विस्तृत उत्तर
देवीसूक्त ऋग्वेद का एक महत्वपूर्ण सूक्त है जिसमें देवी ने स्वयं अपनी महिमा का प्रकटन किया है — इसे 'वाक् सूक्त' भी कहते हैं क्योंकि इसमें वाक् देवी स्वयं बोलती हैं। अथर्ववेद में भी देवी को समर्पित सूक्त मिलते हैं। इससे अलग, मार्कण्डेय पुराण के अन्तर्गत आने वाला देवी माहात्म्य (दुर्गासप्तशती) का पाठ भी देवीसूक्त के अंगभूत रूप में जाना जाता है।
देवीसूक्त के पाठ का सबसे उत्तम समय ब्रह्ममुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़-दो घण्टे पहले) है। प्रातःकालीन पूजा में स्नान के बाद पूर्वमुख बैठकर पाठ करना शास्त्रसम्मत है। नवरात्रि के नौ दिनों में देवीसूक्त और दुर्गासप्तशती का पाठ विशेष फलदायी माना गया है — इस काल में देवी-उपासना का विशेष विधान है। अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी तिथियों पर भी देवीसूक्त पाठ का विशेष महत्व है। दीपावली पर महालक्ष्मी स्वरूप में देवी का पाठ होता है। सामान्य दिनों में भी शुद्धतापूर्वक कभी भी इसका पाठ किया जा सकता है। यदि नित्य पाठ सम्भव न हो तो शुक्रवार या किसी पर्व पर अवश्य करें।





