श्रीसूक्त में १५।





