विस्तृत उत्तर
वेदों में विष्णु का रूप मुख्य रूप से 'त्रिविक्रम' (तीन पगों से ब्रह्मांड को नापने वाले) के रूप में वर्णित है।
यास्काचार्य और आचार्य सायण के भाष्य के अनुसार, उनके तीन पद (त्रीणि पदा) आकाश, अंतरिक्ष और पृथ्वी में उनके सर्वव्यापी प्रभाव के प्रतीक माने जाते हैं। कुछ विद्वान इसे सूर्य की तीन अवस्थाओं — उदय, मध्य (दोपहर), और अस्त — के रूप में भी व्याख्यायित करते हैं, जहाँ सूर्य विष्णु का ही एक भौतिक प्रतीक है।
आध्यात्मिक दृष्टि से यह जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं को पार कर 'तुरीय' (परम चेतना) अवस्था में प्रवेश करने का भी सूचक है।





