विस्तृत उत्तर
मंदिर में पूजा के दौरान भजन-कीर्तन की विधि और महत्व शास्त्रों में विस्तार से वर्णित है:
भागवत पुराण (7.5.23) — नवधा भक्ति में कीर्तन
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।' — भगवान का कीर्तन नवधा भक्ति का अभिन्न अंग है।
देवता-अनुसार उपयुक्त भजन
भगवान विष्णु / श्रीकृष्ण के लिए
- ▸'हरे कृष्ण महामंत्र' (महामंत्र — कलियुग में सर्वोपरि, भागवत पुराण)
- ▸विष्णुसहस्रनाम स्तोत्र (महाभारत, अनुशासन पर्व)
- ▸'जय जगदीश हरे' (सार्वभौम वैष्णव भजन)
भगवान शिव के लिए
- ▸'ओम नमः शिवाय' (शिव पुराण, विद्येश्वर संहिता)
- ▸'शिव तांडव स्तोत्र' (रावण विरचित)
- ▸'हर हर महादेव' नाद-कीर्तन
देवी के लिए
- ▸'जय अम्बे गौरी' / 'जय माता दी'
- ▸महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र ('अयि गिरिनंदिनी...' — आदि शंकराचार्य)
- ▸ललितासहस्रनाम पाठ
गणपति के लिए
- ▸'सुखकर्ता दुःखहर्ता' (संत तुकाराम / मराठी परंपरा)
- ▸गणेश पञ्चरत्न स्तोत्र (आदि शंकराचार्य)
नारद भक्तिसूत्र (36-37) का निर्देश
भजन सच्ची श्रद्धा और प्रेम से गाया जाए — लय और स्वर की शुद्धता से अधिक महत्वपूर्ण है भाव की शुद्धता।
महत्वपूर्ण सिद्धांत
कीर्तन सामूहिक हो तो श्रेष्ठ (संकीर्तन) — भागवत पुराण। एकाकी भजन में 'मानस-जप' के साथ गाएं।





