विस्तृत उत्तर
प्राचीन भारतीय युद्धकला में हथियारों को दो मुख्य श्रेणियों में बांटा गया था — शस्त्र और अस्त्र। शस्त्र वे हथियार थे जिन्हें शारीरिक बल से चलाया जाता था, जैसे तलवार, भाला, गदा या धनुष-बाण। वहीं अस्त्र पूरी तरह से अलग थे। ये अलौकिक हथियार थे जिन्हें विशेष मंत्रों का उच्चारण करके जागृत किया जाता था। एक योद्धा किसी साधारण बाण को हाथ में लेकर मंत्रों के माध्यम से एक विशिष्ट देवता का आह्वान करता था, और वह देवता उस बाण में अपनी दिव्य शक्ति भर देते थे। इसके बाद वह बाण एक साधारण बाण न रहकर एक दिव्यास्त्र बन जाता था, जिसका सामना साधारण तरीकों से करना असंभव था।
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