विस्तृत उत्तर
अतिरात्र सोमयाग की एक विशिष्ट और विस्तृत श्रेणी है। 'अति' + 'रात्रि' = रात्रि से आगे (रात भर चलने वाला) — यह यज्ञ जो रात्रि में भी निरन्तर चलता रहता है।
स्थान (सोमयाग में)
सोमयज्ञ 7 प्रकार: अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र, आप्तोर्याम। अतिरात्र छठवें स्तर का सोमयाग है।
विशेषताएँ
1रात्रि सवन
सामान्य सोमयाग में तीन सवन (प्रातः, माध्यन्दिन, सायं) होते हैं। अतिरात्र में चौथा सवन — 'रात्रि सवन' या 'तृतीय सवन के पश्चात् रात्रि कर्म' — जोड़ा जाता है। यज्ञ रात भर चलता है।
2अश्विनीकुमार ग्रह
अतिरात्र में प्रातःकाल (भोर होने से पहले) अश्विनीकुमार देवताओं के लिए विशेष 'अश्विन शस्त्र' और 'अश्विन स्तोत्र' होता है — यह अतिरात्र की विशिष्टता है।
3ऋत्विज्
16 ऋत्विज् (सोमयाग के समान) — होता, अध्वर्यु, उद्गाता, ब्रह्मा और उनके सहायक।
4अवधि
अतिरात्र 'एकाह' (एक दिन + एक रात) या 'आहीन' (कई दिन) हो सकता है।
5सोमपान
ऋत्विज् और यजमान रात्रि सवन में भी सोमरस का पान करते हैं।
ऐतिहासिक महत्व
- ▸1975 में केरल में नम्बूदिरी ब्राह्मणों द्वारा 'अतिरात्र अग्निचयन' (अग्निचयन सहित अतिरात्र) सम्पन्न किया गया — इसे Frits Staal ने document किया।
- ▸2011 में भी केरल में अतिरात्र सोमयाग सम्पन्न हुआ।
- ▸यह आज अत्यन्त दुर्लभ है — विश्व में केवल केरल के नम्बूदिरी ब्राह्मण ही इसे सम्पन्न करा पाते हैं।
उद्देश्य
आत्मशुद्धि, लोक कल्याण, देवताओं की प्रीति, और मोक्ष प्राप्ति।




