विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत पुराण (5.23.9) में इस चक्र के ध्यान और स्मरण के फल का स्पष्ट उल्लेख है। भागवत पुराण के अनुसार — 'ग्रहर्क्षतारामयमाधिदैविकं पापापहं मन्त्रकृतां त्रिकालम्। नमस्यतः स्मरतो वा त्रिकालं नश्येत तत्कालजमाशु पापम्॥' अर्थात यह शिशुमार चक्र ग्रहों, नक्षत्रों और तारों से निर्मित भगवान का आधिदैविक स्वरूप है। जो भी व्यक्ति दिन में तीन बार इसका स्मरण और नमन करता है उसके उस समय के समस्त पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। जो योगी इस स्वरूप का ध्यान करते हैं वे इस मंत्र का तीन बार जाप करते हैं — 'नमो ज्योतिर्लोकाय कालायनाय अनिमिषां पतये महापुरुषाय अभिधीमहि।' अर्थात हम उन ज्योतिर्लोक स्वरूप, काल के नियंत्रक, देवों के स्वामी, महापुरुष भगवान को नमस्कार करते हैं।
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