विस्तृत उत्तर
वैदिक यज्ञ में चार प्रमुख ऋत्विज् होते हैं और प्रत्येक का सम्बन्ध एक विशिष्ट वेद से है। ऋग्वेद और अथर्ववेद की भूमिकाएँ इस प्रकार हैं:
ऋग्वेद — होता की भूमिका
होता' वह ऋत्विज् है जो यज्ञ में देवताओं का आह्वान करता है। होता ऋग्वेद की ऋचाओं (स्तुति मंत्रों) का उच्चारण करके देवताओं को यज्ञ में आमंत्रित करता है और उनकी प्रशंसा करता है।
- ▸ऋग्वेद = स्तुतिरूप ऋचाओं का संग्रह।
- ▸होता का कार्य: इन्द्र, अग्नि, वरुण, सविता आदि देवताओं की स्तुति और प्रार्थना।
- ▸सोमयाग में होता और उसके 3 सहायक (मैत्रावरुण, अच्छावाक, ग्रावस्तुत) ऋग्वैदिक मंत्रों का पाठ करते हैं।
- ▸'शस्त्र' (ऋग्वैदिक मंत्रों का पठन) होता का विशिष्ट कर्तव्य है।
अथर्ववेद — ब्रह्मा की भूमिका
ब्रह्मा' यज्ञ का अध्यक्ष और निरीक्षक है। ब्रह्मा का प्रधान वेद अथर्ववेद (ब्रह्मवेद) है।
- ▸ब्रह्मा सर्ववेदविद् होता है — चारों वेदों का ज्ञाता।
- ▸उसका कार्य: यज्ञ की समस्त विधियों का निरीक्षण और त्रुटियों का परिमार्जन।
- ▸ऐतरेय ब्राह्मण: वेदत्रयी (ऋक्, यजुः, साम) वाक् (वचन) से यज्ञ के एक पक्ष का संस्कार करती है, ब्रह्मा अथर्ववेद द्वारा मन से दूसरे पक्ष का संस्कार करता है।
- ▸गोपथ ब्राह्मण: तीन वेदों से यज्ञ का केवल एक पक्ष संस्कारित होता है, ब्रह्मा मन द्वारा दूसरे पक्ष को संस्कारित करता है।
- ▸अथर्ववेद के मंत्र शान्ति, रक्षा, और प्रायश्चित्त कर्मों में भी प्रयुक्त होते हैं।
सारांश
ऋग्वेद = देवताओं का आह्वान और स्तुति (होता)। अथर्ववेद = यज्ञ का निरीक्षण, त्रुटि सुधार, शान्ति-रक्षा कर्म (ब्रह्मा)। दोनों के बिना यज्ञ अपूर्ण है।





