विस्तृत उत्तर
ऋग्वेद के दसवें मंडल के १२५वें सूक्त, जिसे 'देवी सूक्तम्' या 'वाक् आम्भृणी सूक्त' कहा जाता है, में शक्ति की सर्वोच्चता का प्रथम और प्रामाणिक उद्घोष प्राप्त होता है।
इस सूक्त में महर्षि अम्भृण की पुत्री वाक् ऋषिका ने आत्म-साक्षात्कार की अवस्था में घोषणा की है कि वे ही संपूर्ण ब्रह्मांड की शासिका हैं, वसुओं, रुद्रों और आदित्यों को धारण करने वाली हैं, और संसार में जो कुछ भी देखा, सुना या ग्रहण किया जाता है, वह सब उन्हीं की चेतना का विस्तार है।
देवी सूक्तम् इस तथ्य को स्थापित करता है कि ब्रह्मांड की मूल ऊर्जा एक चेतनामय स्त्री-तत्त्व है, जिसे बाद के पौराणिक साहित्य में 'दुर्गा' के रूप में महिमामंडित किया गया।





