विस्तृत उत्तर
नारद मुनि की वीणा का नाम 'महती' है। भारतकोश और विभिन्न पुराणिक संदर्भों में इनकी वीणा को 'महती' नाम से विख्यात बताया गया है। इस वीणा से सदा 'नारायण-नारायण' की ध्वनि निकलती रहती है। नारद जी वीणावादन में अत्यंत निपुण थे और उन्हें संगीत का वरदान माता सरस्वती और ब्रह्मा जी से प्राप्त हुआ था। मान्यता है कि वीणा का आविष्कार स्वयं नारद मुनि ने ही किया था। नारद जी निरंतर इस वीणा की मधुर तान के साथ भगवान विष्णु का भजन-गान करते हुए तीनों लोकों में विचरण करते हैं। गीता के दशम अध्याय के 26वें श्लोक में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है — 'देवर्षीणाम् च नारद:' — अर्थात देवर्षियों में मैं नारद हूँ। नारद जी को भक्ति के प्रचार का पहला आचार्य माना जाता है और उनके 'नारद भक्तिसूत्र' में भक्ति के स्वरूप और मार्ग का सुंदर निरूपण है।





