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वेद एवं यज्ञ📜 कात्यायन श्रौतसूत्र, आपस्तम्ब श्रौतसूत्र, शतपथ ब्राह्मण2 मिनट पठन

अतिरात्र यज्ञ का क्या विधान है

संक्षिप्त उत्तर

अतिरात्र = रात भर चलने वाला सोमयाग (7 प्रकारों में छठवाँ)। विशेषता: चौथा सवन (रात्रि), अश्विनीकुमार ग्रह (भोर में)। 16 ऋत्विज्। 1975 और 2011 में केरल में सम्पन्न — Frits Staal द्वारा documented। आज अत्यन्त दुर्लभ — केवल केरल नम्बूदिरी परम्परा में जीवित।

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विस्तृत उत्तर

अतिरात्र सोमयाग की एक विशिष्ट और विस्तृत श्रेणी है। 'अति' + 'रात्रि' = रात्रि से आगे (रात भर चलने वाला) — यह यज्ञ जो रात्रि में भी निरन्तर चलता रहता है।

स्थान (सोमयाग में)

सोमयज्ञ 7 प्रकार: अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र, आप्तोर्याम। अतिरात्र छठवें स्तर का सोमयाग है।

विशेषताएँ

1रात्रि सवन

सामान्य सोमयाग में तीन सवन (प्रातः, माध्यन्दिन, सायं) होते हैं। अतिरात्र में चौथा सवन — 'रात्रि सवन' या 'तृतीय सवन के पश्चात् रात्रि कर्म' — जोड़ा जाता है। यज्ञ रात भर चलता है।

2अश्विनीकुमार ग्रह

अतिरात्र में प्रातःकाल (भोर होने से पहले) अश्विनीकुमार देवताओं के लिए विशेष 'अश्विन शस्त्र' और 'अश्विन स्तोत्र' होता है — यह अतिरात्र की विशिष्टता है।

3ऋत्विज्

16 ऋत्विज् (सोमयाग के समान) — होता, अध्वर्यु, उद्गाता, ब्रह्मा और उनके सहायक।

4अवधि

अतिरात्र 'एकाह' (एक दिन + एक रात) या 'आहीन' (कई दिन) हो सकता है।

5सोमपान

ऋत्विज् और यजमान रात्रि सवन में भी सोमरस का पान करते हैं।

ऐतिहासिक महत्व

  • 1975 में केरल में नम्बूदिरी ब्राह्मणों द्वारा 'अतिरात्र अग्निचयन' (अग्निचयन सहित अतिरात्र) सम्पन्न किया गया — इसे Frits Staal ने document किया।
  • 2011 में भी केरल में अतिरात्र सोमयाग सम्पन्न हुआ।
  • यह आज अत्यन्त दुर्लभ है — विश्व में केवल केरल के नम्बूदिरी ब्राह्मण ही इसे सम्पन्न करा पाते हैं।

उद्देश्य

आत्मशुद्धि, लोक कल्याण, देवताओं की प्रीति, और मोक्ष प्राप्ति।

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शास्त्रीय स्रोत
कात्यायन श्रौतसूत्र, आपस्तम्ब श्रौतसूत्र, शतपथ ब्राह्मण
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