विस्तृत उत्तर
ऋग्वेद (अनुमानित १५००-१००० ईसा पूर्व), जो सनातन धर्म और मानव जाति का प्राचीनतम उपलब्ध ज्ञान स्रोत है, में सरस्वती का उल्लेख मुख्य रूप से एक परम पवित्र, शक्तिशाली नदी और जल-देवी (आपः) के रूप में मिलता है।
वैदिक ऋषियों ने उनके भौतिक (भौगोलिक) और दैवीय (आध्यात्मिक), दोनों रूपों की एक साथ स्तुति की है, जिससे वे भारतीय परंपरा में नदी-देवी (River Goddess) का सबसे प्रारंभिक और सशक्त उदाहरण बन जाती हैं।
प्रारंभिक वैदिक काल में, एक जल-देवी (आपः) के अंग के रूप में, सरस्वती को संपत्ति, प्रचुरता, उत्तम स्वास्थ्य, और पवित्रता (healing and purity) प्रदान करने वाली शक्ति के रूप में पूजा जाता था। इंद्र के समान उन्हें महान योद्धा और 'वृत्रघ्नी' (वृत्र नामक राक्षस का नाश करने वाली) भी कहा गया है।
ऋग्वेद (७.९६.२) में उन्हें मारुतों (तूफान के उग्र देवताओं) की संगिनी बताया गया है, जो उनके उग्र और जुझारू रूप को दर्शाता है।





