सोमवार व्रत की संपूर्ण, पारंपरिक एवं प्रमाण-आधारित व्रत कथा
1. कथा का पारंपरिक प्रारंभ
कथा-श्रवण का पारंपरिक प्रसंग एवं संकल्प
सनातन हिंदू धर्म में सोमवार का पावन दिन देवाधिदेव महादेव भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना को समर्पित है। सदियों से श्रावण मास के सोमवार अथवा वर्ष के किसी भी साधारण सोमवार को शिव-भक्ति, अभीष्ट मनोकामना की पूर्ति, संकट-निवारण और जीवन में सुख-शांति की प्राप्ति हेतु सोमवार का व्रत रखा जाता है। यह व्रत पूर्णतः शास्त्रोक्त, पौराणिक आख्यानों और लोक-परंपराओं पर आधारित है। पारंपरिक व्रत-विधान के अनुसार, दिनभर शिव-स्मरण और निराहार या फलाहार व्रत रखने के पश्चात, सांध्यबेला में प्रदोष काल के समय भगवान शिव और माता भवानी की विधिवत षोडशोपचार पूजा की जाती है। पूजा के उपरांत, शिव-प्रतिमा या शिवलिंग के समक्ष बैठकर एकचित्त होकर इस पारंपरिक व्रत कथा का वाचन अथवा श्रवण किया जाता है ।
कथा श्रवण का यह अत्यंत प्राचीन और पारंपरिक नियम है कि व्रती अपने दाएं हाथ में श्वेत पुष्प, अक्षत (साबुत चावल), और थोड़ा सा पवित्र जल लेकर कथा का श्रवण करता है। कथा के पूर्ण होने पर हाथ में ली गई यह सामग्री भगवान शिव के श्रीचरणों में अर्पित कर दी जाती है। कथा वाचन से पूर्व सर्वविघ्नविनाशक भगवान श्री गणेश, ज्ञान की देवी माता सरस्वती और उमा-महेश्वर का ध्यान किया जाता है, ताकि कथा के श्रवण और वाचन में कोई विघ्न उत्पन्न न हो और व्रत का पूर्ण फल प्राप्त हो ।
पारंपरिक मंगलाचरण एवं आरंभिक वाक्य
कथा के वाचन से पूर्व जो पारंपरिक मंगलाचरण और श्लोक पढ़े जाते हैं, वे इस प्रकार हैं:
"गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम्।
उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्॥
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
सदा बसन्तं हृदयारबिन्दे भबं भवानीसहितं नमामि॥"
पारंपरिक आरंभिक वाक्य: "अथ सोमवार व्रत कथा प्रारभ्यते। हे उमापति महादेव! आपकी जय हो। हे त्रिलोकीनाथ! जो भी भक्त पूर्ण श्रद्धा, विश्वास और भक्ति-भाव से इस सोमवार व्रत कथा को सुनता है, बांचता है (पढ़ता है) अथवा कथा के मध्य में हुंकारा भरता है, उस पर सदा अपनी कृपादृष्टि बनाए रखना। उसके सभी मनोरथ पूर्ण करना और उसके सभी कष्टों का हरण करना।" ।
सोमवार व्रत से संबंधित मुख्य रूप से तीन कथाएँ पारंपरिक व्रत-पुस्तिकाओं और लोक-प्रचलित प्रामाणिक पाठों में प्राप्त होती हैं। इन तीनों कथाओं को उनके मूल और अक्षुण्ण स्वरूप में नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है。
| कथा संस्करण | स्रोत एवं परंपरा | मुख्य पात्र | कथा का मूल संदेश एवं प्रसंग |
|---|---|---|---|
| प्रथम संस्करण | पौराणिक एवं गीता प्रेस व्रत-पुस्तिका | धनवान साहूकार, शिव-पार्वती, साहूकार का पुत्र, मामा, राजकुमारी | शिव-भक्ति के प्रभाव से अल्पायु का निवारण एवं मृत पुत्र को भगवान शिव द्वारा पुनः जीवनदान। |
| द्वितीय संस्करण | सोलह सोमवार व्रत परंपरा | अमरावती का विप्र, राजा, घमंडी रानी, शिव-भक्त गुसाईं जी | शिव-प्रसाद और व्रत का अपमान करने पर दारिद्रय का श्राप एवं पश्चाताप पश्चात पुनः वैभव और राजपाट की प्राप्ति। |
| तृतीय संस्करण | लोक-प्रचलित शिव कथा | निर्धन ब्राह्मण/बुढ़िया, धनवान साहूकारनी, साधु-वेशधारी शिव | भगवान शिव की परीक्षा, निस्वार्थ भक्ति, माया का त्याग एवं 'घीलड़ी' (पात्र) का अक्षय वरदान। |
2. मुख्य कथा (पूर्ण एवं अक्षुण्ण रूप में)
संस्करण १: साहूकार एवं उसके पुत्र का प्रसंग
(यह कथा सोमवार व्रत की सबसे प्राचीन, प्रामाणिक और सर्वाधिक प्रचलित पारंपरिक कथा है, जो प्रायः प्रत्येक सोमवार को सभी शिव-भक्तों द्वारा अनिवार्य रूप से शिवालयों और घरों में पढ़ी जाती है। यह गीता प्रेस और अन्य पारंपरिक व्रत-पुस्तिकाओं पर आधारित है ।)
निर्धन साहूकार का परिचय एवं शिव-भक्ति
प्राचीन काल की बात है, किसी एक नगर में एक अत्यंत धनवान साहूकार निवास करता था। उसके पास अपार संपत्ति, धन-धान्य, मणि-माणिक्य, स्वर्ण-आभूषण और सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी। उसके व्यापार का विस्तार कई नगरों तक था और उसके घर में दास-दासियों की एक बड़ी संख्या सदैव सेवा में तत्पर रहती थी। परंतु, विधाता का ऐसा कठोर विधान था कि इतने असीमित वैभव और संपत्ति के स्वामी होने के पश्चात भी उसके आंगन में किसी संतान की किलकारी नहीं गूंजी थी । संतान के अभाव में साहूकार और उसकी पत्नी दिन-रात अत्यंत दुःखी और चिंतित रहते थे。
पुत्र प्राप्ति की उत्कट लालसा में वह साहूकार पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ भगवान शिव का आश्रय लेता था। वह प्रत्येक सोमवार को नियमपूर्वक भगवान शिव और माता पार्वती का व्रत करता था। सांध्यकाल में वह नियम से शिवालय (शिव मंदिर) जाता और भगवान भोलेनाथ के समक्ष शुद्ध घी का दीपक जलाकर उनकी विधिवत पूजा-अर्चना करता था । साहूकार की इस अगाध भक्ति और कठोर नियम-निष्ठा को इसी प्रकार व्यतीत होते हुए कई वर्ष बीत गए, परंतु उसने अपना नियम कभी नहीं तोड़ा。
माता पार्वती का आग्रह एवं भगवान शिव का वरदान
साहूकार की इस अनन्य भक्ति, कठोर नियम और निरंतर सेवा को देखकर एक दिन जगत जननी माता पार्वती का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने भगवान शिव से अत्यंत करुणापूर्ण स्वर में आग्रह करते हुए कहा, "हे प्राणनाथ! हे उमापति! यह साहूकार आपका परम भक्त है। यह वर्षों से निरंतर प्रत्येक सोमवार को आपका व्रत और पूजन करता आ रहा है। इसके मन में संतान-हीनता का गहरा दुःख है। हे कृपानिधान! जब यह आपका इतना बड़ा भक्त है और इसे यदि किसी भी प्रकार का दुःख है, तो आपको इसके कष्टों को अवश्य दूर करना चाहिए। आप सदैव अपने भक्तों पर दयालु रहते हैं और उनके दुःखों को हमेशा दूर करते हैं। यदि आप अपने ऐसे अनन्य भक्तों के दुःख दूर नहीं करेंगे, तो फिर मनुष्य इस मृत्युलोक में आपकी सेवा और व्रत क्यों करेंगे?" ।
माता पार्वती के इस अत्यंत करुणापूर्ण आग्रह को सुनकर अंतर्यामी भगवान शिव मुस्कुराए और बोले, "हे पार्वती! यह संसार एक कर्मक्षेत्र है। यहाँ जो भी प्राणी जन्म लेता है, उसे अपने पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार ही सुख अथवा दुःख का फल भोगना पड़ता है। इस साहूकार के भाग्य में पुत्र का सुख नहीं है; इसी चिंता में यह अत्यंत दुःखी रहता है। मैं इसके प्रारब्ध के विपरीत जाकर क्या कर सकता हूँ?" ।
परंतु माता पार्वती अपनी बात पर अडिग रहीं। उन्होंने मातृभाव से विभोर होकर शिवजी से पुनः हठ करते हुए कहा, "हे महादेव! आप तो त्रिलोकीनाथ हैं। आपके लिए इस चराचर जगत में कुछ भी असंभव नहीं है। आप कृपा करके इस साहूकार को पुत्र प्राप्ति का वरदान अवश्य दें। यदि आप ऐसा नहीं करेंगे, तो संसार में आपकी भक्ति से लोगों का विश्वास उठ जाएगा।" ।
पार्वती जी के निरंतर हठ और अनुनय-विनय के समक्ष विवश होकर शिवजी ने कहा, "हे देवी! तुम्हारे बार-बार आग्रह करने पर मैं इसे पुत्र प्राप्ति का वरदान तो देता हूँ, परंतु विधाता के लेख के अनुसार उस पुत्र की आयु अधिक नहीं होगी। वह पुत्र केवल बारह वर्ष की आयु तक ही जीवित रहेगा। बारह वर्ष पूर्ण होते ही वह मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। इससे अधिक मैं भी इसके लिए कुछ और नहीं कर सकता।" ।
यह पूरा संवाद जब शिवालय में चल रहा था, तब वह साहूकार भी मंदिर में उपस्थित था और उसने भगवान शिव और माता पार्वती की ये सभी बातें अपने कानों से सुन ली थीं। वरदान और अल्पायु की यह कठोर शर्त सुनने के पश्चात भी साहूकार न तो अधिक प्रसन्न हुआ और न ही अधिक दुःखी। उसने भगवान की इच्छा को शिरोधार्य किया और वह विचलित नहीं हुआ। उसने अपनी पूजा और सोमवार के व्रत का नियम पूर्ववत जारी रखा ।
पुत्र का जन्म और विद्याध्ययन के लिए प्रस्थान
भगवान शिव के वरदान के फलस्वरूप, कुछ समय पश्चात साहूकार की पत्नी गर्भवती हुई और नौ मास पूर्ण होने पर उसने एक अत्यंत सुंदर, स्वस्थ और तेजवान पुत्र को जन्म दिया। साहूकार के घर और पूरे नगर में अपार हर्षोल्लास छा गया। बधाइयां बंटी, मंगल गीत गाए गए और ब्राह्मणों तथा याचकों को बहुत सा धन-धान्य दान किया गया। परंतु साहूकार के मन में सदैव वह बारह वर्ष की अल्पायु वाली बात खटकती रहती थी। उसने यह रहस्य किसी को भी, यहाँ तक कि अपनी पत्नी को भी नहीं बताया, ताकि वह व्यर्थ के शोक में न डूबे ।
समय व्यतीत होता गया और वह बालक ग्यारह वर्ष का हो गया। तब साहूकार की पत्नी ने बालक के विवाह की चर्चा आरंभ की। किंतु साहूकार ने विवाह से स्पष्ट मना कर दिया। साहूकार ने मन ही मन विचार किया कि बारहवें वर्ष में इसकी मृत्यु निश्चित है, अतः किसी कन्या का जीवन अंधकार में डालना और इसका विवाह करना उचित नहीं होगा। उसने अपनी पत्नी से कहा कि अभी बालक को उच्च विद्याध्ययन के लिए काशी भेजना अत्यंत आवश्यक है ।
साहूकार ने बालक के सगे मामा को बुलाया। उसने मामा को बहुत सारा धन दिया और आदेश दिया, "तुम इस बालक को लेकर काशी जाओ और इसे उत्तम शिक्षा दिलाओ। रास्ते में तुम जहाँ भी विश्राम करो, वहाँ विशाल यज्ञ का आयोजन करना और ब्राह्मणों को ससम्मान भोजन कराते हुए तथा भरपूर दान-दक्षिणा देते हुए ही आगे बढ़ना।" । मामा ने साहूकार की आज्ञा स्वीकार की और अपने भांजे को लेकर काशी की ओर प्रस्थान कर दिया। मार्ग में वे नियमपूर्वक यज्ञ करते और ब्राह्मणों को जिमाते (भोजन कराते) हुए जा रहे थे。
विवाह की घटना एवं काना राजकुमार
यात्रा करते हुए मामा और भांजा एक दिन एक ऐसे नगर में पहुँचे जहाँ उस दिन वहां के राजा की इकलौती कन्या का विवाह होने वाला था। पूरा नगर सजा हुआ था, तोरण द्वार बने थे और विवाह की तैयारियां जोरों पर थीं। परंतु जिस राजकुमार से उस राजकुमारी का विवाह तय हुआ था, वह राजकुमार जन्म से एक आँख से काना था。
काने राजकुमार के पिता को यह भय सता रहा था कि यदि वधु पक्ष वालों को अथवा स्वयं राजकुमारी को यह ज्ञात हो गया कि उसका होने वाला पति एक आंख से दृष्टिहीन है, तो वे इस विवाह से इनकार कर देंगे और उसकी भारी जग-हंसाई होगी। जब काने राजकुमार के पिता ने साहूकार के अत्यंत सुंदर, तेजवान और सर्वगुण संपन्न पुत्र को वहाँ देखा, तो उसके मन में एक कपटपूर्ण विचार उत्पन्न हुआ। उसने तुरंत सेठ के पुत्र के मामा से संपर्क किया और अपनी स्थिति बताते हुए कहा, "मेरा पुत्र एक आंख से काना है। मुझे भय है कि यह विवाह टूट जाएगा और मेरी प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल जाएगी। तुम यदि कुछ समय के लिए अपने इस सुंदर भांजे को दूल्हे के वेश में सजाकर विवाह वेदी पर बैठा दो और फेरे करवा दो, तो मेरी लाज बच जाएगी। विवाह संपन्न होने के पश्चात् विदाई के समय मैं तुम्हारे भांजे को अपार धन देकर विदा कर दूंगा और अपनी बहू को अपने पुत्र के साथ ले जाऊंगा।" ।
मामा लालच में आ गया और उसने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। साहूकार के पुत्र को राजसी वस्त्र पहनाकर दूल्हा बना दिया गया और उसी के साथ राजकुमारी का विवाह पूर्ण विधि-विधान और सात फेरों के साथ संपन्न हो गया。
परंतु साहूकार का पुत्र अत्यंत धर्मपरायण, सत्यनिष्ठ और दयालु था। उसे यह छल-कपट तनिक भी उचित नहीं लगा। वह उस निर्दोष राजकुमारी के जीवन के साथ धोखा नहीं करना चाहता था। अतः जब उसे एकांत का अवसर मिला, तो उसने राजकुमारी की चुनरी (पल्ले) पर लिख दिया: "हे राजकुमारी! तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ पूर्ण हुआ है। परंतु जिस राजकुमार के साथ तुम्हें विदा किया जाएगा, वह एक आँख से काना है। मैं तो एक साहूकार का पुत्र हूँ और विद्याध्ययन के लिए काशी जा रहा हूँ।" ।
विदाई से पूर्व जब राजकुमारी ने अपनी चुनरी पर लिखे हुए उन शब्दों को पढ़ा, तो वह हतप्रभ रह गई। उसने तुरंत अपने माता-पिता को वह चुनरी दिखाई और सारी वास्तविकता से अवगत कराया। सत्य जानकर राजा ने उस काने राजकुमार के साथ अपनी पुत्री को विदा करने से स्पष्ट इनकार कर दिया और बारात बिना दुल्हन के ही बैरंग वापस लौट गई । राजकुमारी अपने वास्तविक पति (साहूकार के पुत्र) की प्रतीक्षा में अपने पिता के महल में ही रह गई。
बालक की मृत्यु एवं भगवान शिव की कृपा
इधर, साहूकार का पुत्र और उसका मामा अपनी यात्रा करते हुए काशी पहुँच गए। वहाँ रहकर साहूकार का पुत्र पूरे मनोयोग से विद्याध्ययन करने लगा और उसका मामा नियमित रूप से वहाँ भी यज्ञ, दान-पुण्य और ब्राह्मण भोज का आयोजन करता रहा。
देखते ही देखते समय बीत गया और उस बालक की आयु का बारहवां वर्ष पूर्ण हो गया। भगवान शिव के वरदान की सीमा समाप्त हो रही थी। जिस दिन बालक पूरे बारह वर्ष का हुआ, उस दिन भी मामा ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था और ब्राह्मणों को भोजन कराया जा रहा था । यज्ञ के दौरान ही अचानक उस बालक के सिर में अत्यंत तीव्र वेदना उठी। उसने अपने मामा से कहा, "मामा जी, मेरे सिर में असहनीय पीड़ा हो रही है। मैं भीतर जाकर सोना चाहता हूँ।" मामा ने उसे विश्राम करने की अनुमति दे दी। बालक भीतर कमरे में गया और बिस्तर पर लेटते ही भगवान शिव की माया से उसके प्राण पखेरू उड़ गए (उसकी मृत्यु हो गई) ।
थोड़ी देर बाद जब मामा ने यज्ञ पूर्ण किया और अंदर जाकर देखा, तो अपने भांजे को मृत अवस्था में पाया। मामा के दुःख का कोई पारावार न रहा। वह पछाड़ खाकर गिर पड़ा और अत्यंत करुण क्रंदन करते हुए विलाप करने लगा। उसका रुदन इतना हृदय विदारक था कि वहां उपस्थित सभी लोग शोक में डूब गए ।
उसी समय, संयोगवश देवाधिदेव भगवान शिव और माता पार्वती आकाश मार्ग से उसी ओर से गुजर रहे थे। माता पार्वती ने जब उस मामा का हृदय विदारक रुदन और हाहाकार सुना, तो उनका मातृ-हृदय व्याकुल हो गया । उन्होंने भगवान शिव से कहा, "हे प्राणनाथ! यह हाहाकार और विलाप मुझसे सुना नहीं जा रहा। कृपया चलकर इस दुःखी प्राणी के कष्ट का निवारण करें।"
भगवान शिव जब पार्वती जी के साथ उस स्थान पर पहुँचे, तो उन्होंने उस मृत बालक को देखकर माता पार्वती से कहा, "हे देवी! यह उसी साहूकार का पुत्र है, जिसे मैंने तुम्हारी ही हठ के कारण केवल बारह वर्ष की आयु का वरदान दिया था। आज इसकी आयु पूर्ण हो चुकी है और नियति के अनुसार इसकी मृत्यु हुई है।" ।
यह सुनकर मातृभाव से ओतप्रोत माता पार्वती का हृदय व्याकुल हो गया। उन्होंने अत्यंत आग्रह और करुणा के साथ शिवजी से प्रार्थना की, "हे महादेव! हे कृपानिधान! मैं आपसे हाथ जोड़कर प्रार्थना करती हूँ कि आप इस बालक को पुनः जीवित कर दें। इसे आयु दान देने की कृपा करें। यदि यह बालक जीवित नहीं हुआ, तो इसके वियोग की अग्नि में इसके माता-पिता भी तड़प-तड़प कर प्राण त्याग देंगे। उनके दुःख का विचार करें प्रभु!" ।
माता पार्वती के अत्यंत आग्रह और उस साहूकार की निरंतर शिव-भक्ति से प्रसन्न होकर, अंततः भगवान शिव ने उस लड़के को जीवन दान दे दिया। महादेव की कृपा से वह बालक ऐसे उठ बैठा मानो वह किसी गहरी नींद से जागा हो । शिव-पार्वती वहां से कैलाश पर्वत की ओर अंतर्ध्यान हो गए। बालक को जीवित देखकर मामा की खुशी का ठिकाना न रहा。
घर वापसी और सुखद उपसंहार
विद्याध्ययन पूर्ण होने के पश्चात, साहूकार का पुत्र और उसका मामा उसी प्रकार यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन कराते हुए अपने नगर की ओर वापस लौट पड़े। रास्ते में लौटते हुए वे उसी नगर में पहुँचे, जहाँ उस बालक का विवाह राजकुमारी के साथ हुआ था। वहाँ भी जाकर उन्होंने यज्ञ का आयोजन किया ।
नगर के राजा (बालक के ससुर) ने उस लड़के को तुरंत पहचान लिया। उसने तुरंत उन्हें ससम्मान अपने महल में आमंत्रित किया और उनका अत्यंत आदर-सत्कार किया। राजा ने शुभ मुहूर्त निकलवाकर अपनी कन्या (राजकुमारी) को बहुत सारा धन-धान्य, मणि-माणिक्य और अनेक दास-दासियों के साथ अपने दामाद (साहूकार के पुत्र) के साथ सहर्ष विदा किया ।
उधर, साहूकार और उसकी पत्नी अपने पुत्र की प्रतीक्षा में दिन गिन रहे थे। वे दोनों अन्न-जल त्यागकर, भूखे-प्यासे अपनी हवेली की सबसे ऊपरी छत पर इस कठोर प्रण के साथ बैठे थे कि यदि उनके पुत्र की मृत्यु का समाचार आया या वह सकुशल जीवित नहीं लौटा, तो वे दोनों उसी क्षण छत से कूदकर अपने प्राण त्याग देंगे ।
जब मामा ने नगर के समीप पहुँचकर साहूकार की हवेली पर जाकर यह सुखद समाचार दिया कि उनका पुत्र सकुशल अपनी पत्नी (राजकुमारी) और अपार धन-संपत्ति के साथ वापस आ गया है, तो पहले तो उन्हें इस बात पर विश्वास ही नहीं हुआ। तब मामा ने शपथ पूर्वक कहा कि यह सर्वथा सत्य है कि आपका पुत्र अपनी स्त्री के साथ बहुत सारा धन साथ लेकर आया है ।
यह सुनकर सेठ और सेठानी की खुशी का कोई ठिकाना न रहा। वे आनंद-मग्न होकर छत से नीचे उतरे। जब पुत्र अपनी पत्नी के साथ हवेली में आया और माता-पिता के चरण स्पर्श किए, तो सेठ ने आनंद के साथ उनका स्वागत किया। सेठ ने पूरे नगर में उत्सव मनाया और अपार धन दान किया ।
उसी रात्रि, भगवान शिव साहूकार के स्वप्न में प्रकट हुए और बोले, "हे श्रेष्ठी! तूने तो मुझे ठग लिया। मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और पूर्ण श्रद्धा से व्रत कथा सुनने से प्रसन्न होकर ही तेरे पुत्र को लंबी आयु का वरदान दिया है।" ।
साहूकार और उसका परिवार जीवन पर्यंत भगवान भोलेनाथ की भक्ति में लीन रहा और सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर अंत में शिवलोक को प्राप्त हुआ。
संस्करण २: सोलह सोमवार व्रत कथा (अमरावती, विप्र और राजा-रानी प्रसंग)
(जहाँ शिव-भक्त विशेष रूप से "सोलह सोमवार" का अनुष्ठान करते हैं, वहाँ यह पारंपरिक विस्तृत कथा पढ़ी जाती है। इस कथा में शिव-कोप, व्रत-सिद्धि और क्षमापन के कई प्रसंग जुड़े हुए हैं ।)
अमरावती में शिव-पार्वती का पासा-खेल और विप्र को श्राप
एक समय की बात है, मृत्युंजय महादेव भगवान शिव और माता पार्वती पृथ्वी का भ्रमण करते हुए अमरावती नामक एक अत्यंत रमणीक नगर में पधारे। वहाँ के राजा ने भगवान शिव का एक अत्यंत भव्य और सुंदर मंदिर बनवाया था। भगवान शिव और माता पार्वती उसी मंदिर में निवास करने लगे ।
एक दिन माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा, "हे नाथ! आइए चौसर (पासा) खेलें।" भगवान शिव सहमत हो गए और दोनों चौसर खेलने लगे। उसी समय मंदिर का पुजारी (एक ब्राह्मण) वहाँ पूजा करने के लिए आया। माता पार्वती ने उस विप्र से पूछा, "हे ब्राह्मण देव! आप बताएं, इस चौसर के खेल में हम दोनों में से किसकी विजय होगी?" ।
ब्राह्मण ने बिना अधिक विचार किए तुरंत उत्तर दिया, "माता, इस खेल में भगवान शिव की ही विजय होगी।" परंतु दैवयोग से खेल में माता पार्वती की विजय हुई। ब्राह्मण की भविष्यवाणी झूठी सिद्ध हुई। ब्राह्मण द्वारा बिना विचारे झूठ बोलने के कारण माता पार्वती अत्यंत क्रोधित हो गईं और उन्होंने उसी क्षण उस विप्र को कोढ़ी (कुष्ठ रोगी) हो जाने का श्राप दे दिया ।
पार्वती जी के श्राप के प्रभाव से वह ब्राह्मण तत्काल कुष्ठ रोगी हो गया। उसका शरीर गलने लगा और वह अत्यंत कष्टदायक जीवन व्यतीत करने लगा। कई वर्ष इसी प्रकार बीत गए。
अप्सराओं का आगमन और व्रत-विधान का उपदेश
कुछ समय पश्चात, देवलोक से कुछ अप्सराएँ उस शिव मंदिर में पूजा करने के लिए पधारीं। उन्होंने उस पुजारी ब्राह्मण के कोढ़ी और अत्यंत दयनीय स्वरूप को देखा। उनके मन में दया उत्पन्न हुई और उन्होंने ब्राह्मण से उसके इस भयानक रोग का कारण पूछा। ब्राह्मण ने माता पार्वती के श्राप का संपूर्ण वृत्तांत उन्हें कह सुनाया。
यह सुनकर अप्सराओं ने कहा, "हे विप्र! तुम शोक मत करो। तुम भगवान शिव के 'सोलह सोमवार' का व्रत करो। इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे सभी कष्ट दूर हो जाएंगे और तुम रोगमुक्त हो जाओगे।"
ब्राह्मण ने अप्सराओं से अत्यंत विनीत भाव से सोलह सोमवार व्रत की विधि पूछी। तब अप्सराओं ने उसे विधान बताते हुए कहा, "हे विप्र! प्रत्येक सोमवार को प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर पूर्ण श्रद्धा से भगवान शिव का संकल्प लो। दिन भर व्रत रखो। सांध्यकाल में सवा पाव (पाव सेर) उत्तम और पवित्र गेहूं के आटे में घी और गुड़ मिलाकर चूरमा बनाओ । इसके तीन समान भाग करो। भगवान शिव और माता पार्वती की विधिवत धूप, दीप, नैवेद्य और बिल्वपत्र से पूजा करो। चूरमे के तीन भागों में से एक भाग भगवान शिव को अर्पित कर दो, दूसरा भाग वहाँ उपस्थित भक्तों/बालकों में प्रसाद रूप में बांट दो, और तीसरे भाग को स्वयं प्रसाद रूप में ग्रहण करो। इस प्रकार लगातार सोलह सोमवार तक व्रत करो। फिर सत्रहवें सोमवार को सवा सेर आटे की बाटी बनाकर इसी प्रकार चूरमा बनाकर उद्यापन करो।" ।
इतना कहकर अप्सराएँ स्वर्ग लौट गईं。
ब्राह्मण का रोगमुक्त होना और शिव-पार्वती का संवाद
ब्राह्मण ने अप्सराओं द्वारा बताए गए विधान के अनुसार पूर्ण भक्ति और निष्ठा के साथ सोलह सोमवार का व्रत किया। भगवान शिव की असीम कृपा से उसका कुष्ठ रोग पूर्णतः समाप्त हो गया और वह पुनः पहले की भांति स्वस्थ और कांतिवान हो गया ।
कुछ समय पश्चात भगवान शिव और माता पार्वती पुनः उसी मंदिर में पधारे। माता पार्वती ने जब उस ब्राह्मण को पूर्णतः स्वस्थ और रोगमुक्त देखा, तो उन्हें अत्यंत आश्चर्य हुआ। उन्होंने ब्राह्मण से पूछा, "हे विप्र! तुमने ऐसा कौन सा महा-उपाय किया जिससे तुम्हारा यह भयंकर कुष्ठ रोग नष्ट हो गया?"
ब्राह्मण ने हाथ जोड़कर विनयपूर्वक कहा, "हे जगदम्बे! यह सब 'सोलह सोमवार व्रत' का प्रताप है। देव-अप्सराओं के उपदेश से मैंने भगवान शिव का यह व्रत किया, जिससे मेरा रोग शांत हो गया।"
व्रत का विस्तार: कार्तिकेय और मित्र प्रसंग
व्रत की इतनी अद्भुत महिमा सुनकर माता पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुईं। उनके पुत्र कार्तिकेय (षडानन) उनसे रूठ कर कहीं चले गए थे। माता पार्वती ने अपने पुत्र कार्तिकेय की प्राप्ति की कामना से विधि-विधान पूर्वक सोलह सोमवार का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से भगवान कार्तिकेय के मन में अपनी माता के दर्शन की तीव्र इच्छा जागृत हुई और वे लौटकर माता पार्वती के पास आ गए。
कार्तिकेय ने अपनी माता से पूछा, "हे माता! आपने ऐसा कौन सा उपाय किया जिससे मेरे हृदय में अचानक आपके लिए इतना प्रेम उमड़ आया और मैं खिंचा हुआ चला आया?" माता पार्वती ने उन्हें सोलह सोमवार व्रत की महिमा बताई。
भगवान कार्तिकेय का एक घनिष्ठ मित्र (जो एक ब्राह्मण पुत्र था) बहुत समय से दिशांतर (परदेश) गया हुआ था और उससे कोई संपर्क नहीं था। अपने मित्र से पुनः मिलने की कामना से कार्तिकेय जी ने भी सोलह सोमवार का व्रत किया। व्रत पूर्ण होते ही उनका वह प्रिय मित्र उनसे आकर मिल गया。
उस मित्र ने कार्तिकेय जी से उनके मिलने का कारण पूछा। कार्तिकेय जी ने उसे भी इस चमत्कारिक व्रत का विधान बताया। वह ब्राह्मण मित्र विवाह की इच्छा से इस व्रत को करने लगा। व्रत करते हुए वह एक अन्य नगर में गया जहाँ वहाँ के राजा ने अपनी कन्या के विवाह के लिए एक स्वयंवर का आयोजन किया था। राजा की शर्त थी कि हथिनी जिसके गले में जयमाला डाल देगी, उसी के साथ राजकुमारी का विवाह होगा。
वह ब्राह्मण मित्र भी उस स्वयंवर में जा बैठा। शिवजी की कृपा से उस हथिनी ने उसी ब्राह्मण के गले में जयमाला डाल दी। राजा ने शर्त के अनुसार अपनी रूपवती कन्या का विवाह उस विप्र के साथ कर दिया और उसे अपार धन-संपत्ति दी。
राजकुमारी का व्रत और राजा-रानी का संकट
जब वह विप्र अपनी पत्नी (राजकुमारी) को लेकर अपने घर आया, तो राजकुमारी ने अपने पति से पूछा, "हे प्राणनाथ! आपने ऐसा कौन सा महापुण्य किया था कि उस हथिनी ने इतने सारे राजकुमारों को छोड़कर आपके गले में जयमाला डाली?"
पति ने उत्तर दिया, "हे प्रिये! यह सब भगवान शिव के सोलह सोमवार व्रत का फल है।"
यह सुनकर राजकुमारी ने भी सर्वगुण संपन्न पुत्र की प्राप्ति के लिए सोलह सोमवार का व्रत किया। शिवजी की कृपा से उसे एक अत्यंत सुंदर, तेजस्वी और गुणवान पुत्र की प्राप्ति हुई。
जब वह पुत्र बड़ा हुआ, तो उसने अपनी माता से अपने जन्म का कारण पूछा। माता ने उसे सोलह सोमवार व्रत के विषय में बताया। तब उस पुत्र ने एक महान राज्य की प्राप्ति की कामना से यह व्रत किया। उसी समय एक समीपवर्ती राज्य का वृद्ध राजा निसंतान ही परलोक सिधार गया। वहाँ के मंत्रियों ने एक योग्य उत्तराधिकारी की खोज करते हुए इस सर्वगुण संपन्न ब्राह्मण पुत्र को देखा और उसे अपने राज्य का राजा घोषित कर दिया。
राजा बनने के पश्चात भी वह शिव-भक्त राजा नियमपूर्वक सोलह सोमवार का व्रत करता रहा। जब उद्यापन का दिन आया (सत्रहवां सोमवार), तो राजा ने अपनी रानी (उसी राज्य की एक राजकुमारी जिससे उसका विवाह हुआ था) से कहा, "हे प्रिये! तुम भी मेरे साथ शिवालय चलो और भगवान शिव के व्रत का प्रसाद ग्रहण करो।"
परंतु रानी अहंकार और राजमद में चूर थी। उसने राजा की बात अनसुनी कर दी और अपनी दासियों को भेज दिया। उसने कहा, "मैं तो रानी हूँ, मैं शिवालय में जाकर झूठा प्रसाद क्यों खाऊँ?"
रानी का पतन और शिव-कोप
रानी द्वारा भगवान शिव के प्रसाद और व्रत का यह घोर अपमान महादेव को तनिक भी स्वीकार्य नहीं हुआ। भगवान शिव ने उसी रात्रि राजा के स्वप्न में प्रकट होकर अत्यंत क्रोधित स्वर में कहा, "हे मूर्ख राजा! तूने जिस रानी को अपने महल में रखा है, उसने मेरे व्रत का अपमान किया है। यदि तूने इस घमंडी रानी को तुरंत अपने महल और राज्य से बाहर नहीं निकाला, तो मैं तेरा समूल नाश कर दूंगा और तेरा यह राज्य धूल में मिल जाएगा।"
प्रातः काल होते ही राजा ने अपने मंत्रियों और सभासदों को बुलाया और शिवजी के इस स्वप्न के विषय में बताया। सभी ने एक स्वर में कहा कि भगवान शिव के कोप से बचने के लिए रानी का त्याग ही एकमात्र उपाय है। भारी मन से राजा ने रानी को केवल पहने हुए फटे-पुराने वस्त्रों में राज्य से निष्कासित कर दिया ।
रानी भूखी-प्यासी, रोती-बिलखती दर-दर भटकने लगी। शिवजी के कोप के कारण उसका भाग्य उससे रूठ गया था। वह भटकते हुए एक नगर में एक बुढ़िया के पास गई जो सूत कात कर बेचती थी। रानी ने उससे काम मांगा। जैसे ही रानी ने सूत का गट्ठर अपने सिर पर उठाया, अचानक एक तेज आंधी आई और बुढ़िया का सारा सूत उड़ गया। क्रोधित होकर बुढ़िया ने रानी को मार-पीट कर वहाँ से भगा दिया。
इसके पश्चात रानी एक तेली (तेल निकालने वाले) के घर गई। रानी ने ज्यों ही उसके घर में प्रवेश किया, तेली के तेल से भरे हुए सभी मटके रहस्यमय तरीके से चटक गए और सारा तेल ज़मीन पर बह गया। तेली ने इसे अपशकुन माना और रानी को तुरंत धक्के मारकर घर से निकाल दिया。
भूख और प्यास से व्याकुल रानी एक नदी के तट पर पानी पीने गई। ज्यों ही उसने नदी के जल को स्पर्श किया, नदी का सारा निर्मल जल सूख गया और वहाँ केवल कीचड़ और कीड़े-मकोड़े ही शेष रह गए। शिवजी के श्राप के कारण प्रकृति भी उसका साथ छोड़ चुकी थी。
गुसाईं जी का आश्रम और व्रत-सिद्धि
अंततः, भटकते-भटकते वह रानी घने वन में स्थित एक शिव-भक्त गुसाईं जी (एक सिद्ध संत) के आश्रम में पहुँची । गुसाईं जी अत्यंत दयालु और त्रिकालदर्शी थे। रानी की दयनीय अवस्था देखकर उन्होंने कहा, "हे पुत्री! तू कौन है? तू मेरे आश्रम में निःसंकोच मेरी पुत्री बनकर रह सकती है।"
रानी आश्रम में रहने लगी। परंतु शिव-कोप का प्रभाव वहाँ भी समाप्त नहीं हुआ। रानी जिस भी अन्न, फल या जल को स्पर्श करती, उसमें तुरंत कीड़े पड़ जाते थे। यह देखकर गुसाईं जी अत्यंत आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने अपने ध्यान से सब कुछ जान लिया और रानी से कहा, "बेटी! अवश्य ही तूने देवाधिदेव भगवान शिव का कोई भारी अपराध किया है। यह सब महादेव के कोप का ही परिणाम है। तू मुझे सत्य-सत्य बता।" ।
तब रानी ने रोते हुए शिवालय न जाने और व्रत के प्रसाद का तिरस्कार करने का अपना घोर अपराध स्वीकार किया। गुसाईं जी ने उसे समझाते हुए कहा, "हे पुत्री! भगवान शिव अत्यंत दयालु हैं, वे आशुतोष हैं। तू पश्चाताप कर और पूरे विधि-विधान व श्रद्धा-भाव से 'सोलह सोमवार का व्रत' कर। महादेव तेरे सभी अपराध क्षमा कर देंगे।" ।
गुसाईं जी के निर्देशानुसार रानी ने सच्चे मन और पूर्ण श्रद्धा के साथ सोलह सोमवार का व्रत आरंभ किया। उसने विधिपूर्वक सत्रहवें सोमवार को व्रत का उद्यापन किया ।
राजा से पुनर्मिलन और सुखद अंत
रानी के व्रत पूर्ण करते ही भगवान शिव का कोप शांत हो गया और उनका आशीर्वाद रानी को प्राप्त हुआ। भगवान शिव की कृपा से राजा के हृदय में अचानक रानी की स्मृति जागृत हुई। राजा ने अपने दूतों और सैनिकों को चारों दिशाओं में रानी की खोज के लिए भेज दिया ।
खोजते-खोजते राजा के दूत गुसाईं जी के आश्रम में जा पहुँचे। उन्होंने वहाँ रानी को दयनीय अवस्था में देखा और वापस आकर राजा को पूरा समाचार सुनाया। राजा तुरंत अपने मंत्रियों के साथ गुसाईं जी के आश्रम में उपस्थित हुआ。
राजा ने गुसाईं जी के चरणों में गिरकर क्षमा याचना की और कहा, "हे महाराज! यह मेरी पत्नी है। भगवान शिव के रुष्ट होने और स्वप्न के आदेश के कारण ही मैंने इसका परित्याग किया था। अब शिवजी की कृपा से मैं इसे ससम्मान वापस लेने आया हूँ। कृपया आप इसे जाने की आज्ञा प्रदान करें।" ।
गुसाईं जी ने राजा की बात सुनकर और शिवजी की महिमा को जानकर सहर्ष रानी को राजा के साथ विदा कर दिया। जब राजा और रानी अपनी राजधानी पहुँचे, तो नगरवासियों ने अपने घरों और रास्तों को सजाया। बाजे बजने लगे, मंगलोच्चार हुआ और प्रजा ने अत्यंत उत्साह के साथ उनका स्वागत किया ।
इसके पश्चात, राजा और रानी शिव जी की कृपा से प्रतिवर्ष 16 सोमवार का व्रत अत्यंत श्रद्धा और निष्ठा से करने लगे। उन्होंने अपने राज्य में आनंद से जीवन व्यतीत किया और अंत में शिवलोक को प्राप्त हुए ।
संस्करण ३: निर्धन ब्राह्मण/बुढ़िया और भगवान शिव की परीक्षा
(सोमवार व्रत के अवसर पर कई अंचलों की लोक-परंपराओं और पारंपरिक व्रत-पुस्तिकाओं में एक निर्धन शिव-भक्त की परीक्षा का यह अत्यंत मार्मिक प्रसंग भी अनिवार्य रूप से पढ़ा जाता है। यह कथा भगवान शिव के 'आशुतोष' स्वरूप और भौतिक लालसा से परे निस्वार्थ भक्ति को दर्शाती है ।)
शिव-पार्वती का पृथ्वी-भ्रमण एवं निर्धन ब्राह्मण की स्थिति
एक समय देवाधिदेव भगवान शिव और माता पार्वती मृत्युलोक (पृथ्वी) के भ्रमण पर निकले। मार्ग में चलते-चलते माता पार्वती की दृष्टि एक अत्यंत जर्जर कुटिया पर पड़ी, जिसमें एक निर्धन ब्राह्मण और उसकी पत्नी (कुछ लोक-कथाओं में यह एक वृद्ध बुढ़िया के रूप में वर्णित है) निवास करते थे। वे दोनों पति-पत्नी अत्यंत दरिद्र थे, उनके पास पहनने को पर्याप्त वस्त्र नहीं थे और दो समय का भोजन भी कठिनाई से ही प्राप्त होता था। फिर भी, वे दोनों भगवान शिव के परम भक्त थे। वे प्रत्येक सोमवार को निराहार रहकर भगवान शिव का व्रत करते थे और जो कुछ रूखा-सूखा प्राप्त होता, उसी में संतुष्ट रहकर शिव-भजन में लीन रहते थे。
माता पार्वती का मातृ-हृदय उनकी यह घोर दरिद्रता देखकर पसीज गया। उन्होंने भगवान शिव से विनय की, "हे उमापति! आपके ये भक्त अत्यंत कष्ट में हैं। ये अनवरत आपके सोमवार का व्रत और पूजन करते हैं। क्या आप इनकी इस निस्वार्थ भक्ति के बदले इन्हें थोड़ा धन-धान्य और सुख-समृद्धि प्रदान नहीं कर सकते? आप तो पल भर में रंक को राजा बना देते हैं।"
भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए कहा, "हे देवी! यह संसार कर्म-सिद्धांत पर चलता है। इन प्राणियों के पूर्व जन्म के कर्मों में धन का सुख नहीं है। और सबसे बड़ी बात यह है कि ये मेरे सच्चे भक्त हैं, इन्हें भौतिक धन की कोई लालसा नहीं है। ये उस अवस्था को प्राप्त हो चुके हैं जहाँ सोना और मिट्टी इनके लिए समान है। यदि मैं इन्हें धन दे भी दूँ, तो भी ये उसे ग्रहण नहीं करेंगे।"
माता पार्वती को इस बात पर विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने हठ किया, "हे नाथ! एक बार आप इन्हें धन देकर तो देखिए। संसार में ऐसा कौन है जो लक्ष्मी को ठुकरा दे?"
शिव की परीक्षा और सुवर्ण-मुद्राओं का प्रसंग
माता पार्वती का हठ देखकर भगवान शिव उनकी बात मान गए। उस दिन वह निर्धन ब्राह्मण और उसकी पत्नी भिक्षाटन के लिए उसी मार्ग से गुजरने वाले थे। भगवान शिव ने अपनी माया से उस मार्ग के बीचों-बीच अशर्फियों (सोने के सिक्कों) से भरी हुई एक बड़ी थैली रख दी, ताकि जब ब्राह्मण वहाँ से गुजरे तो वह थैली उसे मिल जाए। शिव और पार्वती वहीं अंतर्ध्यान होकर यह कौतुक देखने लगे。
कुछ समय पश्चात, वह निर्धन ब्राह्मण और उसकी पत्नी उस मार्ग पर आए। चलते-चलते अचानक ब्राह्मण के मन में एक विचित्र विचार आया। उसने अपनी पत्नी से कहा, "हे प्रिये! हमने जीवन भर अपनी इन दोनों आँखों से इस संसार को देखा है। परंतु जिनके पास आँखें नहीं होतीं, वे बेचारे अंधे लोग इस ऊबड़-खाबड़ मार्ग पर कैसे चलते होंगे? आज क्यों न हम दोनों अपनी आँखें बंद करके अंधे होने का अभिनय करते हुए कुछ दूर तक चलें?"
उसकी पत्नी ने सहर्ष हाँ कर दी। उन दोनों शिव-भक्तों ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और टटोलते हुए आगे बढ़ने लगे। वे ठीक उसी स्थान से गुजरे जहाँ भगवान शिव ने वह स्वर्ण-मुद्राओं से भरी थैली रखी थी। आँखें बंद होने के कारण वे उस थैली को लांघकर आगे बढ़ गए और उन्होंने उसे देखा तक नहीं। जब वे उस थैली से बहुत दूर निकल गए, तब उन्होंने अपनी आँखें खोलीं。
यह दृश्य देखकर माता पार्वती अत्यंत विस्मित रह गईं। शिवजी ने हँसते हुए कहा, "देखा पार्वती! मैंने तुमसे पहले ही कहा था कि इनके भाग्य में यह धन नहीं है और न ही इन्हें इसकी कोई कामना है। इनकी भक्ति किसी स्वार्थ या लोभ पर आधारित नहीं है।"
घीलड़ी का प्रसंग एवं महादेव की साक्षात कृपा
उसी दिन, भगवान शिव और माता पार्वती ने एक साधारण साधु और साध्वी का भेष धारण किया और परीक्षा लेने के उद्देश्य से उसी नगर में गए। वे नगर के एक अत्यंत धनवान साहूकार के घर गए और भिक्षा मांगी। साहूकार की पत्नी (साहूकारनी) अत्यंत कंजूस और अहंकार से भरी हुई थी। जब साधु-वेशधारी शिवजी ने भिक्षा मांगी, तो उसने तिरस्कार करते हुए स्पष्ट शब्दों में 'ना' कर दी और उन्हें द्वार से भगा दिया ।
साधु का भेष धरे भगवान शिव वहाँ से चले गए और बोले, "तेरी ना हो गई।" (अर्थात, तेरे यहाँ बरकत समाप्त हो गई)।
इसके पश्चात वे दोनों उसी निर्धन ब्राह्मणी (बुढ़िया) की टूटी कुटिया पर पहुँचे। जब उन्होंने भिक्षा के लिए पुकारा, तो वह ब्राह्मणी अत्यंत प्रसन्न हुई कि आज मेरे द्वार पर कोई अतिथि आया है। यद्यपि उसके घर में खाने को कुछ विशेष नहीं था, फिर भी उसने अत्यंत श्रद्धा और भक्ति-भाव से अपनी छोटी सी घीलड़ी (घी रखने का छोटा बर्तन) में बचा हुआ थोड़ा सा घी और अन्न उन साधु-साध्वी को अर्पित कर दिया। उसने कहा, "महाराज! मेरे पास जो कुछ भी रूखा-सूखा है, आप इसे भगवान शिव का प्रसाद मानकर ग्रहण करें।" ।
ब्राह्मणी की इस निस्वार्थ सेवा, सोमवार व्रत के प्रति उसकी निष्ठा और अतिथियों के प्रति उसके समर्पण को देखकर साधु-वेशधारी शिवजी अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने आशीर्वाद देते हुए कहा, "तेरी हाँ हो गई। तेरी घीलड़ी में सदैव घी रहेगा, तेरे तेल के पात्र में सदैव तेल रहेगा, तेरा कोई भी काम कभी रुकेगा नहीं, और तेरा धन सदैव जुड़ेगा।" ।
इतना कहते ही भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती अपने साक्षात, वास्तविक और दिव्य अलौकिक स्वरूप में उस निर्धन ब्राह्मणी के समक्ष प्रकट हो गए। ब्राह्मणी उन दोनों के दिव्य दर्शन पाकर कृतार्थ हो गई और उनके चरणों में गिर पड़ी। शिव-पार्वती ने उसे अखंड सौभाग्य और अक्षय धन-धान्य का वरदान दिया。
उधर, साहूकारनी को जब यह ज्ञात हुआ कि वे साधु स्वयं भगवान शिव थे और उसने उन्हें भगाकर बहुत बड़ा अपराध किया है, तो वह दौड़ती हुई वहाँ आई। उसने भगवान शिव और माता पार्वती के चरण पकड़ लिए और विलाप करते हुए बोली, "हे महाराज! मुझसे भारी भूल हो गई। मेरी गलती क्षमा करो। मुझे कुछ तो दे दो।" ।
दयालु महादेव ने उसे भी अपने अहंकार को त्यागकर धर्म और दान-पुण्य के मार्ग पर चलने का उपदेश दिया और क्षमा कर दिया। इतना कहकर शिव और पार्वती अंतर्ध्यान हो गए। निर्धन ब्राह्मणी भगवान शिव की कृपा से अपने शेष जीवन में सभी सुखों का भोग करती हुई, निरंतर शिव आराधना में लीन रही और अंततः शिवलोक को प्राप्त हुई。
3. पारंपरिक उपसंहार एवं फलश्रुति
(प्रत्येक पारंपरिक व्रत-कथा का समापन उसके महात्म्य और फलश्रुति (कथा सुनने का फल) के बिना अपूर्ण माना जाता है। कथा की समाप्ति पर उपस्थित सभी भक्त हाथ जोड़कर भगवान शिव का ध्यान करते हुए इन वचनों को सुनते हैं ।)
सोमवार व्रत का महात्म्य अत्यंत पावन और फलदायी है। पारंपरिक फलश्रुति के वचन इस प्रकार हैं:
"हे शिव शंकर भगवान और माता पार्वती! जिस प्रकार आपने बुढ़िया माँ पर कृपा की, जिस प्रकार आपने साहूकार के बेटे को प्राण-दान देकर उसके माता-पिता के कष्टों को दूर किया; जिस प्रकार आपने अपनी असीम कृपा से उस कोढ़ी ब्राह्मण को कुष्ठ रोग से मुक्त कर पुनः कांतिवान बनाया; और जिस प्रकार आपने वन में भटकती, श्राप से ग्रसित उस दुःखी रानी के सभी अपराध क्षमा कर उसे पुनः राजपाट और अखंड सौभाग्य प्रदान किया, वैसी ही कृपा सब पर करना। कहानी सुनने वाले, हुंकारा भरने वाले और सुनाने वाले, सब पर अपनी कृपा बनाए रखना। कहानी अधूरी हो तो पूरी करना, पूरी हो तो मान करना।" ।
"यह परम सिद्ध और पारंपरिक मान्यता है कि इसी प्रकार जो कोई भी मनुष्य भक्ति सहित और विधिपूर्वक सोमवार (अथवा 16 सोमवार) व्रत को करता है, और इस कथा को पढ़ता है या सुनता है, उसकी सब मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।" ।
"इस महाव्रत के प्रभाव से कुंवारी कन्याओं को मनचाहा और योग्य जीवनसाथी प्राप्त होता है; संतानहीन दंपत्तियों की सूनी गोद शिव-कृपा से भर जाती है और उन्हें गुणवान संतान का सुख मिलता है; विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य और उनके पति को दीर्घायु प्राप्त होती है; घर में सुख-शांति का वास होता है; और रोग, कष्ट तथा दरिद्रता सदैव के लिए घर से दूर हो जाती है।" ।
"इस व्रत कथा का जो भी मनुष्य मन, वचन और कर्म से अनुसरण करता है, वह इस मृत्युलोक में अपने जीवन काल में समस्त प्रकार के भौतिक सुखों, ऐश्वर्य और संपदा का निर्विघ्न उपभोग करता है। उसके सभी मनोरथ निर्विवाद रूप से पूर्ण होते हैं, और अंत समय में देह त्यागने के पश्चात वह आवागमन के चक्र से मुक्त होकर भगवान के चरणों में 'शिवलोक' (शिवपुरी) को प्राप्त होता है।" ।
(अंत में सभी उपस्थित भक्त अपने हाथों में लिया हुआ जल, पुष्प और अक्षत भगवान शिव के चरणों में अर्पित करते हैं और पूर्ण भक्ति-भाव से जयघोष करते हैं।)
"बोलिए शिव शंकर भगवान की जय!"
"बोलिए माता पार्वती की जय!"
"हर-हर महादेव!"
"ॐ नमः शिवाय!"